
तारीख: 12 मई, जगह: नोएडा की पारस टिएरा सोसाइटी दोपहर का वक्त था। दो डिलिवरी बॉय और सोसाइटी में रहने वाले एक बुजुर्ग 5 नंबर टावर की लिफ्ट में थे। लिफ्ट चौथी मंजिल पर पहुंची ही थी कि अचानक ब्रेक फेल हो गया। लिफ्ट तेज स्पीड में 25 मंजिला बिल्डिंग की छत से जा टकराई। दोनों डिलिवरी बॉय और बुजुर्ग लिफ्ट में फंस गए। काफी मशक्कत के बाद डिलिवरी बॉय ने सभी को बाहर निकाला।
पिछले साल अगस्त में इसी सोसाइटी में लिफ्ट में फंसकर 70 साल की महिला की मौत हो गई थी। हालांकि ये अकेली सोसाइटी नहीं है, जहां ऐसे हादसे हुए हों। नोएडा-ग्रेटर नोएडा में ही पिछले एक साल में लिफ्ट से जुड़े 40 छोटे-बड़े हादसे हुए हैं।
बढ़ती घटनाओं के बीच जानना जरूरी है कि आखिर इन हादसों के पीछे की वजहें क्या हैं। हादसा होने के बाद जवाबदेही किसकी होगी, लिफ्ट के मेंटेनेंस और चेकिंग की जिम्मेदारी किसकी है। साथ ही ये जानने की भी जरूरत है कि आप और आपका परिवार जिस लिफ्ट का इस्तेमाल कर रहे हैं, वो कितनी सेफ है।
इन सवालों के जवाब तलाशने पारस टिएरा सोसाइटी पहुंचा। इसके बाद अपार्टमेंट एसोसिएशन और एलिवेटर एक्सपर्ट से भी बात की।

नोएडा की पारस टिएरा सोसाइटी में 12 मई को लिफ्ट हादसा हुआ था। इसके लिए तकनीकी वजह को जिम्मेदार बताया गया। अच्छी बात ये रही कि कोई घायल नहीं हुआ।
पारस टिएरा सोसाइटी की AOA पर करप्शन और लापरवाही का आरोप
सोसाइटी के टावर नंबर 26 में रहने वाली मीनाक्षी कहती हैं, ‘पारस टिएरा में आए दिन लिफ्ट खराब होती है। जर्क आने लगते हैं। गेट अपने आप खुल जाता है। अब तो लिफ्ट में जाने में भी डर लगता है।’
‘सोसाइटी में लिफ्ट के मेंटेनेंस का जिम्मा अपार्टमेंट ओनर्स एसोसिएशन, यानी AOA का है। लिहाजा, लोगों की नाराजगी भी उन्हीं से है। मीनाक्षी आगे कहती हैं, ‘इसी साल सोसाइटी में दो हादसे हो चुके हैं। पिछले साल लिफ्ट में फंसने से एक बुज़ुर्ग महिला की मौत हुई थी, लेकिन AOA ने कुछ नहीं किया। हर महीने मेंटेनेंस के लिए पैसा लेते हैं, लेकिन मेंटेनेंस के नाम पर कुछ नहीं होता।

मीनाक्षी आगे कहती हैं, ‘हमारी कोई ट्रेनिंग नहीं हुई कि अगर लिफ्ट में अटक गए तो क्या करना है। कई लिफ्ट में अलार्म बटन, फोन और लाइट भी खराब हैं। सिक्योरिटी गार्ड को भी नहीं पता कि ऐसी स्थिति में क्या करना चाहिए।’
टावर 15 में रहने वालीं अंकिता बताती हैं, ‘अगस्त, 2023 में पहली बार बड़ा लिफ्ट हादसा हुआ था। टावर 24 में एक बुज़ुर्ग महिला लिफ्ट में फंस गई थीं। लिफ्ट ग्राउंड फ्लोर से टकराई और फिर छत पर पहुंच गई। वहां से उन्हें निकालना बहुत मुश्किल था। गार्ड को भी नहीं पता था कि क्या करना है।’
किसी तरह लिफ्ट का पंखा उखाड़कर उन्हें लिफ्ट से बाहर निकाला। हम इस भरोसे के साथ AOA को चुनते हैं कि वे हमें बेहतर सुविधाएं देंगे। वे तो हमारी सुनते ही नहीं।’
अंकिता आगे बताती हैं, ‘हमारी सोसाइटी में 4 हजार फ्लैट्स हैं। यहां की लिफ्ट में इंटरकॉम है, लेकिन कैसे इस्तेमाल करना है, पता ही नहीं है। कुछ टावर में लिफ्ट के अंदर इंटरकॉम नहीं लगा है। आप लिफ्ट में फंसते हैं तो घबराहट होती ही है। आपका दिमाग काम करना बंद कर देता है।’

अगर लिफ्ट में दिक्कत आती है तो सोसाइटी के ऐप पर शिकायत भी की जाती है, लेकिन कोई एक्शन नहीं होता। हम खुद AOA मेंबर्स को कॉल करके बताते हैं और खुद ही फॉलो-अप लेते हैं।’
‘जब बिल्डर था, तब उसकी एजेंसी मेंटेनेंस का काम देखती थी। AOA ने ये काम थर्ड पार्टी एजेंसी को दे दिया। अमूमन हर सोसाइटी में यही होता है। ये AOA की ही जिम्मेदारी है कि वो देखे कि एजेंसी ठीक से काम कर रही है या नहीं। AOA करप्शन करती है। पैसे बचाने के लिए सेफ्टी के साथ खिलवाड़ हो रहा है।’
AOA के पास फंड सीमित, मेंटेनेंस की जिम्मेदारी ज्यादा
AOA का रोल समझने के लिए हमने नोएडा फेडरेशन ऑफ अपार्टमेंट ओनर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष राजीव सिंह से बात की। राजीव बताते हैं, ‘जैसे-जैसे नोएडा में हाईराइज बिल्डिंग बढ़ रही हैं, वैसे ही लिफ्ट हादसे भी बढ़ते जा रहे हैं। इसकी दो वजहें हैं।
‘पहली, सोसाइटी की संख्या बढ़ती जा रही है। पहले नोएडा में सिर्फ 50 या 60 हाईराइज सोसाइटी हुआ करती थीं। अब ग्रेटर नोएडा और नोएडा को मिलाकर ऐसी एक हजार से ज्यादा सोसाइटी हैं। मुंबई के बाद अब दिल्ली-NCR में भी वर्टिकल लिविंग का कॉन्सेप्ट पॉपुलर हो गया है।’
‘दूसरी वजह ये भी है कि लिफ्ट की क्वालिटी गिरती जा रही है। लिफ्ट हादसे ज्यादातर पारस टिएरा जैसी नई बनी सोसाइटी में ही देखने को मिलते हैं। इन लिफ्ट में लगने वाले इक्विपमेंट अच्छी क्वालिटी के नहीं हैं।’
AOA के सामने चुनौतियों के बारे में राजीव बताते हैं, ‘डेवलपर या बिल्डर सोसाइटी बनवाते वक्त ही लिफ्ट लगवाता है। बड़ी मल्टीनेशनल कंपनी की ही लिफ्ट लगाकर देते हैं। लिफ्ट लगवाने और सोसाइटी हैंडओवर होने के बाद जरूरी बात ये है कि लिफ्ट का मेंटेनेंस कौन देख रहा है।’
वे आगे कहते हैं, ‘नोएडा में बड़ी सोसाइटी में 1000 से ज्यादा फ्लैट्स होते हैं। कम अनुभव के साथ कुछ ही लोगों पर ज्यादा जिम्मेदारियां होती हैं। लिहाजा, काम बिगड़ने लगते हैं।’

थर्ड पार्टी एजेंसी से मेंटेनेंस कराना मजबूरी
राजीव बताते हैं, ‘AOA को भी दिक्कतें आती हैं। उनके पास सीमित फंड होता है। इसी फंड से उसे लिफ्ट के अलावा पूल, पार्क, क्लब और सफाई जैसे खर्च भी निकालने होते हैं। इसलिए वो इनका कॉन्ट्रैक्ट किसी थर्ड पार्टी एजेंसी को दे देते हैं। एक साल का कॉन्ट्रैक्ट होता है, जिसे एनुअल मेंटेनेंस कॉन्ट्रैक्ट या AMC कहते हैं।’
वे आगे बताते हैं, ‘जब तक नॉर्मल मेंटेनेंस हो रहा है, तब तक AOA उसका खर्च उठा पाता है। लिफ्ट में दिक्कत आने लगती है, तो उसके लिए एक्स्ट्रा फंड की जरूरत पड़ती है। कई बार देखा गया कि रेजिडेंट से अलग से फंड मांगने पर वे देते नहीं है। इन सब समस्याओं की वजह से AOA मेंटेनेंस के लिए थर्ड पार्टी एजेंसी के साथ कॉन्ट्रैक्ट में आती है।’
नेशनल बिल्डिंग कोड 2016

30 मीटर से ज्यादा ऊंची इमारत

राजीव कहते हैं, ‘लिफ्ट की देखरेख मल्टीनेशनल कंपनी करती है, तो ध्यान रखती है कि लिफ्ट में लगे इक्विपमेंट अच्छी क्वालिटी के हों। उनके पास अनुभवी स्टाफ होता है। मेंटेनेंस का ठेका थर्ड पार्टी के पास जाने पर दिक्कतें बढ़ जाती हैं। उनके पास ओरिजिनल पार्ट नहीं होते। नए लगाए जाने वाले इक्विपमेंट ओरिजिनल के मुकाबले कमजोर होते हैं।’
‘AOA के अध्यक्ष के तौर पर हम हर सोसाइटी को सलाह देते हैं कि जिस कंपनी की लिफ्ट होती है, उसी के साथ मेंटेनेंस के लिए कॉन्ट्रैक्ट साइन करें। हालांकि इस कॉन्ट्रैक्ट में ऐसा नहीं लिखा होता कि लिफ्ट हादसे की जिम्मेदारी किसकी होगी।’
11 राज्यों में लिफ्ट एक्ट

लिफ्ट एक्ट लागू होने का इंतजार
राजीव आखिर में कहते हैं, ‘हमें लिफ्ट एक्ट की जरूरत है। उम्मीद है कि चुनाव के बाद एक्ट लागू हो जाएगा। इसके कई फायदे हैं। उसमें AOA, बिल्डर, लिफ्ट कंपनी और प्रशासन की जिम्मेदारियों के बारे में जानकारी दी गई है।’
‘एक्ट के मुताबिक लिफ्ट में CCTV कैमरा, ऑटोमैटिक रेस्क्यू डिवाइस, लाइट, अलार्म सिस्टम और पंखा लगा होना चाहिए। अब भी कई सोसाइटी की लिफ्ट में ये सब नहीं है। अगर हम AOA की जवाबदेही तय करना चाहते हैं, तो हमें उसके अनुसार नियम तय करने होंगे। ऐसा नहीं हो सकता कि चाहे 50 फ्लैट हों या 2 हजार फ्लैट, AOA 10 लोगों की टीम बनकर रह जाए।’

सेफ्टी से समझौता करती है थर्ड पार्टी एजेंसी
थर्ड पार्टी एजेंसी के काम को समझने के लिए हमने नेक्सा लिफ्ट्स एंड एलिवेटर के ओनर राजेश शर्मा से बात की। ये एक थर्ड पार्टी एजेंसी है। राजेश बताते हैं, ‘कंपनी मेंटेनेंस के लिए ज्यादा पैसा चार्ज करती है। कंपनी हर साल मेंटेनेंस का पैसा बढ़ाती है। जितनी पुरानी लिफ्ट, उतना ज्यादा पैसा देना होता है। इसलिए AOA के लोग हमें अप्रोच करते हैं।’
‘अगर हम 5 फ्लोर की लिफ्ट की बात करें, तो वारंटी खत्म होने के बाद लिफ्ट बनाने वाली कंपनी 40 हजार रुपए सालाना मांगती है। हर साल 5% से 10% पैसा बढ़ता जाता है। ये कीमत इसलिए भी ज्यादा होती है क्योंकि कंपनी के पास स्पेयर पार्ट और अनुभवी एक्सपर्ट होते हैं, जिन्हें सैलरी देनी पड़ती है। वहीं, थर्ड पार्टी एजेंसी पैसा नहीं बढ़ाती है।’
मान लीजिए बड़ी कंपनी सामान्य सोसाइटी से 70 हजार रुपए मांगती है। हम यहीं काम 50,000 रुपए में कर देते हैं। हम और नेगोशिएशन भी कर लेते हैं। साथ ही हम उन मानकों का भी ध्यान रखते हैं, जिनका पालन इंटरनेशनल कंपनियां करती हैं।’
राजेश आगे बताते हैं, ‘ज्यादातर थर्ड पार्टी कंपनियां कम अनुभवी कर्मचारियों के साथ काम करती हैं। मैं खुद चार बड़ी कंपनियों में काम कर चुका हूं। हमारी कंपनी छोटी है। कम लोग काम करते हैं, लेकिन मैंने कंपनी में कई लोगों को टेक्निकल ट्रेनिंग दी है।’
‘सभी कंपनी के साथ ऐसा नहीं है। कई लोग 10वीं या B.A. करके किसी अनुभवी से काम सीख लेते हैं। बाद में अपनी थर्ड पार्टी एजेंसी खोल लेते हैं। आज के समय दिल्ली-NCR में ऐसी 450 थर्ड पार्टी कंपनियां खुल गई हैं। इसमें करप्शन भी होता है। AOA इन एजेंसियों से फर्जी पर्ची बनवा लेती हैं।

एक्सपर्ट बोले- नियम फॉलो हों तो हादसे ही नहीं होंगे
एलिवेटर एक्सपर्ट अरुण अग्रवाल लिफ्ट बनाने वाली कई इंटरनेशनल कंपनियों के साथ काम कर चुके हैं। पिछले कुछ साल से ट्रेनिंग दे रहे हैं। अरुण बताते हैं, ‘मेंटेनेंस के लिए सभी इंस्ट्रक्शन और चेक लिस्ट ब्यूरो ऑफ इंडियन स्टैंडर्ड कोड में दी गई हैं। इसे कोई फॉलो नहीं करता। अगर उसका पालन किया जाए तो कोई लिफ्ट हादसा होगा ही नहीं।’
इन साइन से पहचानें आपकी लिफ्ट सेफ है या नहीं

अरुण आगे कहते हैं, ‘जब लिफ्ट खराब हो रही होती है, तो उसका पता लगना भी शुरू हो जाता है। कोई भी लिफ्ट एकदम से खराब नहीं होती। आपको कुछ अजीब आवाजें आने लगेंगी। जर्क और वाइब्रेशन महसूस होने लगेंगे। सबसे बड़ा सवाल यही है कि अगर सोसाइटी में 50 लिफ्ट हैं तो उनका रेगुलर चेक-अप क्यों नहीं हो रहा। हर महीने मेंटेनेंस होगा, तो कोई हादसा नहीं हो सकता।’
अरुण के मुताबिक, ‘लिफ्ट का फ्री-फॉल का टेस्ट होता है। अगर लिफ्ट के तार टूट जाएं, उसके लिए लिफ्ट के नीचे सेफ्टी गियर लगा होता है। उसे साल में एक बार चेक करना चाहिए। लिफ्ट के सेंसर की जांच के लिए दरवाजे रोज चेक करने चाहिए। अलार्म और इंटरकॉम को चेक करना जरूरी है। इन सबके लिए चेकलिस्ट है। इंस्ट्रक्शन मैन्युअल बना हुआ है।’
भारत में पार्ट्स नहीं मिलते, इसलिए डुप्लिकेट पार्ट यूज होते हैं
अरुण कहते हैं,’ अहम बात ये भी है कि लिफ्ट के स्पेयर पार्ट भारत में आसानी से नहीं मिलते। ये किसी भी आम इलेक्ट्रिसिटी शॉप पर नहीं बिकते हैं। ये सिर्फ लिफ्ट बनाने वाली बड़ी कंपनियों के पास ही मिलते हैं। जब आप थर्ड पार्टी एजेंसी के साथ कॉन्ट्रैक्ट करते हैं, तो इन एजेंसी के पास ओरिजिनल इक्विपमेंट या स्पेयर पार्ट नहीं होते।’
बड़ी कंपनियां अपने कॉन्ट्रैक्ट में स्पेयर पार्ट शामिल रखती हैं। जबकि एजेंसी के साथ कॉन्ट्रैक्ट सिर्फ मेंटेनेंस सर्विस के लिए साइन होता है। इसलिए भी वे कम पैसे चार्ज करती हैं।’
‘सर्विस में लिफ्ट की ऑइलिंग, ग्रीसिंग, एडजस्टमेंट और एग्जामिनेशन शामिल होता है। ये मेंटेनेंस महीने में एक बार होना चाहिए। ये टेम्परेचर पर भी निर्भर करता है। दिल्ली-NCR में गर्मियों में टेम्परेचर बहुत ज्यादा होता है। धूल भी ज्यादा होती है, इसलिए मेंटेनेंस पर खास ध्यान देना पड़ता है।’

कुछ पुराने लिफ्ट हादसे, कहां तक पहुंची इनकी जांच
लिफ्ट का इस्तेमाल करने वाले नोएडा के 83% लोगों ने पिछले तीन साल में अपनी फैमिली के एक या ज्यादा सदस्यों के लिफ्ट में फंसने की सूचना दी है। इंडिया सेफ्टी सर्वे 2023 की सर्वे रिपोर्ट से इसका पता चला है।
हादसे की न शिकायत दर्ज हुई, न एक्शन हुआ
2022 में नोएडा की पैरामाउंट इमोशंस सोसाइटी में लिफ्ट हादसा हुआ था। यहां रहने वाली मंजू सिंह का 10 साल का बेटा एक घंटे तक लिफ्ट में फंसा रहा। मंजू बताती हैं, ‘मैंने नोएडा पुलिस में इसकी शिकायत करने की कोशिश की थी। मेरे पास CCTV फुटेज भी था, लेकिन उन्होंने जांच का भरोसा देकर शिकायत भी दर्ज नहीं की। मुझे शक है कि बिल्डर ने उन्हें पैसे दे दिए थे।’

वो आगे बताती हैं, ‘मैंने सवाल उठाया कि अगर लिफ्ट को लेकर कोई कानून नहीं है, तो ऊंची इमारतें बनाने की परमिशन कैसे मिल जाती है। इसका किसी के पास कोई जवाब नहीं था। उस वक्त हमारी सोसाइटी में AOA नहीं बना था। पुलिस पर दबाव बनाने पर मेंटेनेंस करने वाले दो कर्मचारियों को अरेस्ट करके छोड़ दिया था।’
दिसंबर, 2023 में नोएडा सेक्टर-125 में रिवर साइड टावर में एक लिफ्ट हादसा हुआ था। यहां एक IT कंपनी के 9 कर्मचारी लिफ्ट हादसे का शिकार हुए थे। लिफ्ट 8वें फ्लोर से सीधे बेसमेंट में जाकर गिरी थी। इनमें से 5 कर्मचारियों को फ्रैक्चर हुआ था। पुलिस ने इस केस में मेंटेनेंस न कराने के लिए जिम्मेदार दो लोगों को हिरासत में लिया था।