झूठे हलफनामे पर सुप्रीम कोर्ट की कड़ी नाराज़गी: इंदौर पुलिस के भ्रामक रिकॉर्ड और हेरफेर उजागर, दो अफसरों पर सख़्त टिप्पणी; कमिश्नर तलब

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने इंदौर पुलिस के दो वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा आरोपी के खिलाफ गलत जानकारी वाला हलफनामा पेश किए जाने पर बेहद नाराज़गी जताई है। मामला गंभीर देखते हुए अदालत ने अब इंदौर के पुलिस कमिश्नर को भी इस विवाद में पक्षकार बना लिया है और अगली सुनवाई 9 दिसंबर को उनसे विस्तृत हलफनामा देने को कहा है। जिसमें यह स्पष्ट होना चाहिए कि इन दोनों अधिकारियों के खिलाफ क्या कार्रवाई की गई।

मामला कैसे शुरू हुआ

एडिशनल डीसीपी दिशेष अग्रवाल और चंदन नगर टीआई इंद्रमणि पटेल ने सुप्रीम कोर्ट में एक हलफनामा दाखिल किया था। इसमें बताया गया कि आवश्यक वस्तु अधिनियम के तहत आरोपी अनवर हुसैन पर आठ आपराधिक मामले दर्ज हैं, जिनमें रेप (धारा 376) का केस भी शामिल है।

लेकिन जब जस्टिस संदीप मेहता और अहसानुद्दीन अमानुल्लाह की बेंच ने रिकॉर्ड की जांच कराई तो सामने आया कि दिखाए गए आठ में से चार केस अनवर पर थे ही नहीं। इसके अलावा सबसे बड़े आरोप  रेप केस  की भी सच्चाई अलग निकली।

छानबीन में पता चला कि वह केस अनवर हुसैन पर नहीं, बल्कि करण पवार नाम के व्यक्ति पर दर्ज है, और वह भी रेप नहीं, बल्कि अवैध हथियार रखने (आर्म्स एक्ट) से संबंधित है।

अदालत ने इसे तथ्यों में हेरफेर करके कोर्ट को भ्रमित करने की कोशिश माना और आदेश की कार्यवाही में भी इसका ज़िक्र किया।

हाई कोर्ट में भी गलत जानकारी दी गई थी

जांच से यह भी सामने आया कि चंदन नगर पुलिस ने हाई कोर्ट में भी यही दावा किया था कि अनवर पर आठ केस दर्ज हैं।
सुप्रीम कोर्ट में भी वही जानकारी दोहराई गई। बाद में पता चला कि : अनवर के खिलाफ वास्तव में चार मामले ही दर्ज थे एक मामले में वह बरी भी हो चुका था पांच मामलों में उसका नाम गलत तरीके से जोड़ा गया था

काउंटर एफिडेविट से खुली पोल

अनवर की ओर से दायर काउंटर हलफनामे में चार केसों की जानकारी पेश की गई।
इसके बाद कोर्ट ने राज्य सरकार से पूछा कि दोनों पक्षों की जानकारी में इतना फर्क क्यों है ?

इसी दबाव के बाद पुलिस ने दूसरा हलफनामा दाखिल किया और स्वीकार किया कि

मंडलेश्वर और सनावद में बताए गए तीनों मामलों का अनवर से कोई संबंध नहीं

चंदन नगर वाला रेप केस भी अनवर का नहीं, बल्कि करण नाम के व्यक्ति के खिलाफ है

इन गलतियों को पुलिस ने पोर्टल एरर और मानवीय भूल बताया।

अदालत का रुख और कड़ा हुआ

वरिष्ठ एडवोकेट नीरज सोनी के अनुसार, ग़लत तथ्यों वाला हलफनामा आरोपी के मौलिक अधिकारों और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के खिलाफ है।
इस वजह से सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस के हलफनामों पर भरोसा न करते हुए कमिश्नर को सीधे जवाबदेह बनाया है।

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