
इस दुनिया की बड़ी उलटी नीति है। लोग मानते हैं कि समाज में चंद्रशेखर आजाद जैसे महान क्रांतिकारियों की जरूरत आज भी है, पर यह भी साथ में उनकी इच्छा रहती है कि “आजाद” हमारे पड़ोसी के घर में पैदा हो। हमारे घर में तो वह योग्य बालक जन्म ले, जो किसी बड़े पद पर समाज में रसूखदार और ओहदेदार रहे और उसके जरिए घर में लक्ष्मी की बरसात होती रहे। लक्ष्मी आए, तरीका चाहे नैतिक हो या घोर अनैतिक…इससे कुछ भी लेना देना नहीं है ऐसी मानसिकता वाले लोगों को। और यही वजह है कि आज लोगों के पास शिकायतों का अंबार है, समाज में समस्याओं का भंडार है और हर तरफ सड़ी गली मानसिकता का पहाड़ इकट्ठा है। ऐसा कहना नहीं चाहिए और लिखना तो बिल्कुल भी नहीं चाहिए, पर लोगों को मुफ्त का मिले तो घर में चार-चार चार पहिया वाहन होने पर भी महिलाएं लाड़ली बहना बनने पर आमादा हों तो ऐसी मानसिकता को किस तरह देखा जा सकता है। या अमीर लोगों को भी आयुष्मान कार्ड बनवाकर मुफ्त में इलाज कराने का रोग लग जाए, तो ऐसी मानसिकता को क्या कहा जाए। ऐसा हो रहा है और यही मानसिकता वजह बनी है आजादी के अमृत महोत्सव के समय भी समाज में व्याप्त समस्याओं से आजादी न मिल पाने की। इसीलिए आज समाज के हर घर में चंद्रशेखर आजाद के पैदा होने की जरूरत है। हर घर में आजाद रूपी मानसिकता का वास होगा, तब घर में धन का अंबार लगाने के लिए राष्ट्र को खोखला करने की घृणित मानसिकता से निजात मिल पाएगी। तब जाकर राष्ट्र रामराज्य की तरफ हर कदम बढ़ा पाएगा।
आजाद की चर्चा इसलिए, क्योंकि 23 जुलाई को ही चंद्रशेखर आजाद का जन्म हुआ था। और मध्यप्रदेश वासियों के लिए गर्व की बात है कि चन्द्रशेखर आजाद का जन्म भाबरा गाँव (अब चन्द्रशेखर आजादनगर, वर्तमान अलीराजपुर जिला) में 23 जुलाई सन् 1906 को हुआ था। उनके पूर्वज ग्राम बदरका वर्तमान उन्नाव जिला (बैसवारा) से थे। आजाद के पिता पण्डित सीताराम तिवारी अकाल के समय अपने पैतृक निवास बदरका को छोड़कर पहले कुछ दिनों मध्य प्रदेश की अलीराजपुर रियासत में नौकरी करते रहे फिर जाकर भाबरा गाँव में बस गये। यहीं बालक चन्द्रशेखर का बचपन बीता। उनकी माँ का नाम जगरानी देवी था।आजाद का प्रारम्भिक जीवन आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र में स्थित भाबरा गाँव में बीता और उन्हीं आदिवासी बालकों के बीच धनुष बाण से उन्होंने जो अचूक निशाना लगाना सीखा, तो फिर उनका निशाना कभी नहीं चूका। यह भाबरा गांव ही आज सबसे बड़ा तीर्थ है। यदि यहां पर जाकर हर युवा मत्था टेकें तो शायद राष्ट्र के लिए सर्वस्व लुटाने वाले युवा तैयार हो सकें।
आजाद की मानसिकता को समझने के लिए एक ही उदाहरण काफी है। 1919 में हुए अमृतसर के जलियांवाला बाग नरसंहार ने देश के नवयुवकों को उद्वेलित कर दिया। चन्द्रशेखर उस समय पढ़ाई कर रहे थे। जब गांधीजी ने सन् 1920 में असहयोग आन्दोलनका फरमान जारी किया तो वह आग ज्वालामुखी बनकर फट पड़ी और तमाम अन्य छात्रों की भाँति चन्द्रशेखर भी सडकों पर उतर आये। अपने विद्यालय के छात्रों के जत्थे के साथ इस आन्दोलन में भाग लेने पर वे पहली बार गिरफ़्तार हुए और उन्हें 15 बेतों की सज़ा मिली। इस घटना का उल्लेख पं० जवाहरलाल नेहरू ने कायदा तोड़ने वाले एक छोटे से लड़के की कहानी के रूप में किया है- ऐसे ही कायदे (कानून) तोड़ने के लिये एक छोटे से लड़के को, जिसकी उम्र 14 या 15 साल की थी और जो अपने को आज़ाद कहता था, बेंत की सजा दी गयी। उसे नंगा किया गया और बेंत की टिकटी से बाँध दिया गया। बेंत एक-एक कर उस पर पड़ते और उसकी चमड़ी उधेड़ डालते। पर वह हर बेत के साथ चिल्लाता’भारत माता की जय!’। वह लड़का तब तक यही नारा लगाता रहा, जब तक की वह बेहोश न हो गया। बाद में वही लड़का उत्तर भारत के क्रान्तिकारी कार्यों के दल का एक बड़ा नेता बना। यह लड़का था चंद्रशेखर आजाद। मध्यप्रदेश के करोड़ों निवासी यह भी गर्व कर सकते हैं कि यह बालक अपने क्रांतिकारी जीवन के पड़ाव में कुछ समय ओरछा भी ठहरा था और वह ओरछा पवित्र स्थल आज रामराजा सरकार के साथ चंद्रशेखर आजाद के नाम से भी जाना जाता है। यह ओरछा धार्मिक के साथ क्रांतिकारियों का और आजाद विचारधारा का भी तीर्थ है।
और अंत में बस इतना कि जब अपनी क्रांतिकारी गतिविधियों को अंजाम देते हुए आजाद ने 27 फरवरी 1931 को अपना बलिदान इलाहाबाद के अल्फ्रेड पार्क में दिया और अंग्रेजों द्वारा उनका अंतिम संस्कार चुपचाप कर दिया गया। जब इसकी भनक लोगों को लगी, तब सारा प्रयागराज अलफ्रेड पार्क में उमड़ पड़ा। जिस वृक्ष के नीचे आजाद शहीद हुए थे लोग उस वृक्ष की पूजा करने लगे। वृक्ष के तने के इर्द-गिर्द झण्डियाँ बाँध दी गयीं। लोग उस स्थान की माटी को कपड़ों में शीशियों में भरकर ले जाने लगे। समूचे शहर में आजाद के बलिदान की खबर से जबरदस्त तनाव हो गया। शाम होते-होते सरकारी प्रतिष्ठानों पर हमले होने लगे। लोग सड़कों पर आ गये।आज़ाद के बलिदान की खबर जवाहरलाल नेहरू की पत्नी कमला नेहरू को मिली तो उन्होंने तमाम काँग्रेसी नेताओं व अन्य देशभक्तों को इसकी सूचना दी। बाद में शाम के वक्त लोगों का हुजूम पुरुषोत्तम दास टंडन के नेतृत्व में प्रयागराज के रसूलाबाद शमशान घाट पर कमला नेहरू को साथ लेकर पहुँचा। अगले दिन आजाद की अस्थियाँ चुनकर युवकों का एक जुलूस निकाला गया। इस जुलूस में इतनी ज्यादा भीड़ थी कि प्रयागराज की मुख्य सडकों पर जाम लग गया। ऐसा लग रहा था जैसे प्रयागराज की जनता के रूप में सारा हिन्दुस्तान अपने इस सपूत को अंतिम विदाई देने उमड पड़ा हो। जुलूस के बाद सभा हुई। सभा को शचीन्द्रनाथ सान्याल की पत्नी प्रतिभा सान्याल ने सम्बोधित करते हुए कहा कि जैसे बंगाल में खुदीराम बोस की बलिदान के बाद उनकी राख को लोगों ने घर में रखकर सम्मानित किया वैसे ही आज़ाद को भी सम्मान मिला।
तो ऐसी आजाद मानसिकता की जरूरत आज हर घर को है। तब ही आत्मनिर्भर भारत जन्म ले पाएगा। तब ही हर महिला को सम्मान मिल पाएगा। और तब ही अपराध मुक्त और भ्रष्टाचार मुक्त राष्ट्र का निर्माण हो पाएगा…। अब पड़ोस में नहीं, बल्कि हर घर में “आजाद” और “आजाद मानसिकता” की जरूरत है…। तभी 24 साल का युवा भी समाज में पूजा जाएगा और हर घर के युवा में आजाद को देख राष्ट्र प्रफुल्लित होगा…।

कौशल किशोर चतुर्वेदी
कौशल किशोर चतुर्वेदी मध्यप्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार हैं। प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में पिछले ढ़ाई दशक से सक्रिय हैं। दो पुस्तकों “द बिगेस्ट अचीवर शिवराज” और काव्य संग्रह “जीवन राग” के लेखक हैं। स्तंभकार के बतौर अपनी विशेष पहचान बनाई है।
वर्तमान में भोपाल और इंदौर से प्रकाशित दैनिक समाचार पत्र “एलएन स्टार” में कार्यकारी संपादक हैं। इससे पहले इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में एसीएन भारत न्यूज चैनल में स्टेट हेड, स्वराज एक्सप्रेस नेशनल न्यूज चैनल में मध्यप्रदेश संवाददाता, ईटीवी मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ में संवाददाता रह चुके हैं। प्रिंट मीडिया में दैनिक समाचार पत्र राजस्थान पत्रिका में राजनैतिक एवं प्रशासनिक संवाददाता, भास्कर में प्रशासनिक संवाददाता, दैनिक जागरण में संवाददाता, लोकमत समाचार में इंदौर ब्यूरो चीफ दायित्वों का निर्वहन कर चुके हैं। नई दुनिया, नवभारत, चौथा संसार सहित अन्य अखबारों के लिए स्वतंत्र पत्रकार के तौर पर कार्य कर चुके हैं।