
ये शुभ दिन है हम सब का…
यह एक पंक्ति उस देशभक्ति गीत की हैं, जिसे स्वर कोकिला ने वर्ष 1963 में गाया था। संगीत सी. रामचन्द्र ने दिया था और कवि प्रदीप कुमार ने गीत लिखा था। यह गीत था “ए मेरे वतन के लोगो, तुम खूब लगा लो नारा…ये शुभ दिन है हम सब का, लहरा लो तिरंगा प्यारा।” यह गीत इतना देशभक्ति और भावनाओं से भरा है कि लता की आवाज हर देशभक्त की आंखें नम कर देती है।
एक और देशभक्तिपूर्ण गीत है “मेरा रंग दे बसंती चोला,मेरा रंग दे बसंती चोला”। फ़िल्म ‘शहीद – 23 मार्च 1931’, में यह गीत इसलिए शामिल किया गया क्योंकि शहीद भगत सिंह को जब फांसी के लिए ले जाया जा रहा था, तब वह यही गीत गुनगुना रहे थे। अंग्रेज सरकार ने इन्हें 23 मार्च 1931 को इनके दो अन्य साथियों, राजगुरु तथा सुखदेव के साथ फाँसी पर लटका दिया था।
तो आज का यह शुभदिन है हम सबका, क्योंकि आज यानि 28 सितंबर को इन दोनों यानि लता मंगेशकर और भगत सिंह का जन्मदिन है। लता मंगेशकर (28 सितंबर 1929 – 6 फ़रवरी 2022) भारत की सबसे लोकप्रिय और आदरणीय गायिका थी, जिनका छः दशकों का कार्यकाल उपलब्धियों से भरा पड़ा है। हालाँकि लता ने लगभग तीस से ज्यादा भाषाओं में फ़िल्मी और गैर-फ़िल्मी गाने गाये हैं लेकिन उनकी पहचान भारतीय सिनेमा में एक पार्श्वगायिका के रूप में रही है। अपनी बहन आशा भोंसले के साथ लता जी का फ़िल्मी गायन में सबसे बड़ा योगदान रहा है। लता मंगेशकर का जन्म 28 सितम्बर 1929 को इन्दौर में हुआ था। 6 फरवरी 2022 को उम्र 92 वर्ष की उम्र में उनका निधन मुंबई में हुआ था।इन्हें स्वर-साम्राज्ञी, राष्ट्र की आवाज,सहस्त्राब्दी की आवाज,भारत कोकिला,स्वर कोकिला आदि नामों से भी जाना जाता है। लता जी की जादुई आवाज़ के भारतीय उपमहाद्वीप के साथ-साथ पूरी दुनिया में दीवाने हैं। टाईम पत्रिका ने उन्हें भारतीय पार्श्वगायन की अपरिहार्य और एकछत्र साम्राज्ञी स्वीकार किया है। प्यार से सब उन्हें ‘लता दीदी’ कहकर पुकारते हैं। वर्ष 2001 में इन्हें भारत के सर्वोच्च सम्मान भारत रत्न से सम्मानित किया गया था।
पिता दीनानाथ मंगेशकर नहीं चाहते थे कि लता फिल्मों में जाए, पर उनकी मृत्यु के बाद (जब लता सिर्फ़ तेरह साल की थीं), लता को पैसों की बहुत किल्लत झेलनी पड़ी और काफी संघर्ष करना पड़ा। उन्हें अभिनय बहुत पसंद नहीं था लेकिन पैसों के लिये उन्हें कुछ हिन्दी और मराठी फिल्मों में काम करना पड़ा। 1949 में लता को फ़िल्म “महल” के “आयेगा आने वाला” गीत गाने को मिला। इस गीत को उस समय की सबसे खूबसूरत और चर्चित अभिनेत्री मधुबाला पर फ़िल्माया गया था। यह फ़िल्म अत्यंत सफल रही थी और लता तथा मधुबाला दोनों के लिये बहुत शुभ साबित हुई। इसके बाद लता ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।
तो भगत सिंह (जन्म: 28 सितम्बर 1907 , वीरगति: 23 मार्च 1931) भारत के एक महान स्वतंत्रता सेनानी एवं क्रान्तिकारी थे। चन्द्रशेखर आजाद व पार्टी के अन्य सदस्यों के साथ मिलकर इन्होंने भारत की स्वतंत्रता के लिए अभूतपूर्व साहस के साथ शक्तिशाली ब्रिटिश सरकार का मुक़ाबला किया। इनका जन्म गाँव बंगा, जिला लायलपुर, पंजाब (अब पाकिस्तान में) हुआ था। भगत सिंह का जन्म 28 सितंबर 1907 (अश्विन कृष्णपक्ष सप्तमी) को प्रचलित है। उनके पिता का नाम सरदार किशन सिंह और माता का नाम विद्यावती कौर था। यह एक किसान परिवार से थे। अमृतसर में 13 अप्रैल 1919 को हुए जलियाँवाला बाग हत्याकाण्ड ने भगत सिंह की सोच पर गहरा प्रभाव डाला था। लाहौर के नेशनल कॉलेज़ की पढ़ाई छोड़कर भगत सिंह ने भारत की आज़ादी के लिए नौजवान भारत सभा की स्थापना की थी। वर्ष 1922 में चौरी-चौरा हत्याकांड के बाद गाँधी जी ने जब किसानों का साथ नहीं दिया तब भगत सिंह बहुत निराश हुए। उसके बाद उनका अहिंसा से विश्वास कमजोर हो गया और वह इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि सशस्त्र क्रांति ही स्वतंत्रता दिलाने का एक मात्र रास्ता है। उसके बाद वह चन्द्रशेखर आजाद के नेतृत्व में गठित हुई गदर दल के हिस्सा बन गए। काकोरी काण्ड में राम प्रसाद ‘बिस्मिल’ सहित चार क्रान्तिकारियों को फाँसी व 16 अन्य को कारावास की सजाओं से भगत सिंह इतने अधिक उद्विग्न हुए कि चन्द्रशेखर आजाद के साथ उनकी पार्टी हिन्दुस्तान रिपब्लिकन ऐसोसिएशन से जुड़ गए और उसे एक नया नाम दिया हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन। इस संगठन का उद्देश्य सेवा, त्याग और पीड़ा झेल सकने वाले नवयुवक तैयार करना था। भगत सिंह ने राजगुरु के साथ मिलकर 17 दिसम्बर 1928 को लाहौर में सहायक पुलिस अधीक्षक रहे अंग्रेज़ अधिकारी जे० पी० सांडर्स को मारा था। इस कार्रवाई में क्रान्तिकारी चन्द्रशेखर आज़ाद ने उनकी पूरी सहायता की थी।यह लाला लाजपतराय की मृत्यु का प्रतिशोध था। क्रान्तिकारी साथी बटुकेश्वर दत्त के साथ मिलकर भगत सिंह ने वर्तमान नई दिल्ली स्थित ब्रिटिश भारत की तत्कालीन सेण्ट्रल एसेम्बली के सभागार संसद भवन में 8 अप्रैल 1929 को अंग्रेज़ सरकार को जगाने के लिये बम और पर्चे फेंके थे। बम फटने के बाद उन्होंने”इंकलाब-जिन्दाबाद, साम्राज्यवाद-मुर्दाबाद!” का नारा लगाया और अपने साथ लाये हुए पर्चे हवा में उछाल दिए। इसके कुछ ही देर बाद पुलिस आ गई और दोनों को ग़िरफ़्तार कर लिया गया। एक वाकया यह भी कि उस समय भगत सिंह करीब बारह वर्ष के थे जब जलियाँवाला बाग हत्याकाण्ड हुआ था। इसकी सूचना मिलते ही भगत सिंह अपने स्कूल से 12 मील पैदल चलकर जलियाँवाला बाग पहुँच गए। 26 अगस्त, 1930 को अदालत ने भगत सिंह को भारतीय दंड संहिता की धारा 129, 302 तथा विस्फोटक पदार्थ अधिनियम की धारा 4 और 6एफ तथा आईपीसी की धारा 120 के अंतर्गत अपराधी सिद्ध किया। 7 अक्तूबर, 1930 को अदालत के द्वारा 68 पृष्ठों का निर्णय दिया, जिसमें भगत सिंह, सुखदेव तथा राजगुरु को फाँसी की सजा सुनाई गई। फाँसी की सजा सुनाए जाने के साथ ही लाहौर में धारा 144 लगा दी गई। इसके बाद भगत सिंह की फाँसी की माफी के लिए प्रिवी परिषद में अपील दायर की गई परन्तु यह अपील 10 जनवरी, 1931 को रद्द कर दी गई। इसके बाद तत्कालीन काँग्रेस अध्यक्ष पं. मदन मोहन मालवीय ने वायसराय के सामने सजा माफी के लिए 14 फरवरी, 1931 को अपील दायर की कि वह अपने विशेषाधिकार का प्रयोग करते हुए मानवता के आधार पर फांसी की सजा माफ कर दें। भगत सिंह की फाँसी की सज़ा माफ़ करवाने हेतु महात्मा गाँधी ने 17 फरवरी 1931 को वायसराय से बात की फिर 18 फरवरी, 1931 को आम जनता की ओर से भी वायसराय के सामने विभिन्न तर्को के साथ सजा माफी के लिए अपील दायर की। यह सब कुछ भगत सिंह की इच्छा के खिलाफ हो रहा था क्यों कि भगत सिंह नहीं चाहते थे कि उनकी सजा माफ की जाए। अंततः 23 मार्च 1931 को शाम में करीब 7 बजकर 33 मिनट पर भगत सिंह तथा इनके दो साथियों सुखदेव व राजगुरु को फाँसी दे दी गई। और फाँसी पर जाते समय वे तीनों मस्ती से गा रहे थे –
मेरा रँग दे बसन्ती चोला, मेरा रँग दे। मेरा रँग दे बसन्ती चोला। माय रँग दे बसन्ती चोला॥
तो आज का यह दिन कितना शुभ है। लता दीदी की आवाज का जादू सबके दिल में बसा है और बसा रहेगा और लता जी भी इसके साथ जिंदा रहेंगीं। और भगत सिंह हर भारतवासी को देश के लिए कैसे जिया जाता है और कैसे सर्वस्व न्यौछावर किया जाता है, यह सिखाकर गए और सभी राष्ट्रभक्तों के दिलों में जिंदा हैं। ऐसी महान शख्सियत कभी मरती नहीं हैं…।

कौशल किशोर चतुर्थी
कौशल किशोर चौधरी मध्य प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार हैं। प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पिछले ढाई दशक से सक्रिय हैं। दो कहानियाँ “सबसे बड़ा अचीवर युवराज” और काव्य संग्रह “जीवन राग” के लेखक हैं। स्तंभकार के द्वारा अपनी विशेष पहचान बनाई गई है।
वर्तमान में भोपाल और इंदौर से प्रकाशित दैनिक समाचार पत्र “एलाइन स्टार” के कार्यकारी संपादक हैं। इससे पहले इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में एसीएन इंडिया न्यूज चैनल में स्टेट हेड, स्वराज एक्सप्रेस नेशनल न्यूज चैनल में मध्याह्न यात्री, ईटीवी मध्य-छत्तीसगढ़ में छात्र रह चुके हैं। प्रिंट मीडिया में दैनिक समाचार पत्र राजस्थान पत्रिका में राजनीतिक एवं सरकारी साप्ताहिक समाचार पत्र, भास्कर में दैनिक समाचार पत्र में पत्रकार, लोकमत समाचार में ब्यूरो ब्यूरो प्रमुखों की देनदारी का दायरा बना हुआ है। नई दुनिया, नवभारत, चौथी दुनिया समेत अन्य पत्र-पत्रिकाओं के लिए स्वतंत्र पत्रकार के तौर पर काम कर चुके हैं।