नारद जयंती पर विशेष नारद मुनि संचारकर्ता, संचार जीवन के लिए बहुत आवश्यक है- डॉ शास्त्री

नारद जयंती पर विशेष
नारद मुनि संचारकर्ता, संचार जीवन के लिए बहुत आवश्यक है- डॉ शास्त्री
17 को मनाई जाएगी संसार के प्रथम पत्रकार नारद जी की जयंती
धार। नारायण नारायण नारायण…… यह शब्द सुनते ही हाथ में वीणा विणा लिए भगवान विष्णु का नाम लेते हुए एक स्थान से दूसरे स्थान पर भ्रमण करने वाले नारद जी की और ध्यान जाता है। इस संदर्भ में विस्तृत जानकारी देते हुए पत्रकार डॉ अशोक शास्त्री ने बताया कि नारद मुनि को एक संचारकर्ता के लिए जाना जाता है। संचार जीवन के लिए बहुत आवश्यक है। इसी के माध्यम से ही एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति जुड़ सकता है। यदि जीवन में संचार न हो तो जीवन का कोई मतलब नही रहेगा। वतर्मान समय में हमारे पास संचार के अनेकानेक साधन जिसमें रेडियो, टेलीविजन, समाचार पत्र एवं इंटरनेट के माध्यम मे एक क्षण में पूरे विश्व की जानकारी मिल जाती है, परंतु पृथ्वी पर और परलोक में सर्व प्रथम संचार का श्रेय नारद मुनि को ही जाता है।। उन्हे सृष्टि का प्रथम संवाददाता कहा जाता है, जो अपना कार्य एक पत्रकार के रुप में पूर्ण लगन, ईमानदारी के पूर्ण करते थे। संचार के माध्यमों से विचारों और जानकारी को साझा करना आसान हो जाता है । पूर्व ऐतिहासिक काल से संचार की क्रिया चल रही है। न केवल मनुष्य बल्कि पौधे भी अपनी भाशा मे संवाद करते है ।
संवादों का किया आदान-प्रदान
डॉ शास्त्री के मुताबिक देवर्षि नारद ने इस लोक से दूसरे लोक में भ्रमण करते हुए संवादों का आदान – प्रदान कर पत्रकारिता का कार्य प्रारंभ किया, इसीलिए नारदजी पत्रिकारिता के प्रथम पत्रकार थे, जो पूरे लोक में भ्रमण करते हुए संवाद का सेतु बनाते हुए संवाददाता की भूमिका निभाते थे। नारद जी प्राकट्योत्सव के उपलक्ष्य में ही नारद जयंती मनाई जाती है। इस वर्श नारद जयंती 17 मई 2022 मंगलवार को मनाई जाएगी।
भगवान विष्णु के थे अन्नय भक् त
डॉ शास्त्री ने बताया की हिंदू मान्यतानुसार नारद मुनि का जन्म सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा जी की गोद से हुआ था। ऋषि नारद मुनि की जयंती हर वर्ष मास ज्येष्ठ कृश्ण पक्ष की द्वितीया को मनाई जाती है। नारद जी ब्रह्मदेव के सात मानस पुत्रों में से एक है। कहा जाता है कि कठिन तपस्या के बाद नारद जी को ब्रह्मर्षि का पद प्राप्त हुआ । नारद जी बहुत ज्ञानी थे इसीलिए राक्षस हो या देवी – देवता सभी उनका बहुत सत्कार करते थे। कहते है कि नारद मुनि के श्राप के कारण ही भगवान राम को देवी सीता से वियोग सहना पड़ा था। वे भगवान विष्णु के अनन्य भक्तों मे से एक माने जाते है।

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