दिल्ली एयरपोर्ट पर चौंकाने वाला मामला: प्लेन के पहियों में छिपकर पहुंचा 13 साल का अफगानी बच्चा, -50 डिग्री और ऑक्सीजन की कमी में भी ‘ठंडी नींद’ ने बचाई जान; हिरासत के बाद वापस भेजा गया, नया Immigration Act 2025 बना चर्चा का विषय”

21 सितंबर की सुबह करीब 10:30 बजे। दिल्ली एयरपोर्ट पर अफगानिस्तान की काम एयरलाइंस का एक विमान लैंड हुआ। अभी दरवाजे भी नहीं खुले थे कि ग्राउंड स्टाफ को प्लेन के पास एक लड़का घूमता दिखा। खाकी कुर्ता-पायजामा, काला कोट और चप्पल पहने हुए। सामान के नाम पर उसके हाथ में सिर्फ लाल रंग का छोटा का ऑडियो स्पीकर था। पूछताछ में पता चला कि वो विमान के पिछले पहियों वाली जगह में छिपकर काबुल से दिल्ली पहुंचा है।

-50 डिग्री की खून जमा देने वाली ठंड, चीथड़े उड़ा देने वाला एयर प्रेशर और कानफोडू इंजन के शोर के बीच 13 साल का बच्चा 1 हजार किमी दूर कैसे आ गया; जानेंगे आज के एक्सप्लेनर में…

सवाल-1: अफगान लड़का जहाज के जिस हिस्से में छिपा था, वो कैसा होता है?

जवाब: अफगानी लड़का काबुल से दिल्ली की

फ्लाइट RQ-4401 के साथ आया। ये Airbus A340-300 विमान ह। इसमें तीन लैंडिंग गियर होते हैं- नोज के नीचे 2 पहियों वाला लैंडिंग गियर और पीछे विंग्स के नीचे 4-4 पहियों वाले दो लैंडिंग गियर।

जब विमान टेक-ऑफ करता है, तो कुछ ही समय में हाइड्रोलिक सिस्टम की मदद से पहिए लैंडिंग गियर एक कम्पार्टमेंट के अंदर चले जाते हैं। इसे व्हील-वेल भी कहते हैं।

विमान के काबुल से उड़ान भरने के पहले रनवे या मेंटेनेंस एरिया में जब विमान खड़ा था, उस समय व्हील-वेल का दरवाजा, यानी गियर डोर खुले होंगे। इसी दौरान अफगानी लड़का पीछे वाले लैंडिंग गियर के व्हील-वेल में छिप गया।

 

जब प्लेन टेक ऑफ करता है, तो करीब 10 सेकेंड के अंदर पहिए और बाकी मेकैनिकल पार्ट्स फोल्ड होकर व्हील-वेल के अंदर चले जाते हैं और व्हील-वेल बंद हो जाता है। लैंडिंग के वक्त व्हील वेल वापस खुल जाते हैं। दिल्ली एयरपोर्ट पर विमान खड़ा हुआ, तो लड़का वहां से बाहर निकल आया।

सवाल-2: लैंडिंग गियर में छिपे इंसान का जिंदा बचना लगभग नामुमकिन क्यों है?

जवाब: आम तौर पर इंटरनेशनल फ्लाइट्स 30 से 40 हजार फीट की ऊंचाई पर उड़ती हैं। US स्टैंडर्ड एटमोस्फेरिक मॉडल के मुताबिक, इस ऊंचाई पर तापमान -45 डिग्री सेल्सियस का होता है। सर्दी के मौसम में ये और ज्यादा हो सकता है। इसके अलावा हवा पतली हो जाती है। हवा में ऑक्सीजन का लेवल सामान्य से 26% तक कम हो जाता है।

इसलिए कार्गो या पैसेंजर केबिन को एयर-टाइट रखा जाता है। इससे बाहर की ठंडी हवा अंदर नहीं आ पाती। इसके अलावा ऑक्सीजन लेवल सामान्य रखा जाता है, ताकि पैसेंजर्स को सांस लेने में दिक्कत न हो।

लेकिन व्हील वेल में छिपे व्यक्ति के पास ऐसी कोई सुविधा नहीं होती और यहां छिपे इंसान की 4 वजहों से

1. ऑक्सीजन की कमी: 20 हजार फीट से ज्यादा

ऊंचाई पर ऑक्सीजन की कमी के चलते व्यक्ति के शरीर में हाइपॉक्सिया यानी ऑक्सीजन की कमी हो जाती है। इससे दिमाग और शरीर के बाकी हिस्से काम करना बंद कर देते हैं। 1 से 2 मिनट में ही बेहोशी और 5 से 10 मिनट में ब्रेन डैमेज और फिर मौत तक हो सकती है।

2. भयंकर ठंड: क्रूज हाइट पर तापमान 30 से -50

डिग्री सेल्सियस तक गिर जाता है। इस तापमान पर व्यक्ति की मांसपेशियों में अकड़न, शरीर का सुन्न होना, सांस लेने में दिक्कत और आखिरी में मौत तक हो सकती है।

3. डीकंप्रेशन सिकनेसः जब तेजी से ऊंचाई बढ़ती है, तो हवा का दबाव कम होता है। ऐसे में शरीर में नाइट्रोजन गैस चली जाती है। खून में इसके बुलबुले बन जाते हैं। इससे सांस लेने में दिक्कत, त्वचा पर चकत्ते, दिमाग को नुकसान और दिल का दौरा पड़ने से मौत हो सकती है।

4. मेकैनिकल पार्ट्स से चोटः अगर कोई व्हील-वेल के अंदर चला गया है, तो उसके हिलने-डुलने की भी जगह नहीं रहती। इसके अलावा पहिए फोल्ड होने के दौरान उसके कुचले जाने की आशंका भी रहती है। जब प्लेन उड़ता है तो एयर-टर्बुलेंस और विमान के कांपने से कम्पार्टमेंट में मौजूद व्यक्ति बाकी चीजों से तेजी से

व्हील वेल में इंजन का कानफोडू शोर भी सुनने की क्षमता खत्म कर सकता है।

सवाल-3: फिर व्हील वेल में छिपा 13 साल का बच्चा जिंदा कैसे बच गया?

जवाबः एक्सपर्ट्स और कुछ पुराने मामलों की स्टडी के आधार पर कई चीजें ऐसी हुईं जिनसे अफगानी बच्चे की जान बच गई…

अफगानिस्तान की काम एयरलाइंस में कई बोइंग के भी प्लेन हैं, जिनके व्हील-वेल में दरवाजे ही नहीं होते। अफगानी बच्चे की किस्मत अच्छी थी कि वो एयरबस में छिपा, जहां व्हील वेल में दरवाजे होते हैं। ये दवराजे प्लेन के टेक-ऑफ होते ही करीब 50 फीट की ऊंचाई पर बंद हो जाते हैं।

काबुल से दिल्ली की यह फ्लाइट 94 मिनट यानी सिर्फ करीब डेढ़ घंटे की थी, इसमें भी विमान को क्रूज फ्लाइट तक आने में करीब 15 मिनट लगते हैं। लैंडिंग के लिए भी करीब 15 मिनट पहले से प्लेन की ऊंचाई घटने लगती है। ऐसे में अफगानी बच्चे को करीब एक घंटे ही खतरनाक ऊंचाई वाले मौसम में रहना पड़ा।

टेक-ऑफ के पहले रनवे पर दौड़ने से प्लेन के पहिए काफी गर्म हो जाते हैं। व्हील-वेल में इन्हें फोल्ड करने वाला हाइड्रोलिक सिस्टम भी गर्म हो जाता है। पहियों को ब्रेक से रोका जाता है। इसलिए गियर और बाकी पार्ट भी गर्म हो जाते हैं। FAA की एक स्टडी के मुताबिक, इन पार्ट्स का टेम्परेचर करीब 200 डिग्री सेल्सियस के आसपास पहुंच जाता है। इनकी गर्मी से व्हील-वेल में फंसे इंसान को ठंड से कुछ देर की राहत मिल जाती है।

स्टडी के मुताबिक, ऊंचाई बढ़ने पर हाईपॉक्सिया के चलते व्यक्ति बेहोश हो जाता है। साथ ही ठंड के चलते हाइपोथर्मिया की स्थिति में शरीर का मेटाबॉलिज्म यानी एनर्जी पैदा करने जैसे काम सुस्त पड़ जाते हैं। उसके दिल की धड़कन और सांस लेने की गति भी धीमी हो जाती है। शरीर के इस ‘शटडाउन’ के चलते व्यक्ति की ऑक्सीजन की जरूरत कम हो जाती है।

एक्सपर्ट्स इसे पोइकिलोथर्मिक स्टेट यानी ठंडे खून वाले जीवों जैसे सांप और मछली वगैरह की स्थिति मानते हैं। जैसे सांपों को ठंड नहीं लगती, क्योंकि वह बाहरी टेम्परेचर के हिसाब से अपने शरीर का टेम्परेचर एडजस्ट कर लेते हैं। उसी तरह पोइकिलोथर्मिक स्टेट में व्यक्ति एक तरह की ठंड

की नींद या हाइबरनेशन की स्थिति में चला जाता है। कम ऑक्सीजन में उसका मेटाबॉलिज्म, एंजाइम और सेलुलर प्रक्रियाएं धीमी हो जाती हैं और व्यक्ति कुछ देर तक इसी अवस्था में जीवित रह सकता है।

इसके अलावा कम उम्र और कम वजन वाले लोगों में डीकंप्रेशन की संभावना कम होती है। अफगानी बच्चे के इकहरे बदन और उसके कपड़ों के चलते भी उसे जिंदा रहने में मदद मिली होगी।

सवाल-4: क्या पहले भी लैंडिंग गियर में छिपकर यात्रा करने की कोशिश हुई, उन लोगों का क्या हुआ?

जवाब: अमेरिका के फेडरल एविएशन

एडमिनिस्ट्रेशन (FAA) के डेटा के मुताबिक, 1947 से 2021 तक 132 लोगों ने फ्लाइट के लैंडिंग गियर में छिपकर सफर किया। इनमें करीब 77% यानी 102 लोगों की मौत हो गई। जबकि, 23% यानी 30 लोग ही सुरक्षित बच पाए। लैंडिंग गियर में यात्रा करने वाले कुछ चर्चित केस…

1928 में 19 साल का एक युवक टरह्यून ग्राफ जेपेलिन की पहली उड़ान में चुपके से छिप गया था। यह फ्लाइट न्यू जर्सी के लेकहर्स्ट से जर्मनी के फेटरिकशाफेन जा रही थी।

1928 में 19 साल का एक युवक टरह्यून ग्राफ जेपेलिन की पहली उड़ान में चुपके से छिप गया था। यह फ्लाइट न्यू जर्सी के लेकहर्स्ट से जर्मनी के फ्रेडरिकशाफेन जा रही थी।

1996 में भारत के दो भाई प्रतीप सैनी और विजय सैनी दिल्ली से लंदन जा रही ब्रिटिश एयरवेज की बोइंग 747 विमान के पहिये के नीचे छिप गए थे। प्रदीप लंबी उड़ान के बाद बच गए, लेकिन विजय की मौत हो गई।

2001 में पाकिस्तान के 21 साल के मोहम्मद अयाज का शव इंग्लैंड के हीथ्रो एयरपोर्ट के पार्किंग में मिला था। उनकी मौत फ्लाइट से गिरने के कारण हुई थी।

2007 में लॉस एंजिल्स में एक ब्रिटिश एवरवेज विमान के लैंडिग गियर में एक युवक का शव मिला था।

अप्रैल 2014 में कैलिफोर्निया में एक सोमाली प्रवासी याह्या अब्दी ने भी फ्लाइट के पहियों के बीच छिपकर यात्रा की थी। वह सैन जोस से माउई जा रही फ्लाइट के पहिये में करीब 5 घंटे तक बैठा रहा। याह्या ने बताया कि उड़ान भरते समय उसने अपने कान ढक लिए थे।

कैलिफोर्निया से हवाई आई फ्लाइट के पहिए से बाहर निकलते वक्त याह्या अब्दी। एयरपोर्ट सिक्योरिटी के कैमरे में कैद।

2015 में दक्षिण अफ्रीका का एक व्यक्ति जोहान्सबर्ग से लंदन जा रही फ्लाइट में 11 घंटे अंडरकार में छिपा रहा। हालांकि उसका साथी 430 मीटर यानी 1400 फीट से नीचे गिरकर मारा गया।

2022 में 22 साल का एक केन्याई युवक जोहान्सबर्ग से उड़ान भरने वाले कार्गो प्लैन के सामने के पहिये में 11 घंटे छिपकर नीदरलैंड के शिपोल एयरपोर्ट पर पहुंच गया।

सवाल-5: आमतौर पर लोग इतना बड़ा रिस्क क्यों लेते हैं?

जवाब: अफगानी बच्चे ने पूछताछ में बताया कि उसका इरादा ईरान जाने का था, लेकिन गलती से वह दिल्ली जाने वाले प्लेन के लैंडिंग गियर में बैठ गया। उसने यह कदम जिज्ञासा में उठाया।

ऐसे कई मामले पहले भी सामने आए हैं, जब लोग देश की खराब स्थिति या राजनीतिक अस्थिरता से बचने के लिए अपने देश से भागने की कोशिश करते है।

हालांकि, ज्यादातर मामले यूरोप या अमेरिका जाने ताली फ्लाटटों में मिले हैं।

2022 में 22 साल के एक केन्याई युवक ने बेहतर जिंदगी की तलाश में जोहान्सबर्ग से एम्स्टर्डम तक एक कार्गो प्लेन के नोज व्हील वेल में छिपकर 11 घंटे की यात्रा की थी। वह जिंदा तो बच गया, लेकिन हाइपोथर्मिया का शिकार हो गया। बाद में उसने नीदरलैंड में शरणार्थी का दर्जा पाने के लिए आवेदन किया।

लगातार असुरक्षा, हिंसा और अस्थिरता झेलते समाज में पले-बढ़े बच्चों के मन में सामान्य जीवन और सुरक्षित भविष्य की तलाश गहरी होती है। पांच साल पहले 15 अगस्त 2021 को तालिबान ने अफगानिस्तान पर कब्जा कर लिया था। तब काबुल एयरपोर्ट पर हजारों लोग देश छोड़ने के लिए उमड़ पड़े थे। इस दौरान कुछ अफगान नागरिक अमेरिकी विमानों के पहियों से लटक गए थे, कुछ लोगों की नीचे गिरने से मौत हो गई थी।

सवाल-6: अफगानी लड़के के साथ भारत में क्या हुआ?

जवाब: दिल्ली एयरपोर्ट पर बच्चे को हिरासत में

लेकर पूछताछ की गई। उसने बताया कि वो अफगानिस्तान के कुंदुक शहर का रहने वाला है। उसकी तमन्ना ईरान जाने की थी। वो 20 सितंबर की रात कुंदुक से काबुल पहुंचा और 21 सितंबर की सुबह लैंडिंग गियर में छिपकर बैठ गया।

CISF ने जांच में इंटेलिजेंस ब्यूरो को भी शामिल किया। अफगानिस्तान की अथॉरिटीज से संपर्क किया गया। क्रॉस वेरिफिकेशन में बच्चे की सारी बातें सच साबित हुईं। भारतीय एजेंसियों ने तय किया कि लड़के के खिलाफ कोई केस दर्ज नहीं किया जाएगा। उसे उसी दिन उसी एयरलाइन से वापस काबुल भेज दिया गया। वहां अफगान अथॉरिटीज ने बच्चे को उसके परिवार को सौंप दिया।

पूछताछ के बाद बच्चे को वापस अफगानिस्तान भेज दिया गया।

1 सितंबर 2025 से लागू हुए The Immigration and Foreigners Act (2025) के तहत, कोई भी विदेशी नागरिक जो पासपोर्ट, वीजा या अन्य यात्रा दस्तावेज के बिना भारत में आता है, उसे 5 साल तक की जेल और 5 लाख रुपए तक का जुर्माना हो सकता है।

अगर कोई व्यक्ति फर्जी डाक्यूमेंट्स के आधार पर आता है, तो उसे 2 से 7 साल तक की सजा और 10 लाख रुपए तक का जुर्माना लगाया जा सकता है। इस कानून में अवैध प्रवासियों की निगरानी के सख्त प्रावधान हैं।

ऐसे मामलों में व्यक्ति को हिरासत में लेकर जांच की जाती है। अगर व्यक्ति अपराधी नहीं है या उससे देश की सिक्योरिटी को कोई खतरा है, तो उसे वापस उसके देश भेज दिया जाता है।

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