एसीपी को मजिस्ट्रेट अधिकार पर हाईकोर्ट सख्त: नई नागरिक सुरक्षा संहिता के बाद विवाद, RTI में 2300+ जेल भेजे जाने का खुलासा, जनहित याचिका स्वीकार

शहर में लागू पुलिस कमिश्नरी प्रणाली के तहत सहायक पुलिस आयुक्त (एसीपी) को दिए गए ‘विशेष कार्यपालक मजिस्ट्रेट’ के अधिकारों को चुनौती देने वाली महत्वपूर्ण जनहित याचिका को हाई कोर्ट ने सुनवाई के लिए स्वीकार कर लिया है। विस्तृत सुनवाई के बाद हाईकोर्ट की डबल बेंच ने राज्य शासन के गृह विभाग के सचिव, इंदौर पुलिस कमिश्नर सहित सभी डीसीपी और एसीपी को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है।

यह याचिका हाईकोर्ट एडवोकेट सौरभ त्रिपाठी द्वारा जनहित में दायर की गई है। गुरुवार को वे स्वयं कोर्ट में उपस्थित हुए और पक्ष रखा। उनके साथ एडवोकेट मयंक शर्मा ने भी पैरवी की। याचिकाकर्ता की ओर से तर्क दिया गया कि 1 जुलाई 2024 से लागू नई भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता ने पुरानी दंड प्रक्रिया संहिता की जगह ले ली है। नई संहिता के प्रावधानों के अनुसार राज्य सरकार केवल ऐसे पुलिस अधिकारी को विशेष कार्यपालक मजिस्ट्रेट नियुक्त कर सकती है, जो पुलिस अधीक्षक (SP) या समकक्ष रैंक से नीचे का न हो।

एसीपी द्वारा मजिस्ट्रेट कार्यवाही ‘अधिकार क्षेत्र से बाहर’

याचिका में कहा गया कि वर्तमान में इंदौर पुलिस कमिश्नरी में ये अधिकार एसीपी स्तर के अधिकारियों द्वारा पालन किए जा रहे हैं, जबकि एसीपी आमतौर पर पुलिस उपाधीक्षक (DSP) रैंक के होते हैं और एसपी रैंक से नीचे आते हैं। एडवोकेट मयंक शर्मा ने दलील दी कि नई संहिता लागू होने के बाद एसीपी द्वारा मजिस्ट्रेट के रूप में काम करना और व्यक्तियों को जेल भेजने के आदेश पारित करना विधिक रूप से अधिकार क्षेत्र से बाहर और अवैधानिक है।

RTI में चौंकाने वाले आंकड़े, हजारों जेल भेजे गए

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता ने आरटीआई के तहत प्राप्त आंकड़े कोर्ट में पेश किए। उनका कहना था कि अधिकारों के संवैधानिक सिद्धांत का उल्लंघन हो रहा है। पुलिस ही मामला दर्ज कर रही है और पुलिस अधिकारी ही मजिस्ट्रेट बनकर फैसला सुना रहे हैं।

याचिका में दावा किया गया कि प्रतिबंधात्मक कार्रवाई के मामलों में भारी जमानत राशि तय की जाती है। जमानत न भर पाने की स्थिति में दिहाड़ी मजदूरों और गरीब तबके के लोगों को जेल भेजा जा रहा है। आंकड़ों के अनुसार, केवल जूनी इंदौर जोन में ही पिछले एक वर्ष में 2,300 से अधिक लोगों को प्रकरण दर्ज कर जेल भेजा गया। इसे संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन बताया गया है।

कोर्ट ने माना मामला प्रथम दृष्टया गंभीर

हाईकोर्ट ने वैधानिक और संवैधानिक पहलुओं पर सुनवाई के बाद याचिका में उठाए गए सवालों को प्रथम दृष्टया ठोस माना और इसे स्वीकार कर लिया। अगली सुनवाई में राज्य सरकार को अपने निर्णय और नियुक्तियों का कानूनी आधार स्पष्ट करना होगा।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *