‘जस्टिस स्वामीनाथन ब्राह्मणिक इकोसिस्टम के बड़े समर्थक हैं। कोर्ट प्रोसिडिंग में साफ दिखता है कि वे खास कम्युनिटी के वकीलों के साथ साठगांठ में काम करते हैं। कई वकीलों ने उनके आदेशों के खिलाफ शिकायत की है। आम लोग आदेशों को गहराई से नहीं देखते, लेकिन वकील जानते हैं कि कैसे यह पैटर्न चल रहा है।’
तमिलनाडु के मद्रास हाईकोर्ट में सीनियर एडवोकेट सारनाथन मदुरै बेंच के जस्टिस जीआर स्वामीनाथन पर जाति के आधार पर भेदभाव के गंभीर आरोप लगाते हैं। वे कहते हैं कि जस्टिस स्वामीनाथन का RSS की विचारधारा की ओर झुकाव है और वे ब्राह्मण वकीलों को तरजीह देते हैं। ये व्यवहार कानूनी निष्पक्षता के खिलाफ है।
जस्टिस स्वामीनाथन का विरोध करने वालों में एडवोकेट सारनाथन अकेले नहीं हैं। मद्रास हाईकोर्ट के 8 से ज्यादा पूर्व जस्टिस और कई वकील भी उनका विरोध कर रहे हैं। DMK और इंडिया ब्लॉक के 120 सांसदों ने स्वामीनाथन को हटाने के लिए लोकसभा में महाभियोग का नोटिस दिया है।

पूरा मामला शुरू कहां से हुआ
9 दिसंबर को कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी, सपा सांसद अखिलेश यादव, DMK सांसद कनिमोझी के साथ विपक्ष के 120 सांसदों ने लोकसभा अध्यक्ष को महाभियोग का नोटिस सौंपा। इसमें जस्टिस स्वामीनाथन पर आरोप लगाया है कि वे खास समुदाय के वकीलों को गलत तरीके से फायदा पहुंचाते हैं। साथ ही वे फैसले खास राजनीतिक विचारधारा के आधार पर लेते हैं, जो भारतीय संविधान के सेक्युलर सिद्धांतों के खिलाफ है।
यह नोटिस जस्टिस स्वामीनाथन के 2 दिसंबर के एक फैसले के बाद आया। उन्होंने मदुरै के तिरुपरनकुंद्रम पहाड़ी पर दरगाह के पास एक पत्थर के खंभे पर दीया जलाने की इजाजत दी थी। इसके लिए विश्व हिंदू परिषद और दूसरे हिंदू संगठनों ने याचिका दाखिल की थी।
जस्टिस स्वामीनाथन के फैसले पर तमिलनाडु की DMK सरकार ने आरोप लगाया कि VHP और जस्टिस स्वामीनाथन सांप्रदायिक तनाव भड़का रहे हैं। सरकार ने फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है।

हालांकि, 50 से ज्यादा पूर्व जजों ने जस्टिस स्वामीनाथन के खिलाफ महाभियोग का विरोध किया है। गृह मंत्री अमित शाह ने भी 10 दिसंबर को सदन में कहा कि विपक्षी सांसद अपने वोट बैंक को ध्यान में रखकर महाभियोग प्रस्ताव लाए हैं। उन्होंने कहा, ‘आजादी के बाद इतने साल में ऐसा कभी नहीं हुआ कि कोई जज फैसला सुनाएं, तो उन्हें इस तरह से महाभियोग का सामना करना पड़ रहा हो।’
जस्टिस स्वामीनाथन पर ब्राह्मणवाद को बढ़ावा देने के आरोप क्यों लगे
11 अगस्त को भी INDIA ब्लॉक के लगभग 50 सांसदों ने CJI और राष्ट्रपति को लेटर लिखा था। उन्होंने आरोप लगाया कि सिंगल जज बेंच के दौरान जस्टिस ने खास वकीलों के केसों को लिस्टिंग में तवज्जो दी और टाइम स्लॉट अलॉट किया। खासतौर पर ब्राह्मण समुदाय के वकीलों और दक्षिणपंथी समूहों से जुड़े वकीलों को ये राहत दी गई।
इसके अलावा इसी साल 14 जून को मद्रास हाईकोर्ट के वकील एस. वंचिनाथन ने चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया के सामने जस्टिस स्वामीनाथन पर जातिगत पक्षपात जैसे गंभीर आरोप लगाए।
इसके बाद 25 जुलाई को एक अलग केस की सुनवाई के दौरान जस्टिस स्वामीनाथन ने एडवोकेट वंचिनाथन को कोर्ट में बुलाया। 28 जुलाई को जस्टिस स्वामीनाथन और जस्टिस के. राजशेखर की बेंच ने सुनवाई में कहा कि वकील के आरोप आपराधिक अवमानना के दायरे में आते हैं।
इस फैसले के बाद वकीलों ने कोर्ट परिसर में विरोध प्रदर्शन किया। जस्टिस के. चंदू समेत 8 रिटायर्ड जजों ने जॉइंट लेटर जारी कर वंचिनाथन का सपोर्ट किया। उन्होंने जस्टिस स्वामीनाथन से अपील की थी कि वे इस मामले से खुद को अलग रखें।

कोर्ट में वकीलों से पक्षपात का आरोप
मदुरै बैंच में प्रैक्टिस करने वाले सीनियर एडवोकेट सारनाथन जस्टिस स्वामीनाथन के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं। वे अभी जस्टिस स्वामीनाथन की कोर्ट में ही प्रैक्टिस कर रहे हैं। वे आरोप लगाते हैं कि जस्टिस कोर्ट में खास समुदाय के वकीलों का फेवर करते हैं। उनसे असहमत वकीलों पर कोर्ट में अपमानजनक टिप्पणियां करते हैं।
सारनाथन एडवोकेट वंचिनाथन केस की सुनवाई का जिक्र करते हुए बताते हैं, ‘मैंने उनके कोर्ट में सीधे कोई केस नहीं लड़ा, लेकिन एडवोकेट वंचिनाथन को ‘कावर्ड’ (कायर, डरपोक) कहा गया, तब मैं कोर्ट में मौजूद था।’
‘CJI से शिकायत पर जस्टिस को आधिकारिक तरीके से जवाब देना चाहिए था, लेकिन उन्होंने गुस्से में वंचिनाथन को कोर्ट में पेश होने के लिए कहा। ये सही नहीं था। वंचिनाथन ब्राह्मण समुदाय से नहीं आते और दलितों के लिए काफी एक्टिव रहे हैं।’
वकील अवमानना के डर से बोलने से बच रहे मद्रास हाईकोर्ट एक वकील कहते हैं कि सिटिंग जज के
आरोपः जज बनने के बाद RSS के कार्यक्रम में गए थे जस्टिस स्वामीनाथन
एडवोकेट सारनाथन जस्टिस स्वामीनाथन के जज बनने को ही गलत मानते हैं। वे कहते हैं कि वकालत के दौरान जस्टिस RSS विचारधारा के समर्थक थे। तब ये उनकी निजी राय हो सकती है, लेकिन जज बनना पूरी प्रक्रिया के विरुद्ध था। जज बनने के बाद भी वे निष्पक्ष नहीं रहे।

सोर्स बताते हैं कि 1994 में जस्टिस स्वामीनाथन ने तमिलनाडु से डेलिगेट के तौर पर RSS की लॉयर विंग अखिल भारतीय अधिवक्ता परिषद की बैठक में हिस्सा लिया था। 2023 में जज बनने के बाद वे परिषद के राष्ट्रीय सम्मेलन में दोबारा गए। यहां उन्होंने कहा कि मैं परिषद का कार्यकर्ता हूं।
इसके अलावा मार्च, 2023 में हरियाणा में RSS के एक कार्यक्रम में शामिल हुए थे। इसमें उन्होंने भारतीय संविधान को कॉपी किया हुआ दस्तावेज बताते हुए कहा कि यह 1935 के गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट से लिया गया है और इसमें कोई मौलिकता नहीं है।
सारनाथन महाभियोग को सही तरीका नहीं मानते, लेकिन वे फिर भी इसका समर्थन करते हैं। इसके पीछे कारण बताते हैं, ‘महाभियोग जजमेंट को चुनौती देने का सही रास्ता नहीं है क्योंकि डिवीजन बेंच और सुप्रीम कोर्ट में अपील का विकल्प मौजूद है। फिर भी जज के पक्षपात वाले फैसलों को सार्वजनिक रूप से उजागर करने के लिए यह जरूरी था।’
सारनाथन दावा करते हैं कि सभी बार एसोसिएशन जज के रवैये के खिलाफ हैं। मदुरै बेंच में भी उनके खिलाफ
सारनाथन दावा करते हैं कि सभी बार एसोसिएशन जज के रवैये के खिलाफ हैं। मदुरै बेंच में भी उनके खिलाफ विरोध प्रदर्शन हुए। मद्रास हाईकोर्ट में विरोध हुआ।
तिरुपरनकुंद्रम विवाद में असंवेदनशीलता का आरोप एडवोकेट सारनाथन तिरुपरनकुंद्रम विवाद में जस्टिस स्वामीनाथन पर असंवेदनशीलता का आरोप लगाते हैं। वे कहते हैं कि उनके फैसले ने मंदिर में 100 से ज्यादा साल से चले आ रहे रिवाज को अचानक बदल दिया। ये फैसला सामाजिक संतुलन को बिगाड़ सकता है।

पूर्व जस्टिस बोले- स्वामीनाथन कम उम्र से ही RSS से जुड़े
जस्टिस स्वामीनाथन के विरोध में सबसे ज्यादा मुखर मद्रास हाईकोर्ट के पूर्व जस्टिस के. चंदू हैं। वे दलितों के लिए काम करते रहे हैं। उनके ऊपर जय भीम नाम से फिल्म बन चुकी है। वे आरोप लगाते कि स्वामीनाथन कॉलेज में ABVP के सदस्य थे। उन्होंने यह कहकर छात्रों को लामबंद करना शुरू किया था कि लॉ स्कूल का सिलेबस बेकार है।
’10 साल से ज्यादा वक्त तक उन्होंने चेन्नई में प्रैक्टिस की। 2004 में नए बने मदुरै बेंच में शिफ्ट हो गए। मदुरै में नेटवर्क बढ़ाया और RSS से जुड़े रहे भारत के उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन के करीबी हो गए।’
पूर्व जस्टिस चंद्रू कहते हैं कि स्वामीनाथन ने भारत के एडिशनल सॉलिसिटर जनरल का पद हासिल करने की कोशिश की, लेकिन कामयाब नहीं हुए।
महाभियोग के लिए मिसबिहेवियर साबित होना जरूरी पूर्व जस्टिस चंद्रू महाभियोग नोटिस को सही मानते हैं। वे कहते हैं, ‘आर्टिकल 217 के तहत हाईकोर्ट जज पर महाभियोग के लिए मिसबिहेवियर साबित होना जरूरी है। इसमें कोर्ट के बाहर गलत बर्ताव या भ्रष्ट फैसले भी शामिल होते हैं।’
‘स्वामीनाथन का कोर्ट के बाहर आचरण 1999 के ज्यूडिशियल स्टेटमेंट ऑफ वैल्यूज के विरुद्ध है। वे हिंदुवादी और RSS से जुड़े वकीलों की बैठकों में गए। यहां वे भारतीय संविधान और कानून की आलोचना करते हैं और शास्त्रों-पुराणों को मौजूदा कानूनी व्याख्या का विकल्प बनाने की वकालत करते हैं।’
हालांकि पूर्व जस्टिस चंद्रू मिसबिहेवियर साबित करने को चैलेंजिंग बताते हैं। वे समझाते हैं कि सिटिंग जज के आचरण पर चर्चा में ऑब्जेक्टिव स्टैंडर्ड बनाना मुश्किल है क्योंकि उन्हें ऑर्डर देने की गहराई से समझ है। 80% सिटिंग जज उनके व्यवहार और आचरण से नाराज हैं, लेकिन कुछ वकीलों का सपोर्ट उन्हें मिला हुआ है।
सपोर्ट की वजह क्या है? पूर्व जस्टिस बताते हैं, ‘जस्टिस स्वामीनाथन वकीलों को चतुराई से प्रभावित करते हैं।

हालांकि कई वकील जस्टिस स्वामीनाथन का समर्थन करते हैं। मद्रास हाईकोर्ट में प्रैक्टिस करने वाले वकील रामास्वामी मयप्पन जस्टिस स्वामीनाथन पर लगे आरोपों को राजनीति से प्रेरित मानते हैं। वे कहते हैं, ‘जस्टिस स्वामीनाथन 2023 में जज रहते हुए ABAP के प्रोग्राम में गए थे। पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी और पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी तक RSS के फंक्शन में गए हैं। RSS वैध संगठन है। उसकी अधिवक्ता परिषद रजिस्टर्ड सोसायटी है। उसके कार्यक्रम में जाना गलत नहीं है।’
ब्राह्मणवाद को बढ़ावा देने के आरोपों को भी रामास्वामी खारिज करते हैं। वे कहते हैं, उनके केस की संख्या सार्वजनिक है। गैर-ब्राह्मण वकीलों को भी उनसे फायदा मिला है। जस्टिस स्वामीनाथन के खिलाफ महाभियोग का नोटिस न्यायपालिका को कंट्रोल करने की कोशिश हैं। DMK को कोई फैसला पसंद नहीं आया तो ऐसा प्रस्ताव ले आए।
जर्नलिस्ट बोले- जस्टिस का एक विचारधारा की ओर झुकाव दिखता है
तमिलनाडु में द रूसटर न्यूज के नाम से यूट्यूब चैनल चला रहे सीनियर जर्नलिस्ट राहुल मानते हैं कि जस्टिस एम. स्वामीनाथन पर लगे आरोपों में दम हैं। वे बताते हैं कि स्वामीनाथन 2014 से 2017 तक एडिशनल

जस्टिस स्वामीनाथन के विवादित फैसले और बयान 1. बैन हो चुकी धार्मिक प्रथा को मंजूरी
2024 में एक याचिकाकर्ता ने तमिलनाडु के करूर में एक मंदिर उत्सव में अन्नदान और अंगप्रदक्षिणम की अनुमति मांगी। अंगप्रदक्षिणम के तहत मडे स्नाना में ब्राह्मणों के खाने के बाद बचे केले के पत्तों पर लोटा जाता है। एक डिवीजन बेंच ने इसे अमानवीय बताते हुए बैन लगा दिया था।
जस्टिस स्वामीनाथन की सिंगल बेंच ने इस प्रथा को मंजूरी दे दी। उन्होंने डिवीजन बेंच के पुराने फैसले को शून्य घोषित कर दिया, जो सिंगल बेंच जज का काम नहीं है। डिवीजन बेंच ने बाद में उनका फैसला पलट दिया और इसे न्यायिक अनुशासनहीनता कहा।
2. PM पर कमेंट करने वाले को क्रिप्टो-क्रिश्चियन कहा 18 जुलाई 2021 को तमिलनाडु विधानसभा चुनाव के दौरान एक विरोध प्रदर्शन में दिए भाषण के लिए 2022 में एक ईसाई प्रीस्ट पर मुकदमा चला। उन पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह पर अपमानजनक टिप्पणियां करने वाले बयानों का आरोप लगा था।
इस पर जस्टिस स्वामीनाथन ने अपने फैसले में
3. लड़की की आत्महत्या में जबरन धर्मांतरण की जांच कराई
2022 में 17 साल की लड़की की आत्महत्या का केस जस्टिस स्वामीनाथन के सामने आया था। उन्होंने लड़की के कैथोलिक स्कूल की तरफ से धर्मांतरण का दबाव बताकर जांच CBI को सौंप दी। उन्होंने तमिलनाडु पुलिस की आलोचना की। CBI को जबरन धर्मांतरण का कोई सबूत नहीं मिला।