
सुप्रीम कोर्ट ने इंदौर हाई कोर्ट के उस आदेश को अस्वीकार कर दिया, जिसमें ढाई साल की एक बच्ची की कस्टडी उसके पिता को केवल इस आधार पर दी गई थी कि पिता उसका प्राकृतिक अभिभावक है। सुप्रीम कोर्ट ने इसे हाई कोर्ट का पूरी तरह से गलत दृष्टिकोण माना।
जस्टिस अभय एस ओका, जस्टिस ऑगस्टिन जार्ज मसीह की खंडपीठ ने कहा कि हमारी न्यायिक चेतना इस तथ्य से स्तब्ध है कि हाई कोर्ट ने बच्ची को एक हस्तांतरणीय चल संपत्ति के रूप में माना। यही तो समस्या है। हाई कोर्ट का कहना था कि यह सरल फॉर्मूला है- पिता प्राकृतिक अभिभावक है, बच्ची को पिता के पास वापस जाना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने कहा, ऐसा नहीं है। बच्ची का कल्याण सर्वोपरि है, न कि कस्टडी की मांग करने वाले पक्षों के कानूनी अधिकार। यह भी देखना होगा कि संतान का विकास, खुशी कहां बेहतर तरीके से हो रहा है।
हाईकोर्ट ने मौसी के पास बच्ची की अवैध कस्टडी मानी थी
अदालत ने पिता को कस्टडी देने के हाई कोर्ट के आदेश के खिलाफ बच्ची की मौसी की अपील पर अपना फैसला दिया था। बच्ची की मां की कथित दहेज हत्या के आरोप में पिता की गिरफ्तारी के बाद से बच्चा अपनी मौसी के पास है। बच्ची के पिता और दादा-दादी ने जमानत पर रिहा होने के बाद बच्ची की कस्टडी की मांग करते हुए हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी। हाई कोर्ट ने फैसले में कहा कि बच्ची मौसी की अवैध कस्टडी में है।
उसे उसके जैविक पिता और नाना-नानी को लौटाया जाना चाहिए। हाई कोर्ट ने मौसी को 15 दिन के भीतर पिता को कस्टडी सौंपने का निर्देश दिया, क्योंकि पिता ही प्राकृतिक अभिभावक है। इस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। सुनवाई के दौरान जस्टिस ओका ने हाई कोर्ट के इस तर्क पर असहमति जताई कि प्राकृतिक अभिभावक होने के नाते पिता को कस्टडी मिलनी चाहिए। पीठ ने सवाल किया कि बच्ची की मौसी के पास अभिरक्षा में कैसे खलल डाला जा सकता है, जबकि वह दो साल से मौसी के पास है। हम इस तरह कस्टडी में खलल नहीं डाल सकते। यह बच्ची के साथ अन्याय होगा।
पिता को बच्ची से 15 दिन में मिलने की अनुमति देने के अतिरिक्त, न्यायालय ने प्रस्ताव दिया कि बच्ची को धीरे-धीरे उसके पिता और दादा-दादी के करीब लाने में मदद करने के लिए एक बाल मनोवैज्ञानिक को शामिल किया जाए। पीठ ने संकेत दिया कि यदि पिता बाद में कस्टडी याचिका दायर करता है, तो पारिवारिक अदालत इन बैठकों में उसकी प्रतिक्रिया के आधार पर बच्ची तक पिता की पहुंच बढ़ाने पर विचार कर सकती है।
पिता मिल सकेंगे बच्ची से
सुप्रीम कोर्ट ने एक अंतरिम व्यवस्था का सुझाव दिया। इसमें पिता को सचिव की उपस्थिति में कानूनी सेवा प्राधिकरण के कार्यालय में हर पखवाड़े में एक बार अपनी बेटी से मिलने की अनुमति दी जाएगी।