
वकीलों को सीनियर एडवोकेट बनाने के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को महत्वपूर्ण आदेश जारी किया है। सीनियर वकील बनने के लिए हाई कोर्ट जजेस की कमेटी द्वारा वकीलों के इंटरव्यू लेने के बाद उन्हें अंक दिए जाते थे। निर्धारित अंक हासिल करने के बाद ही सीनियर का तमगा दिया जाता था। शीर्ष अदालत ने अंक देने वाली व्यवस्था बंद कर दी है।.
सुप्रीम कोर्ट ने मापदंड भी तय किए और हाई कोर्ट को भी इस संबंध में नियम बनाने के लिए कहा है। उल्लेखनीय है कि दो महीने पहले ही इंदौर से 17 वकीलों ने सीनियर बनने के लिए आवेदन किया था, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस पर रोक लगा दी थी।
सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस अभय एस.ओका, उज्जवल भुयान, एसवीएन भट्टी की खंडपीठ के समक्ष इस मामले की सुनवाई हुई थी। शीर्ष अदालत ने मापदंड तय कर हाई कोर्ट को भेजे हैं। वहीं हाई कोर्ट को भी नियम बनाने के लिए कहा है। शीर्ष अदालत ने कहा कि निचली अदालतों में वकालत करने वाले वकीलों के लिए विविधता और प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया जाना चाहिए।
यह उचित होगा कि हाई कोर्ट मौजूदा नियमों में संशोधन करके चार महीने की अवधि के भीतर इस निर्णय में निहित नियमों के अनुसार नियम बनाए।
फुल कोर्ट में रखे जाएंगे प्रस्ताव
1. सीनियर एडवोकेट के आवेदन को फुल कोर्ट मीटिंग में रखा जाएगा। 2. स्थायी सचिवालय द्वारा योग्य पाए गए सभी उम्मीदवारों के आवेदन, आवेदकों द्वारा प्रस्तुत दस्तावेजों के साथ, पूर्ण सदन के समक्ष रखे जाएंगे। 3. हमेशा आम सहमति पर पहुंचने का प्रयास किया जाना चाहिए। हालांकि, अगर अधिवक्ताओं के पदनाम पर आम सहमति नहीं बन पाती है तो निर्णय लेने का तरीका मतदान की लोकतांत्रिक पद्धति से होना चाहिए। 4 न्यूनतम 10 वर्ष की प्रैक्टिस की योग्यता पर पुनर्विचार की आवश्यकता नहीं है। 5. वरिष्ठ पदनाम प्रदान करने के लिए आवेदन करने वाले अधिवक्ताओं की प्रैक्टिस जारी रह सकती है, क्योंकि आवेदन करने के कार्य को पदनाम के लिए अधिवक्ता की सहमति माना जा सकता है। । 6. कोई भी हाई कोर्ट जज किसी वकील की सिफारिश सीनियर एडवोकेट के लिए नहीं कर सकता है। 7. प्रत्येक कैलेंडर वर्ष में कम से कम एक बार पदनाम का प्रयोग अवश्य किया जाना चाहिए।