राज-काज

राज-काज
* दिनेश निगम ‘त्यागी’
0 आयकर छापों के औचित्य पर सवाल….
– आयकर विभाग ने बिल्डर राघवेंद्र सिंह तोमर एवं उसके सहयोगी पीयूष गुप्ता के ठिकानों पर जिस ताबड़तोड़ तरीके से छापे की कार्रवाई की, उसी रफ्तार से यह सिमटती भी दिख रही है। अभी से कहा जाने लगा है कि इन छापों का हश्र भी पहले के कई मामलों की तरह ‘ढाक के तीन पात’ जैसा होने वाला है। लोकसभा चुनाव से पहले तत्कालीन मुख्यमंत्री कमलनाथ से जुड़े लोगों के यहां छापे पड़े थे। नगदी के साथ करोड़ों की संपत्ति मिली थी। बाद में मामला ठंडे बस्ते में चला गया। हनी ट्रेप कांड में कई रसूखदार आला नेता व अफसर शामिल बताए गए लेकिन कांड उजागर करने वाले नगर निगम के एक कर्मचारी के अलावा किसी नाम का खुलासा नहीं हुआ। हनी ट्रेप की ही तर्ज पर आयकर के इन छापों के तार कई मंत्रियों, नेताओं व आला अफसरों के साथ जुड़े बताए गए। अखबारों में तोमर से इनके संबंधों की खबरें सुर्खियां बनीं लेकिन आयकर विभाग ने जिस तरह आनन-फानन अपना बोरिया बिस्तर समेटा और कार्रवाई खत्म की, इससे साफ हो गया कि आगे इस मामले में भी किसी रसूखदार पर हाथ डालने की हिम्मत किसी में नहीं है। इसीलिए यह सवाल हर सख्श के जेहर में है कि फिर ऐसे छापों का औचित्य क्या है?
0 तुम्ही ने ‘दर्द’ दिया तुम्ही ‘दवा’ देना….
– कांग्रेस हाईकमान ने कमलनाथ को ‘दर्द’ देकर पार्टी को ‘बीमार’ बनाने वाला माना और इलाज के लिए ‘दवा’ देने वाला डाक्टर भी। तभी प्रारंभ से प्रदेश कांग्रेस के सारे पॉवर कमलनाथ के हाथ केंद्रित हैं। उन्हें पार्टी का प्रदेश अध्यक्ष बनाकर फ्री हैंड दिया गया। नतीजा, पंद्रह साल बाद पार्टी की सत्ता में वापसी हो गई। पार्टी नेतृत्व उनका इस कदर मुरीद हुआ कि मुख्यमंत्री बनने के बाद भी प्रदेश अध्यक्ष का पद नहीं छीना गया। अति-भरोसे का हश्र यह हुआ कि कमलनाथ न सरकार संभाल पाए और न ही संगठन। ऐसा दर्द मिला कि ज्योतिरादित्य सिंधिया 22 विधायकों को साथ लेकर पार्टी छोड़ भाजपा में चले गए। कमलनाथ सिर्फ मुख्यमंत्री बने रहते और प्रदेश अध्यक्ष का दायित्व सिंधिया को सौंप दिया जाता तो संभवत: सरकार नहीं जाती। सरकार जाने के बाद भी कमलनाथ संगठन नहीं संभाल पाए। तीन और विधायक कांग्रेस को अलविदा कह गए। कांग्रेस आलाकमान को दाद देना होगी कि वह अब भी कांग्रेस के इलाज की दवा कमलनाथ के पास ही मानती है। तभी प्रदेश अध्यक्ष के साथ उन्हें ही विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष की जवाबदारी सौंप दी गई। अर्थात कमलनाथ से कह दिया कि ‘तुम्ही ने दर्द दिया, तुम्ही दवा देना’।
0 कमलनाथ को ‘दुष्ट’ कहना कितना जायज….
– मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने एक बार फिर बुजुर्गों की सीख का ध्यान नहीं रखा कि ‘बिना विचारे नहीं बोलना चाहिए’ और ग्वालियर में पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ को ‘दुष्ट’ की संज्ञा दे डाली। शिवराज ने कहा कि कमलनाथ हनुमान चालीसा पढ़ते फिर रहे हैं। खुद को हनुमान भक्त बता रहे हैं। शायद कमलनाथ को नहीं मालूम कि हनुमान जी ‘भक्तों’ के कष्ट हरते हैं ‘दुष्टों’ के नहीं। सवाल यह है कि कमलनाथ हनुमान जी के ‘भक्त’ हैं या ‘दुष्ट’, यह कौन तय करेगा शिवराज या हनुमान। कई लोग शिवराज द्वारा कमलनाथ को ‘दुष्ट’ कहने की आलोचना करते मिले। सभी की राय थी कि शिवराज जैसे नेता को ऐसी भाषा नहीं बोलना चाहिए। कमलनाथ उनके राजनीतिक विरोधी हैं लेकिन ‘दुष्ट’ बिल्कुल नहीं। शिवराज का यह कथन ‘कोई माई का लाल’ की तरह संकट का कारण बन सकता है जैस । उन्होंने चंबल-ग्वालियर अंचल में ही बोला था कि ‘कोई माई का लाल पदोन्नति में आरक्षण को रोक नहीं सकता।’ इस कथन से भाजपा को लेने के देने पड़ गए थे। इसे सरकार के सत्ता से बाहर होने का कारण तक माना गया था। इसीलिए बार-बार याद दिलाया जाता है कि जो करना है करो लेकिन बिना सोचे समझे बोलो मत।
0 ‘रामलला’ किसका करेंगे बेड़ा पार….
– कांग्रेस ने भाजपा के साथ ‘रामलला’ को भी दुविधा में डाल दिया है। भाजपा, संघ एवं विहिप ‘रामलला’ पर अपना पेटेंट मान कर चल रहे थे। ‘रामलला’ भी इन पर मेहरबान थे। यही कारण है, लालकृष्ण आडवाणी के रथ यात्रा निकालने के बाद भाजपा का देश में लगातार विस्तार हुआ। रथ यात्रा से पहले 1985 में भाजपा को देश भर में लोकसभा की सिर्फ दो सीटें मिली थीं। आज तीन सौ से ज्यादा सीटों के साथ वह अकेले दो तिहाई बहुमत पर है। ‘रामलला’ के सामने दुविधा यह है कि अब तक राजनीित के अखाड़े में सिर्फ भाजपाई ‘जय श्रीराम’ का नारा लगाते थे, अब कांग्रेस भी उसी रास्ते पर है। सुप्रीम कोर्ट के आदेश से अयोध्या में राम मदिर भूमि पूजन के दौरान प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कमलनाथ पूरी तरह भगवा चोले में नजर आए। कांग्रेसियों ने पूरे प्रदेश में जश्न मनाया। कांग्रेस ‘जय श्रीराम’ तो बोल ही रही है, यह भी बता रही है कि कांग्रेस शासनकाल में ही ‘रामलला’ को जन्म स्थान पर बैठाया गया। ताले खुलवाए गए। पूजा शुरू कराई गई और विहिप को अनुमति देकर शिलान्यास तक कराया गया। ऐसे में ‘रामलला’ के सामने दुविधा है कि अबकी बार वे किसका बेड़ा पार लगाएंगे, भाजपा का या कांग्रेस का?
0 अब ‘माफ करों’ और ‘साथ चलो’ महाराज….
– महाराज ज्योतिरादित्य सिंधिया भाजपा के लिए ‘लकी’ हैं और ‘संकट’ का कारण भी। ‘लकी’ इस मायने में कि वे समर्थक विधायकों के साथ कांग्रेस छोड़कर आए तब भाजपा सरकार बना सकी। ‘संकट’ यह कि भाजपा ने विधानसभा का पूरा चुनाव ज्योतिरादित्य को टारगेट कर लड़ा था। नारा दिया था, ‘माफ करो महाराज, हमारे नेता तो शिवराज’। अब भाजपा को कहना पड़ रहा है , ‘माफ करो’ और ‘साथ चलो महाराज’। कांग्रेस इसे उप चुनावों में प्रमुख मुद्दा बनाने की तैयारी में है। भाजपा इसका जवाब कैसे देगी, इस रणनीति का खुलासा अब तक नहीं हुआ है। कांग्रेस ने वे वीडियो निकाल लिए हैं जिनमें भाजपा नेता सिंधिया पर आक्रमण कर गद्दार तक कहते थे और सिंधिया भाजपा पर किस तरह के हमले करते थे। सिंधिया का प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लेकर दिया यह भाषण बार-बार दिखाया जा रहा है कि उन्होंने ‘नोटबंदी’ और ‘काम बंदी’ की, चुनाव में आप ‘वोट बंदी’ कर सबक सिखा दो। इतनी गहरी खाई और टकराव के बावजूद सिंधिया और भाजपा कैसे साथ काम करेंगे। कांग्रेस के सवालों का जवाब कैसे देंगे, यह देखना दिलचस्प होगा। दूसरा संकट यह भी कि सिंधिया के कारण शिवराज स्वतंत्र होकर कोई निर्णय नहीं ले पा रहे हैं।
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