इंदौर। फाइनेंस कंपनी ने बिना बीमा के लोन दिया, पति की मृत्यु के बाद पत्नी से वसूली का प्रयास, उपभोक्ता आयोग ने महिला को दी राहत; जानिए पूरा मामला – देखें VIDEO

एक व्यक्ति ने मकान के लिए फाइनेंस कंपनी से लोन लिया। लोन को कवर करने के लिए लोन धारक का बीमा भी किया जाता है। यहां व्यक्ति से फाइनेंस कंपनी ने बीमा करने के लिए रुपए लिए लेकिन बीमा नहीं किया। बाद में वो मर गया और कंपनी ने पत्नी पर वसूली निकाल दी। इतना ही नहीं अपनी गलती छुपाने के लिए फाइनेंस कंपनी ने व्यक्ति के मरने के बाद उसे बीमा पॉलिसी दे दी। पत्नी की तरफ से जब उपभोक्ता आयोग में न्याय की गुहार लगाई गई तो कंपनी की पोल खुल गई। मामले में आयोग ने महिला से लोन के एवज में किसी भी प्रकार की वसूली नहीं करने और उसे क्षतिपूर्ति देने के निर्देश दिए हैं। जानिए सिलसिलेवार फाइनेंस कंपनी, बीमा कंपनी ने बचने के लिए क्या-क्या कहा लेकिन आयोग के सामने तर्क नहीं टिक सके और आखिर में क्या फैसला सुनाया गया।

ये है मामला सीमा पति स्व.यशवंत चौधरी निवासी सांवेर ने आवास फाइनेंस लिमिटेड और भारती एक्सा लाइफ इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड के खिलाफ उपभोक्ता आयोग में केस लगाया था। पति ने फाइनेंस कंपनी से 29 लाख 44 हजार रुपए का लोन मकान के लिए लिया था। कंपनी ने 28 लाख 13 हजार 274 रुपए लोन के लिए प्रदान किए। कंपनी ने बजाज एलायंस लाइफ इंश्योरेंस के नाम पर 71 हजार 264 रुपए की अग्रिम राशि प्राप्त की। इतना ही नहीं आईसीआईसीआई लोम्बार्ड प्रॉपर्टी इंश्योरेंस के नाम से भी 7 हजार 980 रुपए अग्रिम खाते से लिए थे। पति को दी गई होम लोन की सुरक्षा के लिए उन्हें बीमित किया था लेकिन कंपनी ने लोन की सुरक्षा के लिए बीमा नहीं करवाया। पति द्वारा लिए गए लोन पर 14 फरवरी 2020 को बीमा राशि खाते पर नामित कर दी गई। पति के जीवनकाल में उसका बीमा नहीं कराया गया। बीमा दो कंपनी से करवाकर रुपए लिए गए थे। 9 महीने तक बीमा नहीं करवाया गया। पति की 6 अगस्त 2020 को मृत्यु हो गई। आनन-फानन में भारती एक्सा लाइफ इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड ने अपनी जिम्मेदारी से बचने के लिए 7 सितंबर 2020 को एक अन्य कंपनी से बीमा करवा लिया। पति की मौत के बाद पत्नी को पता चला कि लोन पर आकस्मिक बीमा कराया गया है, जिसे बीमा कंपनी द्वारा निरस्त कर दिया गया। इधर कंपनी के द्वारा पत्नी से लोन की राशि वसूलने की कार्यवाही प्रारंभ कर दी गई। कंपनी ने वसूली के लिए नोटिस चस्पा किया। पत्नी ने उपभोक्ता आयोग में केस लगाकर गुहार लगाई की उसे मानसिक और शारीरिक त्रास के एवज में 50 हजार रुपए, केस खर्च 20 हजार रुपए दिलवाया जाए। साथ ही मकान पर किसी प्रकार की कोई नीलामी की कार्यवाही या अधिपत्य लेने की कार्यवाही न करें। संबंधित सभी दस्तावेज भी उसे लौटाए जाए। जो मृत्यु बीमा पर राशि देय है, वह फाइनेंस कंपनी से दिलवाई जाए। बीमा कंपनी को आदेश दिया जाए कि वो फाइनेंस कंपनी को ऋण खाते में समस्त बकाया राशि अदा करें।

आवास फाइनेंस ने ली 3 आपत्ति पति-पत्नी दोनों बैंक के ऋणी थे। बैंक उसमें क्रेडिटर है। पति और पत्नी दोनों सहऋणी थे इसलिए उनके बीच ऋणी और ऋणदाता के संबंध हैं। यहां उपभोक्ता और सेवा प्रदाता के कोई संबंध नहीं है। इसलिए केस जिला आयोग को सुनने का अधिकार नहीं है। दूसरी आपत्ति कंपनी ने ये ली कि ऋण नहीं चुकाने पर सरफेसी एक्ट 2002 के तहत कार्यवाही शुरू कर दी गई है। इसके बाद प्रकरण की सुनवाई का क्षेत्राधिकार जिला उपभोक्ता आयोग को नहीं है। इसलिए ये केस यहां सुनवाई योग्य नहीं है। तीसरी आपत्ति यह ली गई कि केस में धोखाधड़ी की बात कही गई है इसलिए ये मामला केवल सिविल न्यायालय सुन सकता है।

कंपनी ने कहा – बीमा इसलिए नहीं किया क्योंकि टायअप समाप्त हो गया आवास फाइनेंस की तरफ से उपभोक्ता आयोग को ये भी बताया गया कि पति यशवंत को गृह ऋण सुरक्षा की दृष्टि से बजाज एलायंस लाइफ इंश्योरेंस कंपनी की मास्टर पॉलिसी के अंतर्गत बीमित किया गया था। लेकिन उसके बाद बजाज एलायंस कंपनी से उसका टायअप समाप्त हो गया। इस वजह से पति का बीमा बजाज एलायंस से नहीं कराया जा सका। उसके बाद कोविड 19 के कारण बैंक का सुचारू रूप से संचालन नहीं हो पाया। इसलिए महिला के पति को बीमा सुविधा प्रदान नहीं की जा सकी।

 

मृत्यु के समय महिला के पति पॉलिसी के तहत इंश्योर्ड नहीं थे भारती एक्सा लाइफ इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड की तरफ से आयोग को बताया गया कि उसे गलत आधार पर पार्टी बनाया गया है। बीमा कंपनी पर धोखाधड़ी करने का आरोप लगाया गया है। यह गंभीर प्रकृति का आरोप है। इसमें गहन सबूत की जरूरत है इसलिए आयोग को यह केस सुनवाई का अधिकार नहीं है। क्योंकि आयोग के द्वारा संक्षिप्त विचारण अपनाया जाता है। इस पर केवल सिविल न्यायालय को ही सुनवाई का अधिकार है। पति को मास्टर बीमा पॉलिसी 31 अगस्त 2020 को जारी की गई थी। मृतक बीमा धारक द्वारा पॉलिसी की प्रीमियम का भुगतान 29 जुलाई 2020 को किया गया। पॉलिसी धारक की मृत्यु 6 अगस्त 2020 को हुई, जिसकी सूचना बीमा कंपनी को नहीं दी गई। पॉलिसी धारक का रिस्क कमेंसमेंट 11 अगस्त 2020 से शुरू कर दिया गया। मृत्यु के समय महिला के पति उक्त पॉलिसी के अंतर्गत इंश्योर्ड नहीं थे। इसलिए बीमा कंपनी कोई बीमा क्लेम देने के लिए दायित्वाधीन नहीं है। महिला के द्वारा बीमा के रुपए हड़पने के लिए पॉलिसी जारी रखी गई। महिला के द्वारा पॉलिसी लेते समय फ्रौड किया गया। मिसरिप्रजेंटेशन भी किया गया। वस्तु स्थिति छुपाते हुए करार में स्वीकृति ली गई है। इसलिए भारतीय संविदा अधिनियम के तहत कथित पॉलिसी शून्य है।

 

उपभोक्ता आयोग ने ये माना फाइनेंस कंपनी ने बीमा कंपनी को ग्रुप इंश्योरेंस पॉलिसी प्राप्त करने का प्रस्ताव दिया था। बीमा कंपनी के द्वारा ग्रुप मास्टर पॉलिसी का बीमित सदस्य महिला के पति यशवंत सिंह चौधरी को बीमा प्रमाण पत्र जारी किया गया। 31 अगस्त 2020 को सिंगल प्रीमियम 56 हजार 876 रुपए का भुगतान हुआ था। बीमा पॉलिसी के तहत सम इंश्योर्ड राशि 29 लाख 44 हजार रुपए रखी गई थी। महिला के पति की मौत 6 अगस्त 2020 को हुई और पॉलिसी की प्रीमियम का भुगतान 27 जुलाई 2020 को किया गया। इसके बाद पॉलिसी धारक की मौत हुई। रिस्क शुरू बाद में किया गया। फाइनेंस कंपनी का बीमा कंपनी से टाईअप समाप्त होने के कारण महिला के पति के बीमा में देरी हुई। जबकि पति को दिए गए लोन पर बीमा राशि प्राप्त कर ली गई थी लेकिन फाइनेंस कंपनी ने ये नहीं बताया है कि टाईअप कब खत्म हुआ। उसने क्यों बीमा राशि अपने पास रखी। महिला का पति बीमा की प्रीमियम दे चुका था और हस्ताक्षर भी कर चुका था, ऐसे में वो क्यों फाइनेंस कंपनी से संपर्क करेगा। बीमा कराने का दायित्व आवास फाइनेंस कंपनी का था। फाइनेंस कंपनी ने लोन सुरक्षा के लिए जोखिम की प्रीमियम ली थी, उसका दुरुपयोग किया और मृत्यु हो जाने पर लाभ से वंचित हो जाने दिया। बाद में अन्य बीमा कंपनी से आनन-फानन में नया बीमा कराया। अब सवाल ये खड़ा होता है कि क्या उस नए बीमे में महिला के पति ने हस्ताक्षर किए थे या नहीं या वह मर चुका था।

फाइनेंस कंपनी ने बीमा कंपनी और महिला दोनों के साथ छल किया आयोग ने माना कि बीमा कंपनी का कहना कि 31 अगस्त 2020 को प्रीमियम प्राप्त की थी। वहीं आवास फाइनेंस का कहना कि परिवादी को बुलाकर दूसरे बीमे के प्रस्ताव पर हस्ताक्षर लिए गए थे। यह कैसे संभव है। यदि पति की मौत 6 अगस्त को हो गई तो फाइनेंस कंपनी ने फर्जी प्रस्ताव बीमा कंपनी को दिया। इस तरह फाइनेंस कंपनी ने परिवादी और बीमा कंपनी दोनों के साथ छल किया है। क्योंकि जो व्यक्ति 6 अगस्त 2020 को मर गया वो 31 अगस्त 2020 को पॉलिसी के लिए हस्ताक्षर कैसे कर सकता है। आयोग ने ये फैसला सुनाया उपभोक्ता आयोग के अध्यक्ष बलराज कुमार पालोदा ने 30 अक्टूबर को फैसला सुनाया है कि महिला और उसके पति को दिए गए होम लोन की समस्त बकाया राशि जो उसकी मौत के बाद से बकाया थी, आवास फाइनेंस कंपनी महिला से नहीं लेगी। उसे एनओसी प्रदान करेगी और मार्डगेज की हुई समस्त संपत्ति के दस्तावेज एक महीने के भीतर महिला को फाइनेंस कंपनी देगी। 50 हजार रुपए क्षति और 20 हजार रुपए केस खर्च भी फाइनेंस कंपनी देगी। महिला से किसी प्रकार की कोई वसूली नहीं की जाएगी।

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