शैलपुत्री सिखाएं, बिना बुलाए पिता के घर भी न जाएं… कौशल किशोर चतुर्वेदी

शैलपुत्री सिखाएं, बिना बुलाए पिता के घर भी न जाएं…
शारदीय नवरात्रि में इस बार हम मां दुर्गा के सभी नौ रूपों से आत्म साक्षात्कार करते हैं। अपने हृदय में मां का स्वरूप धारण कर यह समझने की कोशिश करते हैं कि वास्तव में मां हमें क्या सीख दे रही हैं? नवरात्रि का पहला दिन मां शैलपुत्री को समर्पित है। मां शैलपुत्री का जीवन हमें वह सीख देता है हमारे जीवन को स्थिरता प्रदान करने के लिए सबसे जरूरी बात यह है कि बिना बुलाए और अपना सम्मान खोकर हमें किसी के घर नहीं जाना चाहिए। मां शैलपुत्री का जीवन हमें वह मूल मंत्र देता है कि बिना सम्मान के किसी भी स्थान पर जाने से बचना चाहिए। भले ही वह अपने पिता से लेकर परमपिता तक कोई भी हो, अगर वहां जाकर सम्मान खोना पड़े तो ऐसी जगह जाने से ज्यादा बेहतर अपने सम्मान की रक्षा करना है। यह सीख सभी के लिए है चाहे कोई बच्चा हो, युवा हो, बुजुर्ग हो, महिला हो या पुरुष हो। और इसीलिए धार्मिक आस्था के ऐसे सभी विषय को पाठ्यक्रम में शामिल कर बच्चों को आत्म सम्मान और स्वाभिमान का पाठ जरूर पढ़ाया जाना चाहिए‌। यह पाठ हर युग में उतना ही प्रासंगिक है जितना सतयुग में था, उतना ही त्रेता युग में था, उतना ही द्वापर में था और उतना ही कलियुग में है।
शैलपुत्री देवी दुर्गा के नौ रूप में पहले स्वरूप के रूप में जानी जाती हैं। ये ही नवदुर्गाओं में प्रथम दुर्गा हैं। पर्वतराज हिमालय के घर पुत्री रूप में उत्पन्न होने के कारण इनका नाम ‘शैलपुत्री’ पड़ा। नवरात्र-पूजन में प्रथम दिवस इन्हीं की पूजा और उपासना की जाती है। इस प्रथम दिन की उपासना में योगी अपने मन को ‘मूलाधार’ चक्र में स्थित करते हैं। यहीं से उनकी योग साधना का प्रारंभ होता है। इन माताजी के दाहिने हाथ में त्रिशूल और बाएँ हाथ में कमल-पुष्प सुशोभित है। वृषभ इनका वाहन है। अपने पूर्व जन्म में ये प्रजापति दक्ष की कन्या के रूप में उत्पन्न हुई थीं, तब इनका नाम ‘सती’ था। इनका विवाह भगवान शंकरजी से हुआ था।
शैलपुत्री के जीवन से सीख लेने का पाठ हमें उनके पूर्व जन्म में लेकर जाता है। एक बार प्रजापति दक्ष ने एक बहुत बड़ा यज्ञ किया। इसमें उन्होंने सारे देवताओं को निमंत्रित किया, किन्तु सती और उनके पति शंकरजी को उन्होंने इस यज्ञ में निमंत्रित नहीं किया। सती ने जब सुना कि उनके पिता एक अत्यंत विशाल यज्ञ का अनुष्ठान कर रहे हैं, तब वहाँ जाने के लिए उनका मन विकल हो उठा। अपनी यह इच्छा उन्होंने शंकरजी को बताई। सारी बातों पर विचार करने के बाद शंकर ने कहा- प्रजापति दक्ष किसी कारणवश हमसे रुष्ट हैं। अपने यज्ञ में उन्होंने सारे देवताओं को निमंत्रित किया है। उनके यज्ञ-भाग भी उन्हें समर्पित किए हैं, किन्तु हमें जान-बूझकर नहीं बुलाया है। कोई सूचना तक नहीं भेजी है। ऐसी स्थिति में तुम्हारा वहाँ जाना किसी प्रकार भी श्रेयस्कर नहीं होगा।
शंकरजी के इस उपदेश से सती का मन संतुष्ट नहीं हुआ। और तब सती का प्रबल आग्रह देखकर शंकर ने उन्हें वहाँ जाने की अनुमति दे दी। सती ने पिता के घर पहुँचकर देखा कि कोई भी उनसे आदर और प्रेम के साथ बातचीत नहीं कर रहा है। सारे लोग मुँह फेरे हुए हैं। केवल उनकी माता ने स्नेह से उन्हें गले लगाया। बहनों की बातों में व्यंग्य और उपहास के भाव भरे हुए थे। परिजनों के इस व्यवहार से उनके मन को बहुत क्लेश पहुँचा। उन्होंने यह भी देखा कि वहाँ चतुर्दिक उनके पति शंकर के प्रति तिरस्कार का भाव भरा हुआ है। दक्ष ने उनके प्रति कुछ अपमानजनक वचन भी कहे। यह सब देखकर सती का हृदय क्षोभ, ग्लानि और क्रोध से संतप्त हो उठा। उन्होंने सोचा शंकर की बात न मान, यहाँ आकर मैंने बहुत बड़ी गलती की है। वे अपने पति शंकर के इस अपमान को सह न सकीं। उन्होंने अपने उस रूप को तत्क्षण वहीं योगाग्नि द्वारा जलाकर भस्म कर दिया। वज्रपात के समान इस दारुण-दुःखद घटना को सुनकर शंकर ने क्रुद्ध हो अपने गणों को भेजकर दक्ष के उस यज्ञ का पूर्णतः विध्वंस करा दिया।
वहीं सती ने योगाग्नि द्वारा अपने शरीर को भस्म कर अगले जन्म में शैलराज हिमालय की पुत्री के रूप में जन्म लिया। इस बार वे ‘शैलपुत्री’ नाम से विख्यात हुर्ईं। पार्वती, हैमवती भी उन्हीं के नाम हैं। उपनिषद् की एक कथा के अनुसार इन्हीं ने हैमवती स्वरूप से देवताओं का गर्व-भंजन किया था। ‘शैलपुत्री’ देवी का विवाह भी शंकर से ही हुआ। पूर्वजन्म की भाँति इस जन्म में भी वे शिवजी की ही अर्द्धांगिनी बनीं। नवदुर्गाओं में प्रथम शैलपुत्री दुर्गा का महत्व और शक्तियाँ अनंत हैं।
नवरात्र के पहले दिन मां शैलपुत्री की पूजा होती है। इनकी पूजा से जीवन में स्थिरता, शांति और समृद्धि आती है। स्थिरता आने का मतलब यही है कि सती के जीवन में बिना बुलाए पिता के घर जाने से उन्हें अपनी जान देनी पड़ी थी। जीवन के इस अस्थायित्व की पूर्ति असंभव है। शैलपुत्री की पूजा कर उनके सती रूप से हम यही सीख ले सकते हैं कि बिना बुलाए किसी के घर नहीं जाना, तभी जीवन में स्थायित्व की कामना की जा सकती है। तभी अपने घर में शांति रह सकती है और शांति और स्थायित्व रहा तो समृद्धि का घर में वास होना तय है। मां शैलपुत्री के पूर्वजन्म में दक्ष पुत्री सती के जीवन से यह सीख यदि हम अपने जीवन में उतारते हैं कि सम्मान के बिना किसी भी स्थान पर नहीं जाना है तो तब हम अपने जीवन को बड़ी अनहोनी से बचाने में सफल हो सकते हैं। भले ही हम कितने ही शक्तिशाली हों और सीधे परमपिता परमात्मा भी हमारे साथ हों, फिर भी अगर हम सम्मान से समझौता कर अपने मन की बात मानकर मनमानी करते हैं तब हमारी मदद विधाता भी नहीं कर सकता, इसका साक्षात उदाहरण मां शैलपुत्री का सती के रूप में पूर्वजन्म ही है। शैलपुत्री हमें यही सिखाएं, कि बिना बुलाए पिता के घर भी न जाएं… वरना अपमान जान लिए बिना नहीं मानता…।

कौशल किशोर चतुर्वेदी

कौशल किशोर चतुर्वेदी मध्यप्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार हैं। प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में पिछले ढ़ाई दशक से सक्रिय हैं। पांच पुस्तकों व्यंग्य संग्रह “मोटे पतरे सबई तो बिकाऊ हैं”, पुस्तक “द बिगेस्ट अचीवर शिवराज”, ” सबका कमल” और काव्य संग्रह “जीवन राग” के लेखक हैं। वहीं काव्य संग्रह “अष्टछाप के अर्वाचीन कवि” में एक कवि के रूप में शामिल हैं। इन्होंने स्तंभकार के बतौर अपनी विशेष पहचान बनाई है।वर्तमान में भोपाल और इंदौर से प्रकाशित दैनिक समाचार पत्र “एलएन स्टार” में कार्यकारी संपादक हैं। इससे पहले इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में एसीएन भारत न्यूज चैनल में स्टेट हेड, स्वराज एक्सप्रेस नेशनल न्यूज चैनल में मध्यप्रदेश‌ संवाददाता, ईटीवी मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ में संवाददाता रह चुके हैं। प्रिंट मीडिया में दैनिक समाचार पत्र राजस्थान पत्रिका में राजनैतिक एवं प्रशासनिक संवाददाता, भास्कर में प्रशासनिक संवाददाता, दैनिक जागरण में संवाददाता, लोकमत समाचार में इंदौर ब्यूरो चीफ दायित्वों का निर्वहन कर चुके हैं। नई दुनिया, नवभारत, चौथा संसार सहित अन्य अखबारों के लिए स्वतंत्र पत्रकार के तौर पर कार्य कर चुके हैं।

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