संत रविदास की समरसता वसुधैव कुटुंबकम् की थी… कौशल किशोर चतुर्वेदी

संत रविदास की समरसता वसुधैव कुटुंबकम् की थी

मध्यप्रदेश में सामाजिक समरसता का संदेश लेकर समरसता यात्राएं निकाली जा रही हैं। सागर में संत रविदास मंदिर के निर्माण के लिए यात्राएं आयोजित की गईं हैं। यात्राएं 12 अगस्त को सागर पहुंचेंगीं। तब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मंदिर निर्माण का शिलान्यास करेंगे और सागर के बड़तुमा में 100 करोड़ रूपए की लागत से बनने वाले भव्य संत रविदास जी के मंदिर निर्माण की योजना मूर्त रूप लेगी। केंद्रीय मंत्री एवं चुनाव प्रबंधन समिति के प्रदेश संयोजक नरेंद्रसिंह तोमर ने श्योपुर में, पार्टी के राष्ट्रीय महामंत्री कैलाश विजयवर्गीय ने धार जिले के मांडव से, पार्टी के अनुसूचित जाति मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष लालसिंह आर्य ने नीमच के नयागांव से और प्रदेश सरकार के मंत्री भूपेन्द्र सिंह ने बालाघाट से ध्वज दिखाकर समरसता यात्राओं को रवाना किया। प्रदेश सरकार की इकाई जनअभियान परिषद के संयोजन में 18 दिनों तक चलने वाली यह यात्राएं सामाजिक समरसता का संदेश लेकर प्रदेश के 46 जिलों में पहुंचेंगी। इस दौरान प्रदेश के 244 स्थानों में जनसंवाद के कार्यक्रम होंगे, जिसमें पार्टी के वरिष्ठ व राष्ट्रीय नेता, प्रादेशिक नेता एवं संत समाज संबोधित करेंगे। मंदिर निर्माण में प्रदेश के हर व्यक्ति की आस्था जुड़े, इसके लिए हर घर से एक मुट्ठी मिट्टी और जल एकत्रित किया जाएगा। सभी यात्राएं 11 अगस्त तक सागर पहुंचेंगी और 12 अगस्त को सागर में सभी यात्राओं का सामूहिक एकत्रीकरण होगा। इस अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी संत रविदास जी के भव्य मंदिर का शिलान्यास करेंगे।

यह तो है संदर्भ मात्र है संत रविदास जी के समरसता के भाव के बहाने उनका स्मरण करने का। संत रविदास जी की गिनती महानतम संतों में होती है। उनके भाव तक पहुंचने का साहस मुट्ठी भर संत ही जुटा सकते हैं। गुरु रविदास अथवा गुरु रैदास मध्यकाल में एक भारतीय संत कवि सतगुरु थे। इन्हें संत शिरोमणि सत गुरु की उपाधि दी गई है। इन्होंने रविदासी, रैदासी पंथ की स्थापना की और इनके रचे गए कुछ भजन सिख लोगों के पवित्र ग्रंथ गुरुग्रंथ साहिब में भी शामिल हैं। इन्होंने जात पात का घोर खंडन किया और आत्मज्ञान का मार्ग दिखाया। संत रविदास का समरसता का भाव धर्म और वर्ग विशेष तक सीमित नहीं था। बल्कि उनकी दृष्टि का विस्तार पूरी दुनिया और सभी धर्म संप्रदायों के जन-जन तक था। संत रविदास की समरसता का विस्तार वसुधैव कुटुंबकम् के भाव को समाहित किए था। संत रविदास ने ऊँच-नीच की भावना तथा ईश्वर-भक्ति के नाम पर किये जाने वाले विवाद को सारहीन तथा निरर्थक बताया था। उन्होंने सबको परस्पर मिलजुल कर प्रेमपूर्वक रहने का उपदेश दिया था। संत रविदास जी ने स्वामी रामानंद जी को कबीर साहेब जी के कहने पर गुरु बनाया था, जबकि उनके वास्तविक आध्यात्मिक गुरु कबीर साहेब जी ही थे। कबीर के रंग में रंगे रामानंद जी के शिष्य संत रविदास स्वयं मधुर तथा भक्तिपूर्ण भजनों की रचना करते थे और उन्हें भाव-विभोर होकर सुनाते थे। उनका विश्वास था कि राम, कृष्ण, करीम, राघव आदि सब एक ही परमेश्वर के विविध नाम हैं। वेद, कुरान, पुराण आदि ग्रन्थों में एक ही परमेश्वर का गुणगान किया गया है।
“कृस्न, करीम, राम, हरि, राघव, जब लग एक न पेखा।
वेद कतेब कुरान, पुरानन, सहज एक नहिं देखा ॥
चारो वेद के करे खंडौती । जन रैदास करे दंडौती।।
उनका विश्वास था कि ईश्वर की भक्ति के लिए सदाचार, परहित-भावना तथा सद्व्यवहार का पालन करना अत्यावश्यक है। अभिमान त्याग कर दूसरों के साथ व्यवहार करने और विनम्रता तथा शिष्टता के गुणों का विकास करने पर उन्होंने बहुत बल दिया। अपने एक भजन में उन्होंने कहा है-
“कह रैदास तेरी भगति दूरि है, भाग बड़े सो पावै।
तजि अभिमान मेटि आपा पर, पिपिलक हवै चुनि खावै॥
उनके विचारों का आशय यही है कि ईश्वर की भक्ति बड़े भाग्य से प्राप्त होती है। अभिमान शून्य रहकर काम करने वाला व्यक्ति जीवन में सफल रहता है जैसे कि विशालकाय हाथी शक्कर के कणों को चुनने में असमर्थ रहता है जबकि लघु शरीर की पिपीलिका (चींटी) इन कणों को सरलतापूर्वक चुन लेती है। इसी प्रकार अभिमान तथा बड़प्पन का भाव त्याग कर विनम्रतापूर्वक आचरण करने वाला मनुष्य ही ईश्वर का भक्त हो सकता है।
गुरू रविदास जी(रैदास) का जन्म काशी में माघ पूर्णिमा दिन रविवार को संवत 1377 को हुआ था उनका एक दोहा प्रचलित है। चौदह सौ तैंतीस कि माघ सुदी पन्दरास। दुखियों के कल्याण हित प्रगटे श्री गुरु रविदास जी। उनके पिता संतोख दास तथा माता का नाम कलसांं देवी था। उनकी पत्नी का नाम लोना देवी बताया जाता है। रैदास ने साधु-सन्तों की संगति से पर्याप्त ज्ञान प्राप्त किया था। रविदास चमार जाति में जन्में और जूते बनाने का काम किया करते थे औऱ ये उनका व्यवसाय था और अपना काम पूरी लगन तथा परिश्रम से करते थे और समय से काम को पूरा करने पर बहुत ध्यान देते थे। रैदास के 40 पद गुरु ग्रन्थ साहब में मिलते हैं जिसका सम्पादन गुरु अर्जुन साहिब ने 16 वीं सदी में किया था। संवत् 1528 में वाराणसी (दिल्ली सल्तनत) में संत रविदास जी ने देहत्याग किया था।

वर्तमान राजनैतिक वातावरण में संत रविदास अति प्रासंगिक हैं। वह संपूर्ण मानव समाज के हितैषी थे। कबीर की तरह उन्होंने भी प्रेरणा दी कि हर व्यक्ति को अपना काम ईमानदारी से करते हुए जीविकोपार्जन कर सर्वजन हिताय और सर्वजन सुखाय की कामना करना चाहिए। हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई सहित विश्व का प्रत्येक प्राणी समरसता के संग जिए, यही सोच संत रविदास जी की थी। आज संत रविदास के भावों को हर धर्म-संप्रदाय के लोगों को आत्मसात करने की जरूरत है। यदि ऐसा हुआ तो धर्मान्तरण जैसे शब्द मानवीय शब्दकोष से खत्म हो जाएंगे। ऊंच-नीच का भाव नहीं रहेगा। अपराध मुक्त समाज की कल्पना संभव हो सकेगी और वैमनस्यता सहित नकारात्मक भाव का नामोनिशान नहीं रहेगा…।



कौशल किशोर चतुर्वेदी

कौशल किशोर चतुर्वेदी मध्यप्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार हैं। प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में पिछले ढ़ाई दशक से सक्रिय हैं। दो पुस्तकों “द बिगेस्ट अचीवर शिवराज” और काव्य संग्रह “जीवन राग” के लेखक हैं। स्तंभकार के बतौर अपनी विशेष पहचान बनाई है।
वर्तमान में भोपाल और इंदौर से प्रकाशित दैनिक समाचार पत्र “एलएन स्टार” में कार्यकारी संपादक हैं। इससे पहले इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में एसीएन भारत न्यूज चैनल में स्टेट हेड, स्वराज एक्सप्रेस नेशनल न्यूज चैनल में मध्यप्रदेश‌ संवाददाता, ईटीवी मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ में संवाददाता रह चुके हैं। प्रिंट मीडिया में दैनिक समाचार पत्र राजस्थान पत्रिका में राजनैतिक एवं प्रशासनिक संवाददाता, भास्कर में प्रशासनिक संवाददाता, दैनिक जागरण में संवाददाता, लोकमत समाचार में इंदौर ब्यूरो चीफ दायित्वों का निर्वहन कर चुके हैं। नई दुनिया, नवभारत, चौथा संसार सहित अन्य अखबारों के लिए स्वतंत्र पत्रकार के तौर पर कार्य कर चुके हैं।

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