
? जीवन में ईश्वर का अवतरण कैसे हो
~~~~~~~~~~
~ स्नेहा साकेत
हमारे जीवन का सुख-दुःख इस बात पर निर्भर करता है कि हम जीवन में क्या प्रकट करना चाहते हैं। अगर हम कोई छोटी वस्तु या छोटी बात या छोटी इच्छा या छोटे कर्म को प्रकट करना चाहते हैं तो हमारा जीवन बहुत कठिन हो जाता है।
यदि जीवन में दुःख, क्रोध, रोष, काम या चिंता है तो उसका सीधा कारण है कि हम किसी छोटी चीज़ को प्रकट करना चाहते हैं या किसी झूठी वस्तु को सच बनाना चाहते हैं। दुःख मतलब – हमारी छोटी चीज़ बड़ी नहीं बन पा रही है या झूठी चीज़ सच नहीं हो पा रही है। उदाहरणतः संसार के सभी सम्बन्ध एकदम झूठ हैं पर हम उनको सच बनाना चाहते हैं, और इसलिए दुःखी रहते हैं।
हम सब माया की ऐसी कठपुतली बन गए हैं कि हर झूठ बात को सच बनाना चाहते हैं और उसके लिए दिन-रात मेहनत करते रहते हैं।
वेदान्त में बोलते हैं कि जो ‘अनन्त’ होता है उसमें ही ‘आनन्द’ होता है। किसी भी छोटी चीज़ के साथ आनन्द नहीं जुड़ा होता है, चाहे वो कर्म हो या सम्बन्ध हो या वस्तु हो। हर छोटी चीज़ के साथ केवल दुःख, भय और अज्ञान जुड़ा रहता है।
जीवन का एक ही लक्ष्य होना चाहिए – अपने अंदर जो परमात्मा छिपा है उसको उजागर करें, उसको प्रकट करें। ईश्वर को प्रकट न कर पाना या प्रकट करने की इच्छा न होना, यही हमारी सबसे बड़ी कमज़ोरी है।
जब तक हम स्वयं को छिपाते नहीं हैं, अहंकार और ममता को खत्म नहीं करते हैं, तब तक ईश्वर प्रकट नहीं होंगे। अपने आपको छोटे से छोटा बनाकर ईश्वर को बड़े से बड़ा बनाना – यही जीवन का लक्ष्य होना चाहिए और इसी से ईश्वर सिद्ध होते हैं और हमें स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं।
हम जो भी कर्म करें, उसमें ईश्वर प्रकट होना चाहिये, और यह तपस्या से संभव है। तपस्या मतलब मूक ईश्वर को वांगमयी बना देना। साधक को बार-बार मन में जाकर ईश्वर से पूछना चाहिये कि, ‘हम आपकी प्रसन्नता के लिए क्या करें, क्या बोलें, क्या सोचें, कहाँ जाएँ, कैसे पूजा करें?’ ये जो लालसा होती है, प्यास होती है ईश्वर को प्रसन्न करने की, यही हमारी वाणी को और आचरण को शुद्ध बनाती है, और हमारे जीवन में ईश्वर को प्रकट करती है।