इंदौर। मेडिक्लेम देने से बचने के लिए बीमा कंपनी का अजीब तर्क, अस्पताल पर ज्यादा वसुली का आरोप लगाते हुए मरीज़ को ठहराया गलत – देखें VIDEO

 

इंदौर में मेडिक्लेम से बचने के लिए एक बीमा कंपनी के अजीब तर्कों को उपभोक्ता आयोग ने खारिज कर दिया। जब मरीज ने कोरोना के इलाज के बाद क्लेम लगाया तो बीमा कंपनी ने यह कहते हुए भुगतान काट लिया कि अस्पताल ने ज्यादा पैसा वसूला है। यही नहीं, एक ऐसी छुपी हुई शर्त गिना दी, जिससे सब हैरान रह गए। आयोग ने कोरोना काल के वक्त की अफरातफरी का जिक्र करते हुए पूरा इलाज खर्च मंजूर कर दिया। बीमा कंपनी की दलील खारिज कर दी कि इलाज महंगा कराया। बचा हुआ 48 हजार 307 रुपए डिस्चार्ज तारीख से 7% ब्याज दर से फरियादी को देना होगा।

इसके अलावा 10 हजार रुपए क्षतिपूर्ति और 5 हजार रुपए केस खर्च अलग से। मरीज को यह सलाह भी दी है कि उसे अस्पताल के खिलाफ भी कार्यवाही करनी चाहिए थी।

जानिए उपभोक्ता आयोग ने कोरोनाकाल के हालात बताते हुए कैसे फरियादी के पक्ष में फैसला दिया…

इंदौर में मूसाखेड़ी के खेमचंद जाटव (56) ने 24 दिसंबर 2020 से 23 दिसंबर 2021 के लिए 1 साल की मेडिक्लेम पॉलिसी ली थी। यह पॉलिसी स्टार हेल्थ एंड एलाईड इंश्योरेंस कंपनी से ली। इस अवधि के दौरान अप्रैल 2021 में कोरोना हो गया। बीमार पड़े तो इंदौर में बेड नहीं मिला। उज्जैन के पास बड़नगर के अशोक हॉस्पिटल में भर्ती कराया। इलाज पर कुल 70 हजार 807 रुपए खर्च हुए। हॉस्पिटल का बिल, दवाइयों और जांच का खर्च शामिल था।

करीब दो महीने बाद 11 जून 2021 को बीमा कंपनी में पेमेंट के लिए क्लेम किया। सभी दस्तावेज लगाकर क्लेम मांगा। इस पर स्टार हेल्थ ने 6 जुलाई 2021 को क्लेम राशि 70 हजार 807 में से सिर्फ 22 हजार 500 रुपए का ही भुगतान कर दिया। कम क्लेम देने का स्पष्ट कारण नहीं बताया। यह देख खेमचंद जाटव ने 8 जुलाई 2021 को बीमा कंपनी के मैनेजर को चिट्‌ठी लिखकर बाकी पैसा मांगा। लेकिन कोई जवाब नहीं मिला। 19 जुलाई 2021 को लीगल नोटिस भी भेजा मगर उसका भी कोई असर नहीं हुआ।

इसके बाद उपभोक्ता आयोग में केस लगाकर 48 हजार 307, मानसिक और आर्थिक कष्ट के 10 हजार और केस खर्च के 10 हजार रुपए दिलाने की मांग की गई। इसमें बीमा कंपनी के संभागीय प्रबंधक और प्रबंध निदेशक को पार्टी बनाया गया।

आयोग की सुनवाई में बीमा क्लेम नहीं देने के 3 कारण गिनाए..

1 – खेमचंद ने फैमिली हेल्थ ऑप्टिमा इंश्योरेंस पॉलिसी 18 दिसंबर 2018 से 17 दिसंबर 2019 तक के लिए ली। बीमा 10 लाख रुपए का था। पॉलिसी को 18 दिसंबर 2019 से 17 दिसंबर 2020 तक के लिए रिन्यू करवाया गया। तब बीमा 5 लाख रुपए का था। तीसरी बार में 24 दिसंबर 2020 से 23 दिसंबर 2021 तक के लिए रिन्यू करवाया लेकिन 17 दिसंबर से 24 दिसंबर के बीच 7 दिन की गेप हो गया था। पॉलिसी कुछ विशेष शर्तें और नियमों के तहत जारी हुई थी। ऐसे में बीमा पॉलिसी धारक इसकी शर्तें मानने के लिए बाध्य हैं।

2 – क्लेम राशि में से 22 हजार 500 रुपए का भुगतान किया। 48 हजार 307 रुपए काटा गया है क्योंकि इलाज पैकेज चार्ज में 7 हजार 500 रुपए प्रतिदिन के हिसाब से 3 दिन के 22 हजार 500 रुपए का भुगतान हुआ है। यह पर्याप्त चिकित्सकीय खर्च होता है जिसका भुगतान किया गया है, वह सही भी है।

3 – अस्पताल द्वारा ड्यूटी डॉक्टर चार्ज 10 हजार, सर्विस चार्ज 8 हजार, विजिटिंग डॉक्टर चार्ज 15 हजार के नाम पर ज्यादा शुल्क वसूला गया। अस्पताल के खिलाफ कार्यवाही करनी चाहिए थी लेकिन ये प्रक्रिया नहीं अपनाई गई। इसके लिए हम जवाबदार नहीं हैं। केस को निरस्त किया जाए।

(लेकिन एक भी दलील आयोग के सामने मान्य नहीं हुईं)

बता दें कि 2019-20 और 2020-21 के बीच पॉलिसी रिन्यू में सात दिन का अंतर है तो इसका आने वाली बीमारी पर कैसा असर? कंपनी के इस तर्क पर भी सब हैरान थे

आयोग ने कहा- बीमा कंपनी का निर्णय मनमाना

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