
स्मार्ट सिटी मिशन का मकसद था- शहर में स्मार्ट इन्फ्रास्ट्रक्चर और स्मार्ट सुविधाएं विकसित करना। पिछले नौ साल में स्मार्ट सिटी कंपनी ने इस मकसद के लिए मिले 950 करोड़ में से 837 करोड़ रु. खर्च डाले पर कुछ भी स्मार्ट नहीं हुआ। 2018 में इंदौर का चयन देश की पहली 100 स्मार्ट सिटी में हुआ और 5099 करोड़ के विकास प्रोजेक्ट का सपना दिखाया गया।
यह प्रोजेक्ट बढ़ते-बढ़ते 5522 करोड़ का हो गया। इसमें मूल रूप से 3 वर्ग किमी के एबीडी एरिया (राजबाड़ा से मल्हारगंज क्षेत्र, बियाबानी) को विकसित करना था। इसमें 87 प्रोजेक्ट पर 2635 करोड़ खर्च होना थे। दावा किया गया था कि शहर के 276 वर्ग किमी के क्षेत्र में कई प्रोजेक्ट्स लाए जाएंगे। जबकि हुआ यह कि 3 वर्ग किमी के एबीडी एरिया का डेवलपमेंट अभी तक अधूरा है।
9 सालों की हकीकत यह है कि स्मार्ट सिटी के नाम पर 150 प्रोजेक्ट ले लिए गए। इसमें सबसे ज्यादा 300 करोड़ सड़कें बनाने, हेरिटेज कंजर्वेशन के 77 करोड़ और रिवर फ्रंट के 66 करोड़ के प्रोजेक्ट ले लिए गए। उनमें सरकार की ग्रांट से मिले हजार करोड़ खर्च कर दिए।
ट्रैफिक समेत मूलभूत जरूरत के जो प्रोजेक्ट शहर को सीधे प्रभावित करते वे आज तक पेंडिंग हैं और स्मार्ट सिटी का खजाना खाली हो चुका है। 4 हजार करोड़ के प्रोजेक्ट कंपनी को खुद की आय से चलाने थे लेकिन आमदनी देने वाला एक भी प्रोजेक्ट शुरू नहीं हो सका।
रिवर फ्रंट डेवलपमेंट पर 66 करोड़ खर्चे… इनमें 26 करोड़ सिर्फ कृष्णपुरा ब्रिज से जवाहर मार्ग पर ही लगाए

1 प्रोजेक्ट को 10-12 टुकड़ों में दिखाया
कंपनी ने केंद्रीय आवास एवं शहरी विकास मंत्रालय को प्रोजेक्ट पूरा होने की गिनती दिखाई। हकीकत में कंपनी ने एक ही प्रोजेक्ट को 10-12 नाम से टुकड़ों में कर समय सीमा में पूरा होना दर्शाया। उदाहरण के लिए सड़क एक ही बनना थी लेकिन उसके कई टुकड़े कर अलग-अलग प्रोजेक्ट बताए गए। 10 कचरा ट्रांसफर स्टेशन भी स्मार्ट सिटी के मद से बनाए गए।
टायलेट मॉनिटरिंग भी इस मद से
स्मार्ट सिटी ने टायलेट मॉनिटरिंग सिस्टम, शहर में सुरक्षा व्यवस्था के लिए लगने वाले अस्थाई कैमरे और निगम कर्मचारियों के अटेंडेंस सिस्टम भी स्मार्ट सिटी के प्रोजेक्ट के रूप में दर्शाते हुए पैसा लगा दिया। इतना ही नहीं ऑफिसों में लिफ्ट से लेकर वाटर प्यूरिफायर मशीनें और फर्नीचर भी स्मार्ट सिटी के मद से ही लगाए गए।
सीधी बात- दिव्यांक सिंह, सीईओ स्मार्ट सिटी
चाहते हैं स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट को और समय मिले
स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट का अब क्या होगा? – इसे लेकर सरकार को फैसला लेना है, हम तो यही चाहते हैं कि प्रोजेक्ट को और समय मिले। प्रोजेक्ट्स अधूरे हैं, पैसा बचा नहीं, आमदनी हुई नहीं? – अलग-अलग कारण रहे हैं, जो प्रोजेक्ट चल रहे हैं उनमें भी 3-4 साल में पैसा आएगा।

23 प्रोजेक्ट पूरा करने के लिए फंड नहीं बचा
कंपनी के खाते में इतनी ही राशि बची है जिससे बमुश्किल स्टाफ की सैलरी और लगभग 100 करोड़ तक के प्रोजेक्ट्स के बिल दिए जा सके। कुल 23 बड़े प्रोजेक्ट्स के लिए फंड ही नहीं बचा है।
प्रोजेक्ट जो बंद करना पड़े
- 10.92 रिवरफ्रंट: जयरामपुर से लालबाग ब्रिज
- 16.42 ह्यूमन इफिशियंसी ट्रैकिंग भी अटकी
- 43.42 सुभाष मार्ग की सड़कें
- 2.18 रिवरफ्रंट का काम लटका
री-डेवलपमेंट के सिर्फ दो प्रोजेक्ट्स में मिली जमीन
1. एमओजी लाइन्स के साथ कुकुट पालन केंद्र में रेसिडेंशियल कमर्शियल कॉम्प्लेक्स का प्रोजेक्ट ही शुरू हुआ। इससे 848 करोड़ की आय संभावित है। स्टेटस : पहला चरण पूरा नहीं। 2. बक्षीबाग में रेसिडेंशियल कॉम्प्लेक्स बनाना था। इससे 32 करोड़ रुपए की आय होती। स्टेटस : इसे ड्रॉप कर दिया। 3. जिंसी की शासकीय प्रेस तोड़कर कॉम्प्लेक्स बनाना था। इससे 4-5 करोड़ की आय होगी। स्टेटस : इसे भी ड्रॉप कर दिया। 4. कबूतरखाना में नदी किनारे बसी छुग्गी को हटाकर मकान बनाने थे। इससे 10-15 करोड़ मिलते। स्टेटस : अब तक निर्णय नहीं। 5. वीर सावरकर मार्केट में ही दो रिडेवलपमेंट के प्रोजेक्ट थे। इनसे 5-6 करोड़ की आय संभावित थी। स्टेटस : पार्किंग प्लान की गई है। 6. नंदलालपुरा रोड पर पुराने तार घर के पास 10 हजार वर्ग फीट की जमीन पर भी कॉम्प्लेक्स बनाना था। 2-3 करोड़ की आय होती। स्टेटस : जमीन ही अलॉट नहीं हुई। 7. महूनाका के पास शासकीय जमीन है। कमर्शियल कॉम्प्लेक्स बनाना। 25-30 करोड़ आय होती। स्टेटस : जमीन ही अलॉट नहीं हुई। 8. लोधा कॉलोनी में स्लम हटाकर मकान बनाने थे। कमर्शियल हिस्से को बेचकर 15-20 करोड़ मिलते। स्टेटस : जमीन ही अलॉट नहीं हुई। 9. वीआईपी रोड पर भी कॉम्प्लेक्स बनाने की प्लानिंग थी। यहां से भी 3 करोड़ रु की आय संभावित थी। स्टेटस : इंदौर वायर फैक्टरी के पास जमीन अलॉट होना थी, अब तक नहीं हो सकी।