तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने पिछले हफ्ते कहा था कि लोगों को अब तुरंत बच्चे पैदा करने की जरूरत है। 8 मार्च को आंध्र प्रदेश के CM ने भी कहा है कि महिला कर्मचारियों को बच्चों की संख्या की परवाह किए बिना मैटर्निटी लीव दी जाएगी।
एक TDP सांसद ने तो तीसरा बच्चा लड़की होने पर 50 हजार रुपए और लड़का होने पर एक गाय देने का ऐलान कर दिया। दक्षिणी राज्यों के नेता पिछले कुछ वक्त से जनसंख्या बढ़ाने के संकेत दे रहे हैं।
आखिर क्यों डरें हैं दक्षिण के राज्य, परिसीमन क्या है और इससे किसका फायदा-नुकसान होगा; ऐसे 5 जरूरी सवालों के जवाब आज के एक्सप्लेनर में.
सवाल-1: दक्षिणी राज्यों के नेता ज्यादा बच्चे पैदा करने की बात क्यों कर रहे हैं?
जवाब: स्टालिन, नायडू और कालीसेट्टी के ज्यादा बच्चे पैदा करने के बयान को लोकसभा परिसीमन से जोड़कर देखा जा रहा है। दरअसल, जनगणना के बाद 2026 में लोकसभा सीटों का परिसीमन होने की संभावना है।
दक्षिणी राज्यों को डर है कि 46 साल से रुका हुआ परिसीमन जनसंख्या को आधार मानकर हुआ, तो लोकसभा में हिंदीभाषी राज्यों के मुकाबले उनकी सीटें घट जाएंगी।
हालांकि, केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने 26 फरवरी को कहा था कि परिसीमन की वजह से दक्षिणी राज्यों की एक भी संसदीय सीट कम नहीं होगी।
सवाल-2: परिसीमन क्या है, ये कब और कैसे किया जाएगा?
जवाब: एक सांसद या विधायक एक तय क्षेत्र की निश्चित आबादी को रिप्रेजेंट करता है, लेकिन देश की जनसंख्या लगातार बढ़ रही है। ऐसे में सांसद या विधायक के क्षेत्र की आबादी भी समय के साथ बढ़ रही है। इसलिए जनसंख्या के आधार पर लोकसभा और विधानसभा क्षेत्रों की सीमाएं दोबारा निर्धारित की जाती हैं। इसी सीमा निर्धारण की प्रक्रिया को परिसीमन कहते हैं। इसी से SC-ST सीटों की संख्या भी तय होती है।
आखिरी बार 1976 में, 1971 की जनगणना को आधार मानकर परिसीमन किया गया था। उस वक्त देश की आबादी 54 करोड़ थी और हर 10 लाख आबादी पर एक लोकसभा सीट का फॉर्मूला अपनाया गया था। इस तरह कुल 543 सीटें तय की गईं।
‘हर जनगणना के बाद परिसीमन’ का नियम होने के बावजूद 1981 और 1991 की जनगणना के बाद परिसीमन नहीं हुआ। वहीं दक्षिण और उत्तर के राज्यों में असमान जनसंख्या होने के कारण परिसीमन टलता रहा। 2000 में बीजेपी की अटल सरकार ने संविधान में 84वें संशोधन कर लोकसभा सीटों के परिसीमन को 2026 तक स्थगित कर दिया।
ऐसे में 2026 से परिसीमन शुरू हो सकता है, लेकिन अभी 2021 की जनगणना नहीं हुई है। ऐसे में केंद्र सरकार परिसीमन से पहले जनगणना कराना चाहेगी। अगर 2021 की जनगणना नहीं होती है, तो 2011 की जनगणना को आधार मानकर परिसीमन करा सकती है, लेकिन इसमें भी पेंच है।
दरअसल, आर्टिकल-81 के मुताबिक, संसद में 550 से ज्यादा निर्वाचित सदस्य नहीं होंगे। ऐसे में सीटों की संख्या बढ़ती है, तो संविधान संशोधन की जरूरत पड़ सकती है।
सवाल-3: परिसीमन के बाद राज्य की लोकसभा सीटें पर क्या असर पड़ेगा?
जवाब: भारत में लेटेस्ट जनगणना के आंकड़े 2011 के हैं। तब देश की आबादी करीब 121 करोड़ थी। ऐसे में प्रति 10 लाख आबादी पर एक सीट का फॉर्मूला अपनाया जाता है, तो देशभर में कुल 1210 लोकसभा सीटें हो जाएंगी।
चूंकि नई संसद की लोकसभा में मैक्सिमम 888 सांसद ही बैठ सकते हैं। अगर इसे परिसीमन का आधार मानकर 1210 सीटों के साथ एडजस्ट करें, तो UP को 147 और कर्नाटक को 45 सीटें मिलेंगी। बाकी राज्यों में भी यही फॉर्मूला लगेगा।
हालांकि, सीटों के परिसीमन में सिर्फ जनसंख्या इकलौता आधार नहीं है। 2002 के परिसीमन एक्ट के मुताबिक, लोकसभा सीटों के निर्धारण में यथासंभव इन बातों का भी ध्यान रखा जाएगा…
सभी इलाके भौगोलिक तौर पर एकजुट हों।
सभी इलाकों में जिला मुख्यालय और प्रशासनिक कार्यालय हो।
इलाके में आसानी से आवाजाही हो।
कोई भी विधानसभा सीट दो लोकसभा क्षेत्रों में नहीं होगी।
इससे सभी लोकसभा सीटों में एक समान आबादी नहीं होती। जैसे- 2019 में तेलंगाना की मलकाजगिरी लोकसभा सीट में 31.5 लाख इलेक्टर्स थे, जबकि लक्षद्वीप में 54.2 हजार इलेक्टर्स थे।
हाल ही में हुए जम्मू-कश्मीर के परिसीमन में केंद्र सरकार पर असमान तौर पर परिसीमन करने के आरोप लगे। दरअसल, जम्मू और कश्मीर दोनों डिवीजन में आबादी बढ़ी, लेकिन जम्मू डिवीजन में 6 और कश्मीर डिवीजन में सिर्फ 1 सीट ही बढ़ी।
सवाल 4:परिसीमन को लेकर दक्षिण के राज्यों में किस बात का खतरा है?
जवाब: परिसीमन को लेकर दक्षिण के राज्यों में लोकसभा सीटें घटने का खतरा है, क्योंकि परिसीमन जनसंख्या के आधार पर होता है। 2011 की जनगणना के मुताबिक, दक्षिण के पांच राज्यों की आबादी 25.12 करोड़ है, जबकि हिंदीपट्टी यानी हिंदी बोलने वाले राज्यों की आबादी 57.23 करोड़ है। यानी दक्षिण के मुकाबले हिंदीपट्टी की आबादी दोगुनी है।
दरअसल, 1960-70 के दशक में सरकार ने जनसंख्या काबू करने पर जोर लगा रखा था। दक्षिणी राज्यों ने जनसंख्या पर कंट्रोल किया और वे इस मामले में आगे रहे, लेकिन उत्तरी राज्य खासतौर पर हिंदीपट्टी के राज्य जनसंख्या नियंत्रण में फेल हो गए।
दक्षिणी राज्यों की इस उपलब्धि के पीछे एक कड़वा सच भी था। वह यह कि जनसंख्या घटी, तो लोकसभा में उत्तर भारत के राज्यों के मुकाबले उनकी सीटें कम हो जाएंगी।
दक्षिणी राज्यों की इस शिकायत को दूर करने के लिए इंदिरा सरकार ने 1976 में इमरजेंसी के दौरान संविधान में संशोधन कर नए परिसीमन पर 2002 तक रोक लगा दी। इसके बाद अटल सरकार ने 2026 तक रोक लगा दी। सरकार का मानना था कि 2026 तक सभी राज्यों में जनसंख्या बढ़ने की दर एक जैसी हो जाएगी, लेकिन ऐसा हुआ नहीं। आंकड़े भी इसकी गवाही देते हैं।
2011 की जनगणना के मुताबिक, दक्षिण भारत के राज्यों की औसत जनसंख्या वृद्धि दर 12.1% है, जबकि हिंदीभाषी राज्यों की औसत जनसंख्या वृद्धि दर 21.6%, यानी हिंदीभाषी राज्यों के मुकाबले करीब 9.5% कम। इसलिए दक्षिण के राज्यों को लगता है कि प्रति 10 लाख आबादी वाला फॉर्मूला अपनाया गया, तो लोकसभा में उनकी मौजूदगी उत्तर भारत के राज्यों के मुकाबले घट जाएगी।
पॉलिटिकल एक्सपर्ट और अम्बेडकर विवि में प्रोफेसर अभय कुमार दुबे के मुताबिक,
दक्षिण को आबादी-नियंत्रण और आर्थिक विकास की सजा मिलेगी यानी उसकी सीटों में बहुत कम बढ़त होगी। वहीं उत्तर को आबादी बढ़ने देने और विकास की होड़ में पिछड़ने का राजनीतिक इनाम हासिल होगा यानी उसकी सीटों में बहुत ज्यादा बढ़ोतरी होगी।
सवाल-5: अगर परिसीमन हो जाए तो आम चुनाव 2024 के आधार पर लोकसभा में BJP की क्या स्थिति होगी?
जवाब: दक्षिण भारत की पार्टियां और विपक्ष परिसीमन के सपोर्ट में नहीं है। उनका मानना है कि परिसीमन हुआ तो BJP को फायदा होगा। 27 फरवरी को कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने कहा, ‘BJP दक्षिणी राज्यों को चुप कराने के लिए परिसीमन को हथियार की तरह इस्तेमाल कर रही है।’
BJP को परिसीमन से कैसे फायदा मिलेगा, इसे ऐसे समझते हैं-
परिसीमन के बाद लोकसभा में 888 सीटें होंगी। यानी बहुमत का आंकड़ा 445 होगा। 2024 में BJP को कुल 240 सीटें मिली थीं। इनमें 118 सीटें हिंदीपट्टी के राज्यों यानी काउ बेल्ट से थीं। यानी 49% सीटें।
मान लीजिए परिसीमन के बाद BJP 2024 का ही प्रदर्शन दोहराती है, तो उसे काउ बेल्ट में ही 219 सीटें मिलेंगी। यानी बहुमत के लिए जरूरी सीटों में से करीब 50% सीटें BJP इन 8 राज्यों से ही हासिल कर लेगी।
इलेक्शन एनालिस्ट अमिताभ तिवारी बताते हैं,
अभी संसद में दक्षिण से करीब 24% सांसद जाते हैं। अगर परिसीमन होता है तो ये आंकड़ा 22% के नजदीक पहुंच जाएगा, लेकिन BJP उत्तरी राज्यों में ज्यादा मजबूत है। वहीं पर BJP का ज्यादा फोकस है और इन्हीं राज्यों में वो ज्यादा सीटें जीतती है। जिन राज्यों में ज्यादा सीटें हैं, वहां अभी BJP मजबूत है, लेकिन कल कोई और हो सकता है।