
मैं निशा बांगरे। छतरपुर, मध्यप्रदेश की पूर्व SDM यानी डिप्टी कलेक्टर। मध्यप्रदेश के विधानसभा चुनाव के दौरान मेरी खूब चर्चा हुई थी। मैंने अपना कलेक्टर का पद उस वक्त छोड़ दिया था। मुझे चुनाव लड़ना था, लेकिन टिकट नहीं मिला। आज न तो मैं कलेक्टर हूं, न ही एमएलए।
अब आप सब यह पूछेंगे कि अच्छे पद के बावजूद चुनाव क्यों लड़ना था? कुछ लोग मुझे बेवकूफ तक कहते हैं। दरअसल मैंने सोचा था कि MLA बन करसमाज के वंचित तबके के लिए काम करूंगी। हकीकत में मैं अपनी ही लड़ाई नहीं लड़ पाई। आज मैं अपने जीवन में दस साल पीछे जा चुकी हूं। जिंदगी की नई शुरुआत कैसे करूं, यह तक सोच नहीं पा रही।
मैं एक मां हूं। एक बेटी हूं, एक पत्नी हूं। मेरा भरा-पूरा परिवार है। मायके में मैं सबसे बड़ी हूं। गांव की पहली लड़की हूं जो इंजीनियर बनी और फिर डिप्टी कलेक्टर।

ये निशा बांगरे की तब की तस्वीर है जब वो SDM हुआ करती थीं। SDM मूल रूप से डिप्टी कलेक्टर रैंक का ऑफिसर होता है।
मैं अपनी कहानी डिटेल में बताती हूं।
मेरा परिवार मध्यप्रदेश के बैतूल का रहने वाला है। दादाजी बस अक्षर पहचान पाते थे, लेकिन पढ़ाई का महत्व जानते थे। उन्होंने मेरे पिता को पढ़ाने में खूब मेहनत की। हमेशा गांव से बाहर रखा, लेकिन परिस्थितियां ऐसी नहीं थी कि आगे बढ़ा जाए।
मैं एससी कम्युनिटी से आती हूं, छुआछूत हमारे समाज के लिए आम है। पापा के जमाने में तो हमारे समाज की हालत और भी बुरी थी।
पापा बताते हैं कि जब वो स्कूल-कॉलेज में थे तब किसी ‘ऊंची जाति’ के व्यक्ति के घर के सामने से चप्पल पहन कर भी वो नहीं जा सकते थे।
अच्छी बात यह रही कि भेदभाव के बावजूद पापा स्कूल गए। वो आसपास के गांव के पहले शख्स हैं, जो लेक्चरर बने।निशा ने शुरुआती पढ़ाई बैतूल केंद्रीय विद्यालय से की है। इसके बाद परिवार भोपाल शिफ्ट हो गया था, जहां से दसवीं पास की।
मैं अपने परिवार की दूसरी पीढ़ी हूं, जिसे पढ़ने-लिखने का मौका मिला। हम चार भाई-बहन हैं। सबसे बड़ी मैं, फिर मेरा भाई और दो छोटी बहन। सब पढ़ाई को लेकर गंभीर हैं, लेकिन मुझ पर बचपन से ही काफी जिम्मेदारी थी।
मेरे दादा जी मुझसे कहते थे कि तुम कलेक्टर बनना। तब ये बात मुझे समझ नहीं आती थी, लेकिन सुनने में अच्छा लगता था। फिर पापा की ट्रांसफर पोस्टिंग के साथ-साथ जीवन उनके कॉलेज लोकेशन के आसपास घूमता रहा।
2007 में जब मैंने दसवीं पास की तब जमाना आईआईटी का था। मैं क्लास में फर्स्ट आने वाली ‘टीचर्स फेवरेट’ स्टूडेंट थी। पढ़ने में तेज होने की वजह से सबने दिमाग में यह बात भर दी कि आईआईटी में फ्यूचर है। उससे नीचे कुछ करने का फायदा नहीं।
खैर, मैंने आईआईटी दिया और मेरा आईआईटी मद्रास में बीएससी-एमएससी के कोर्स में एडमिशन हो गया। इस बीच बी-टेक करने की इच्छा जाग चुकी थी।
अब मेरा मन हुआ कि पहले बी-टेक पूरी हो जाए फिर एमपीपीएससी का एग्जाम दे देंगे। मैंने विदिशा के एक कॉलेज में एडमिशन ले लिया। आप सोचेंगे आईआईटी छोड़कर विदिशा के कॉलेज में…
कॉलेज में एडमिशन लेते वक्त मैंने तय कर लिया था कि यहां से जल्दी निकलना है। फिर वहां मेरा मन लगने लगा। मैंने छात्रसंघ चुनाव लड़ने का फैसला ले लिया। पापा बिल्कुल समझ नहीं पा रहे थे कि मैं चुनाव क्यों लड़ रही हूं। वो पूछते भी थे, लेकिन उन्होंने कभी मना नहीं किया।



छात्र संघ का चुनाव जीतने के बाद भी निशा राजनीति में नहीं जाना चाहती थी। SDM बनने के बाद जब वो आम लोगों से मिलने लगीं तब उनकी रुचि पॉलिटिक्स में हुई।
उनका बस एक ही कहना था कि इन सब चीजों का असर तुम्हारी पढ़ाई पर नहीं पड़ना चाहिए। पापा की बात मैंने मानी और पढ़ाई के बाद ही दूसरे काम करती थी।
मैं विदिशा के जिस कॉलेज में थी उसमें बहुत से बच्चे हिंदी मीडियम के थे। इंजीनियरिंग में सब कुछ इंग्लिश मीडियम में होने की वजह से उनकी पढ़ाई अपने आप पिछड़ी जा रही थी।
कमाल ही था कि उनमें से अधिकतर लड़कियां वंचित समाज से आती थीं। मैंने तय किया कि इनको पढ़ाना अब से मेरा जिम्मा रहेगा।
मैं हॉस्टल-हॉस्टल जाकर स्टूडेंट्स और खासकर लड़कियों की नोट्स से लेकर असाइनमेंट तक में मदद करती थी। मेरे पापा बचपन से ही कहते थे कि आपके पढ़ने-लिखने का मतलब ये है कि आप समाज को क्या लौटा रहे हैं। सिर्फ यह नहीं कि आप क्या हासिल कर रहे हो। उन बातों को अमल में लाने का यही सही समय था।
इसके साथ मैं एनसीसी और दूसरी एक्स्ट्रा करिकुलर एक्टिविटीज का भी हिस्सा रहती थी। यह सब देखकर मेरे दोस्तों ने सलाह दी कि छात्र संघ चुनाव लड़ जाओ। मैंने पापा को बिना बताए पर्चा भर दिया और फिर उनको खबर दी।
इस चुनाव में मैं लड़कियों का एकतरफा वोट पाकर जीत गई। सही बताएं तो इस दौरान ही चुनाव का माहौल और उसकी ताकत मुझे समझ आई। इसके बावजूद एक्टिव राजनीति न तो मेरा लक्ष्य था और न ही मेरे पल्ले पड़ती थी। मुझे तो बस इंजीनियरिंग करना था। पापा के आइडिया पर समाज के लिए कुछ काम करना था।
कॉलेज के तीसरे साल प्लेसमेंट शुरू हो गई। मेरी नौकरी एक अमेरिकन कंपनी में लग गई। तब माना जाता था कि अगर नौकरी ‘फ्लोरा डेनियल’ जैसी विदेशी कंपनी में लग गई तो आपका पैकेज सबसे अच्छा है।
मेरे लिए ये खुशी की ही बात थी। मेरे घर में मुझसे छोटे तीन भाई-बहन हैं। जॉइंट फैमिली और पड़ोसियों के बीच पापा का नाम बहुत है। ऐसे परिवार की बड़ी बेटी कुछ अचीव कर जाए इससे अच्छा क्या होगा। मैं घर में सबसे बड़ी थी तो मेरी जिम्मेदारी ज्यादा थी। मैं छोटे भाई-बहनों से अन्याय नहीं कर सकती थी इसलिए मैंने गुरुग्राम जाकर नौकरी कर ली।

निशा बचपन से पढ़ाई में तेज थी। उन्होंने बहुत सारे अवॉर्ड जीते हैं। पहली बार पीएससी की 2016 परीक्षा में डीएसपी के पद पर चयन हुआ। फिर इसके बाद दूसरी बार डिप्टी कलेक्टर के लिए चयन हुआ।
कॉर्पोरेट में दस से छह की नौकरी करने के साथ एमपीपीएससी यानी मध्यप्रदेश पब्लिक सर्विस कमीशन की तैयारी करने लगी। यह समय मुश्किल होने के साथ डिप्रेसिव भी था। आप नौकरी के साथ पढ़ाई करने की ठान तो सकते हैं, लेकिन अगर इमोशनल सपोर्ट नहीं मिला तो सब कुछ धराशाई हो सकता है। मैंने डेढ़ साल नौकरी और पढ़ाई एक साथ की। दिन भर ऑफिस और रात में किताबें।
2016 की एमपीपीएससी परीक्षा में मेंस निकाल लिया। इसके बाद मुझमें कॉन्फिडेंस आया। नौकरी छोड़ दी। इस फैसले का सभी ने विरोध किया। लोग मुझे कुछ दिन और नौकरी करने की सलाह देने लगे। मुझे लगने लगा कि मैंने कोई गलती तो नहीं कर दी।
पहली बार में ही मैं इंटरव्यू के लिए सिलेक्ट हो गई। इंटरव्यू क्लियर करने के बाद 2018 में नियुक्ति मिली। विधानसभा चुनाव में ट्रेनिंग चलती रही।
इसी दौरान डिप्टी कलेक्टर बनने के बाद पहली बार गांव की महिलाओं को देखा तो मुझे बहुत अच्छा लगा। मुझे खुद पर खुशी हुई कि अब मैं इनकी मदद कर सकती हूं।

गुड़गांव में नौकरी करते समय निशा की दोस्ती सुरेश अग्रवाल से हुई। गणतंत्र दिवस के मौके पर बैंकॉक में दोनों ने भारतीय संविधान को साक्षी मानते हुए शादी कर ली। सुरेश एक मल्टीनेशनल कंपनी में अधिकारी हैं।
मेरी पहली पोस्टिंग बैतूल हुई। मेरे लिए वो जगह अपने दूसरे घर जैसी हो चुकी है। मैंने वहां काम किया और लोगों ने ही मुझसे कहना शुरू कर दिया कि आप चुनाव लड़ जाइए। मैं आज भी सोचती हूं कि मैं वहां के लोगों की उतनी मदद नहीं कर सकी, जितनी उनको जरूरत थी।
वो लोग मुझे अपना नेता मानने लगे थे। इसके पीछे बस एक ही कारण है। मेरे पास जो आता था, मैं उसकी बातें सुनती। उसकी हर संभव मदद करने की कोशिश करती।
धीरे-धीरे इलाके के लोगों ने मुझे सार्वजनिक कार्यक्रमों में बुलाना शुरू किया।
मुझे कई अनुसूचित जाति के कार्यक्रमों में भी बुलाया गया। मैं भीमराव अम्बेडकर की आइडियोलॉजी को दिल से फॉलो करना चाहती थी। मुझे जातिगत भेदभाव का हमेशा से एहसास था। कलेक्टर होने के बावजूद लोग मेरी जाति के बारे में कई तरह की टिप्पणियां करते थे। बस वो लोग मेरे सामने नहीं कहते थे।
विभाग के अंदर भी जाति की वजह से कई तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ता था। महिला होने की वजह से समस्या दोगुनी हो जाती है।
मेरी एक कलीग ने मुझे बताया कि इस इलाके के प्रभावशाली लोग, जो अधिकारियों की मदद से अपना फायदा चाहते हैं, वो कभी नहीं चाहते कि ब्लॉक या तहसील पर कोई महिला अधिकारी आए। दरअसल एक महिला से नेगोशिएशन करना मुश्किल होता है।

निशा पांच साल के बेटे की मां हैं। आज वो घर पर बेरोजगार बैठी हैं, ऐसे में बेटे के भविष्य की चिंता उन्हें सता रही।
आप न तो उनसे बदतमीजी कर सकते है, न ही अन प्रोफेशनल रवैया रख सकते हैं। ऐसे में लोग चाहते हैं कि महिला अधिकारी आए ही नहीं। दूसरी सबसे बड़ी बात यह कि महिला अधिकारी के कैरेक्टर पर सवाल उठाना आसान है।
खैर, बहुत कुछ सोचकर मैंने अपने पद से इस्तीफा दे दिया। इस्तीफा मंजूर नहीं हुआ। जब मंजूर हुआ तो मैं चुनाव न लड़ सकी। इसके पीछे कई राजनीतिक कारण है। फिलहाल मैं घर में हूं और नए सरोकार से जुड़ने की कोशिश में हूं।
अब मुझे सामाजिक ताने-बाने में बदलाव लाने की लड़ाई लड़नी है, ऐसे में जो भी परिस्थितियां आएंगी मैं उनका सामना करूंगी।
बच्चों की शिक्षा के लिए मेरे पास कुछ प्लान है। जिस पर काम करना मेरा ध्येय है। एक मां होने के नाते सोचती हूं तो अपराधबोध होता है कि न तो सेविंग्स हैं और न ही सिक्योर भविष्य।
अपने पांच साल के बेटे को अगर अच्छा भविष्य न दे पाई तो क्या होगा, ये ख्याल आते ही मैं घबरा जाती हूं। मैं किसी को दोष नहीं देना चाहती, लेकिन वर्तमान की राजनीतिक और सामाजिक व्यवस्था ने मुझे कम से कम दस साल पीछे धकेल दिया है। दुख है कि ये संघर्ष मुझे अकेले ही जारी रखना होगा।
निशा ने जज्बात शाश्वत से साझा किया