दमोह में स्वतंत्रता दिवस समारोह में मीसाबंदी संतोष भारती ने मंत्री इंदर सिंह परमार से सम्मान लेने से किया इनकार, बोले- मुझे सम्मान नहीं बल्कि 40 साल से अटका न्याय चाहिए

दमोह में स्वतंत्रता दिवस के मुख्य समारोह शुक्रवार को असहज स्थिति बन गई। यहां एक मीसाबंदी ने उच्च शिक्षा मंत्री इंदर सिंह परमार के हाथों सम्मान कराने से इनकार कर दिया। मंत्री और कलेक्टर सुधीर कोचर भरे मैदान में मीसाबंदी संतोष भारती को मनाते रहे, लेकिन वे नहीं माने। सख्त लहजे में नाराजगी जताई और उंगली दिखाकर चेतावनी देते हुए मंत्री के हाथ में एक आवेदन दिया। इसके बाद समारोह छोड़कर चले गए। हालांकि, कार्यक्रम स्थल पर भीड़ और शोर के कारण यह स्पष्ट नहीं हो सका कि भारती ने मंत्री से क्या-क्या कहा।

दैनिक भास्कर ने इस मामले में मंत्री से सवाल किया तो उन्होंने कहा कि उन्हें नहीं पता भारती ने ऐसा क्यों किया। इसके बाद वे मौन हो गए। भास्कर ने संतोष भारती से संपर्क किया तो उन्होंने कहा- मैं सम्मान का भूखा नहीं। न्याय के लिए गया था।

तीन तस्वीरों में देखिए मीसाबंदी की नाराजगी..

मंत्री इंदर सिंह परमार हाथों में शॉल लेकर संतोष भारती का सम्मान करने आगे बढ़े। उनके साथ कलेक्टर सुधीर कोचर भी थे। भारती ने सम्मान कराने से मना कर दिया। फिर दोनों मनाते रहे।

संतोष भारती ने मंत्री परमार और कलेक्टर सुधीर कोचर की बात नहीं मानीं। वे उंगली दिखाकर नाराजगी भरे अंदाज में कुछ कहते नजर आए। मंत्री और कलेक्टर उनको मनाते रहे।

नाराज संतोष भारती ने मंत्री परमार के सामने हाथ जोड़े। मंत्री को एक आवेदन दिया और समारोह छोड़कर चले गए। समारोह में मौजूद लोग पूरा घटनाक्रम देखते रहे।

भारती बोले- जमीन की रजिस्ट्री 40 साल में नहीं हुई मीसाबंदी संतोष भारती ने कहा कि मैंने 40 साल पहले हाउसिंग बोर्ड से जमीन खरीदी थी। रजिस्ट्री कराने गया तो अफसर ने 5000 हजार की रिश्वत मांगी। मैंने रिश्वत नहीं दी तो हाउसिंग बोर्ड आज तक रजिस्ट्री नहीं कर रहा।

मैं स्वतंत्रता दिवस समारोह में सम्मान लेने नहीं गया था। मैंने कभी किसी मंच पर जाकर सम्मान नहीं लिया। आज मेरे जाने का मकसद ज्ञापन देना और न्याय पाना था। भारती ने दावा किया कि मैं देश का इकलौता ऐसा व्यक्ति हूं जो तीन बार मीसाबंदी में जेल गया।

25 साल से भाजपा की सरकार, फिर भी न्याय नहीं भारती ने कहा कि मैंने हाईकोर्ट से केस जीता है। इसके बाद भी मेरी रजिस्ट्री नहीं हो रही। पहले कांग्रेस का शासन था तो लोग शासन बदलने की बात करते थे। कहते थे भाजपा शासन में रजिस्ट्री हो जाएगी। अब 25 साल से भाजपा की सरकार है, लेकिन मुझे आज भी न्याय नहीं मिल रहा है।

यदि मंत्री कह रहे ज्ञापन नहीं मिला तो झूठ बोल रहे उन्होंने कहा कि मैं सम्मान का भूखा नहीं हूं। राजनीति कोई धंधा नहीं है। हमारे आंचल में रोजगार, शिक्षा और बेहतर स्वास्थ्य की व्यवस्थाएं होनी चाहिए, नहीं तो यह सम्मान का मतलब पाखंड है। हम मूल्यों की राजनीति करते हैं।

मंत्री की चुप्पी पर भारती ने कहा कि मैंने उनसे बात की थी और मैंने उन्हें ज्ञापन दिया। यदि वह कह रहे हैं कि मुझे कोई ज्ञापन नहीं दिया तो वह सफेद झूठ बोल रहे हैं।

मीसाबंदी संतोष भारती ने मंत्री परमार को ये आवेदन दिया है।

भारती ने कहा- सम्मान से खुद को अलग कर रहा हूं मीसाबंदी संतोष भारती ने जो आवेदन मंत्री के हाथों में दिया है उसमें लिखा है- आज 15 अगस्त को मीसाबंदियों को यह जो मान-सम्मान देने का प्रसंग चल रहा है, उससे मैं अपने आपको अलग कर रहा हूं। कारण…? मैं इस भारत देश का इकलौता व्यक्त्ति जो एक नहीं बल्कि तीन बार का मीसाबंदी हूं…..

1973 : पुलिस विद्रोह भड़काकर राज्य सत्ता को पलटने के आरोप में पूर्व केंदीय मंत्री शरद यादव सहित जेल गया। 1974 : आल इंडिया रेलवे मैंस फेडरेशन की ओर से रेल हड़ताल के आव्हान करने पर जेल जाना पड़ा। 1975 : आपातकाल के दौरान साथी जार्ज फर्नांडिस सहित देश में जनजागरण अभियान में सक्रिय रहने के बाद जेल भेजा गया।

मुझे यह सम्मान नहीं बल्कि सच्चे न्याय की दरकार है। पिछले करीब 40 सालों से न्याय के लिए दर-दर की ठोकरें खा रहा हूं। केवल इसलिए कि तत्समय कथित अधिकारियों को मात्र 5 हजार की रिश्वत नहीं दी थी। इससे भी बड़ी विडंबना यह है कि मप्र शासन और फिर हाईकोर्ट से भी मामले में जीत जाने के बाद भी हाउसिंग बोर्ड के कथित अधिकारीगण निम्न श्रेणी आय वर्ग के क्वार्टर की रजिस्ट्री नहीं कर रहे हैं।

इतना ही नहीं हजारों पात्र संग अपात्र मीसाबंदियों को ताम्रपत्र जारी हो चुके हैं, लेकिन मुझे नहीं, क्योंकि मैंने जिला और पुलिस प्रशासन के आला अधिकारियों के भ्रष्टाचार के विरुद्ध सर्वोच्च न्यायालय तक मामले चला रखे हैं।

भारती ने बताया रजिस्ट्री कराने के लिए क्या-क्या किया…

ऐसे उलझते चला गया मामला संतोष भारती ने बताया कि करीब 40 साल पहले उन्हें हाउसिंग बोर्ड से निम्न श्रेणी वर्ग में 280 वर्गफीट का एक मकान आवंटित हुआ था, जिसकी सरकारी तय राशि उन्होंने जमा कर दी थी, लेकिन रजिस्ट्री नहीं की गई। उसके पीछे का कारण उस समय हाउसिंग बोर्ड में रहे अधिकारी बीएल अहिरवाल थे। उन्होंने हाउसिंग बोर्ड क्षेत्र में ही एक शॉपिंग काम्पलेक्स बनाया था, जिसमें घटिया निर्माण हुआ था और इसकी शिकायत मैंने की थी। इस बात से वह नाराज थे और इसलिए उन्होंने रजिस्ट्री नहीं की। उस शिकायत के बाद उन्हें शासन ने सस्पेंड कर दिया था।

दूसरे अधिकारी ने राशि जमा कराई इसके बाद दमोह में रहे एक तत्कालीन संपत्ति अधिकारी महेंद्र श्रीवास्तव से मैंने इस मामले में बात की। मैंने उनसे कहा में आपकी डिमांड में पूरी कर दूंगा। मुझे मेरे प्लाट की रजिस्ट्री कर दीजिए। श्रीवास्तव ने मुझे छतरपुर बुलाया। वहां एक अकाउंटेंट ने मुझे बताया कि 1,74,000 रुपए आपको जमा करने होंगे। मैंने वह राशि जमा की और मुझे उसका वाउचर भी दिया गया। उसके बाद भी रजिस्ट्री नहीं की गई।

राजस्व से हाईकोर्ट तक पहुंचा मामला करीब 15 साल पहले मैंने मध्यप्रदेश शासन से अपना केस जीता था। जब रजिस्ट्री नहीं हुई तो मैंने हाई कोर्ट में केस लगाया और 2 साल पहले में हाई कोर्ट से भी केस जीत गया। अब हाउसिंग बोर्ड विभाग ने फिर से हाईकोर्ट में आवेदन लगाया है। इस मामले की सुनवाई फिर से की जाए। उन्होंने बताया कि इस बीच मैंने प्रशासन में और हाउसिंग बोर्ड ऑफिस में अनेक बार आवेदन दिए हैं। लेकिन कोई ध्यान नहीं दिया।

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