जस्टिस बेला त्रिवेदी को क्यों नहीं दिया गया फेयरवेल? CJI गवई भी हुए काफी नाराज; सामने आई ये वजह — देखें VIDEO

‘सुप्रीम कोर्ट में एक केस की सुनवाई चल रही थी। ये 2023 की बात है। सीनियर एडवोकेट कपिल सिब्बल जिरह कर रहे थे। कपिल सिब्बल सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन के प्रेसिडेंट भी हैं। जस्टिस बेला एम. त्रिवेदी केस सुन रही थीं।’

‘बहस के दौरान कपिल सिब्बल ने जस्टिस बेला से कहा- विल यू हियर मी प्लीज। इस पर जस्टिस बेला गुस्सा हो गईं और चिल्लाकर बोलीं- नो, आई विल नॉट हियर यू। कपिल सिब्बल जैसे सीनियर एडवोकेट के साथ ऐसा व्यवहार देख कोर्ट में मौजूद वकील भी हैरान रह गए।’

 

हमें ये किस्सा सुनाने वाले एडवोकेट उस वक्त कोर्ट में मौजूद थे। इस वाकये के करीब दो साल बाद 16 मई 2025 को जस्टिस बेला एम. त्रिवेदी का आखिरी वर्किंग डे था। सुप्रीम कोर्ट की परंपरा रही है कि किसी जस्टिस के रिटायर होने पर बार एसोसिएशन उन्हें विदाई देता है। जस्टिस बेला त्रिवेदी के मामले में ऐसा नहीं हुआ और ये पहली बार ही हुआ था।

आखिर ये नौबत क्यों आई कि वकीलों ने जस्टिस बेला एम. त्रिवेदी को फेयरवेल नहीं दिया। इसकी पड़ताल की। पता चला कि वकील उनके व्यवहार से नाराज हैं। आरोप लगाते हैं कि जस्टिस बेला बहुत सख्ती से पेश आती थीं। कोर्ट में ही फटकार लगा देती थीं।

जजों को विदाई देने की परंपरा क्या है…

सुप्रीम कोर्ट की परंपरा रही है कि जज के आखिरी वर्किंग डे पर सेरेमोनियल बेंच बैठती है। इसके अलावा सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन यानी SCBA और सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट्स ऑन रिकॉर्ड एसोसिएशन यानी SCAORA रिटायर होने वाले जज के सम्मान में फेयरवेल पार्टी देते हैं।

जस्टिस बेला त्रिवेदी के लिए सेरेमोनियल बेंच की परंपरा निभाई गई। उनके साथ चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया बीआर गवई और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह बैठे। सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन के प्रेसिडेंट कपिल सिब्बल और वाइस प्रेसिडेंट रचना श्रीवास्तव सेरेमोनियल बेंच में मौजूद रहे। हालांकि, बार एसोसिएशन ने जस्टिस बेला के लिए विदाई समारोह नहीं किया।

जस्टिस बेला को फेयरवेल न दिए जाने पर CJI गवई ने नाराजगी जताई। जस्टिस मसीह ने भी कहा कि अच्छी परंपराएं हमेशा बरकरार रहनी चाहिए।

बार एसोसिएशन को ऐसा रुख नहीं अपनाना चाहिए था। फैसलों से असहमति हो सकती है, लेकिन निजी सम्मान से इनकार नहीं होना चाहिए।

बीआर गवई

चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया

‘जस्टिस बेला के खराब व्यवहार से वकील नाराज’

जस्टिस बेला को फेयरवेल नहीं दिए जाने पर हमने सीनियर एडवोकेट रोहित पांडे से बात की। वे SCBA के मेंबर हैं और सेक्रेटरी रह चुके हैं। रोहित पांडे कहते हैं, ‘जस्टिस बेला ने वकीलों के साथ तालमेल बनाने की कोशिश नहीं की। कोर्ट में रहते हुए या दलील देते हुए वकीलों और जस्टिस के बीच आपसी सम्मान होता है। जस्टिस बेला के मामले में ऐसा नहीं हुआ। इससे वकीलों में नाराजगी थी।’

बार एसोसिएशन के फैसले पर वे कहते हैं, ‘बार हमेशा कोर्ट और जजों का सम्मान करता रहा है। बार और बेंच एक सिक्के के दो पहलू हैं। बार कभी नहीं चाहेगा कि किसी जज को फेयरवेल न दिया जाए। जस्टिस बेला को फेयरवेल नहीं दिया जाना दुर्भाग्यपूर्ण है। बार को भी इसकी तकलीफ जरूर है।’

‘जस्टिस बेला छोटी गलतियों के लिए भी जुर्माना लगा देती थीं’

जस्टिस बेला के व्यवहार के बारे में पूछने पर रोहित पांडे कहते हैं, ‘जस्टिस बेला आए दिन छोटी-छोटी बातों पर उखड़ जाती थीं। केस की फाइलिंग में मानवीय भूल होने पर भी वकीलों को बख्शा नहीं जाता था।’

आमतौर पर जिन मामलों में वॉर्निंग देकर छोड़ दिया जाता था, जस्टिस बेला उनमें भी सख्ती बरतती थीं। छोटी गलतियों के लिए जुर्माना लगा देती थीं।

रोहित पांडे, सीनियर एडवोकेट SCBA के मेंबर

एडवोकेट रोहित पांडे को लगता है कि जस्टिस बेला को पता होगा कि वकील उनसे क्यों नाराज थे। वे दावा करते हैं कि उनके इस तरह के रुख से जूनियर और सीनियर वकील नाराज हो गए। उन्हें लगा कि जस्टिस बेला टारगेट कर रही हैं। नाराज वकीलों ने बार के सामने भी अपनी बात रखी। बार पहले भी जस्टिस बेला के पास वकीलों की नाराजगी लेकर पहुंचा था, लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई।

‘बार का फैसला बेंच के लिए मैसेज’

रोहित पांडे बार के सख्त रवैये को बेंच के लिए मैसेज मानते हैं। वे कहते हैं, ‘जस्टिस बेला के सहारे एक संदेश गया है कि बार एसोसिएशन कमजोर नहीं है। वो भी अपने फैसले ले सकता है।’

हालांकि वे सेरेमोनियल बेंच में कपिल सिब्बल और रचना श्रीवास्तव के शामिल होने पर हैरानी जताते हैं। कहते हैं कि एक तरफ तो बार जस्टिस बेला का विरोध कर रहा है, दूसरी तरफ अध्यक्ष उनके सम्मान में शामिल होकर तारीफ कर रहे हैं।

जमानत देने में पक्षपात का आरोप

सुप्रीम कोर्ट में हमारे सोर्स बताते हैं कि जस्टिस बेला त्रिवेदी पर पक्षपात का भी आरोप लगा। इसकी वजह आरोपियों को जमानत देने में उनका सख्त रवैया है।

सुप्रीम कोर्ट ऑब्जर्वर की रिपोर्ट के मुताबिक, अक्टूबर 2024 तक जस्टिस बेला के फैसलों में 40% क्रिमिनल केस थे। ये असामान्य रूप से ज्यादा हैं। जमानत पर उनके कई फैसले सुप्रीम कोर्ट के सिद्धांत के खिलाफ रहे। सुप्रीम कोर्ट में ‘जमानत देना नियम और जेल भेजना अपवाद’ का सिद्धांत काम करता है।

बड़े मामले, जिनमें जस्टिस बेला ने जमानत नहीं दी

2020 के दिल्ली दंगों में आरोपी स्टूडेंट लीडर उमर खालिद की जमानत याचिका 14 महीनों में 12 बार जस्टिस बेला की बेंच के सामने आई, लेकिन सुनवाई नहीं हुई। आखिरकार, खालिद ने सुप्रीम कोर्ट से याचिका वापस ले ली।

2024 में जस्टिस बेला त्रिवेदी की बेंच ने दिल्ली दंगों के दो आरोपियों गुलफिशा फातिमा और शरजील इमाम की जमानत याचिका खारिज कर दी। दोनों 5 साल से जेल में हैं।

गुलफिशा फातिमा

इसी तरह भीमा कोरेगांव हिंसा मामले में गिरफ्तार महेश राउत को बॉम्बे हाई कोर्ट ने सितंबर, 2023 में जमानत दी थी। सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस त्रिवेदी की बेंच ने NIA की अपील पर जमानत आदेश को सस्पेंड कर दिया।

अक्टूबर 2022 में जस्टिस त्रिवेदी की बेंच ने बॉम्बे हाई कोर्ट के उस आदेश को निलंबित कर दिया, जिसमें दिल्ली यूनिवर्सिटी के पूर्व प्रोफेसर जी.एन. साईबाबा और 5 अन्य को बरी किया गया था।

इसके अलावा जस्टिस त्रिवेदी पर विपक्षी नेताओं की जमानत याचिकाएं खारिज करने के भी आरोप लगे। मार्च 2024 में जस्टिस त्रिवेदी की बेंच ने आम आदमी पार्टी के नेता और दिल्ली के पूर्व मंत्री सत्येंद्र जैन को मनी लॉन्ड्रिंग मामले में जमानत देने से इनकार कर दिया। स्वास्थ्य कारणों से मिली अंतरिम जमानत भी रद्द कर दी गई। मामला निचली अदालत में गया, तो उन्हें जमानत मिल गई।

मार्च 2024 में जस्टिस त्रिवेदी की बेंच ने भारत राष्ट्र समिति यानी BRS की नेता के. कविता को दिल्ली के शराब नीति घोटाले में जमानत देने से इनकार कर दिया। उन्हें लोअर कोर्ट जाने के लिए कहा। कविता को अगस्त 2024 में सुप्रीम कोर्ट की दूसरी बेंच ने जमानत दी।

नवंबर 2023 में जस्टिस बेला त्रिवेदी की बेंच ने तमिलनाडु के मंत्री रहे और DMK नेता वी. सेंथिल बालाजी को जमानत देने से इनकार कर दिया। सितंबर, 2024 में सुप्रीम कोर्ट की दूसरी बेंच ने उन्हें जमानत दी।

जस्टिस त्रिवेदी के जमानत देने में सख्त रवैये की वजह से कई लोगों ने उनकी बेंच से याचिकाएं वापस ले लीं। उमर खालिद के अलावा भीमा कोरेगांव मामले में गिरफ्तार शिक्षाविद हनी बाबू, दिल्ली दंगे के एक केस में आरोपी सलीम मलिक और दिल्ली शराब नीति घोटाले में आरोपी दिल्ली के पूर्व CM अरविंद केजरीवाल ने अपनी याचिका वापस ले ली थी।

सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस बेला त्रिवेदी के बड़े केस

‘जस्टिस बेला जमानत नहीं देती थीं, उनकी बेंच से वकील बचते थे’

जस्टिस बेला का आखिरी वर्किंग डे भले हो चुका है, लेकिन वे 9 जून तक पद पर रहेंगी। इस वजह से कई वकील सामने आकर बात नहीं करना चाहते। उनका कहना है कि वे बेंच के खिलाफ नहीं बोलना चाहते।

एक एडवोकेट ऑन रिकॉर्ड बात करने के लिए तैयार हो गए। हालांकि उन्होंने नाम उजागर न करने की गुजारिश की। उनकी बात रखने के लिए हमने उन्हें धीरज नाम दिया है। जमानत के सवाल पर एडवोकेट धीरज दावा करते हैं कि जस्टिस बेला की कोर्ट से कभी किसी वकील को रिलीफ नहीं मिला, बल्कि फटकार ही पड़ जाती थी।

धीरज कहते हैं, ‘जस्टिस बेला बुरी तरह बेल रिजेक्ट करती थीं। बेल और पैरोल के 99% केस में निराश करके ही भेजती थीं। पहले से मिली बेल में अगर कोई समय बढ़वाने पहुंच जाए, तो कह देती थीं कि तुम्हें तो बेल मिलनी भी नहीं चाहिए और बेल कैंसिल कर देती थीं।’

‘2023 में वे वेकेशनल बेंच पर बैठी थीं, तब जितने भी वकीलों के बेल केस उनके पास पहुंचे, वे कोई न कोई बहाना बनाकर दूसरी बेंच के सामने केस ले जाते थे।’

‘लगता था बेल न देने का मन बनाकर आई हैं’

एडवोकेट धीरज दावा करते हैं कि ऐसा लगता था मानो जस्टिस बेला पहले से मन बनाकर आती थीं और सीधे बेल रिजेक्ट कर देती थीं। कई केस होते थे, जहां छोटे विवाद में भी बेल नहीं देती थीं। हमने इसका उदाहरण पूछा, तो उन्होंने उमर खालिद का जिक्र किया।

दिल्ली दंगों में UAPA मामले में आरोपी उमर खालिद की जमानत याचिका जस्टिस त्रिवेदी की बेंच के सामने थी। 2023 से 2024 तक 7 बार उमर खालिद की याचिका पर सुनवाई की, लेकिन बेल नहीं मिली।

एडवोकेट धीरज कहते हैं, ‘प्रिजंप्शन ऑफ इनोसेंस’ हमेशा आरोपी के पक्ष में होता है। मतलब अगर एजेंसी सबूत जुटाकर केस बनाने में ज्यादा समय लगा रही है, तो आप आरोपी को लगातार जेल में नहीं रख सकते। उमर खालिद के केस में प्रिजंप्शन ऑफ इनोसेंस का ध्यान नहीं रखा गया। ये तो सिर्फ एक मामला है।’

‘FIR को पत्थर की लकीर मान लेती थीं’

हमने इस मसले पर एक और एडवोकेट किरण (बदला हुआ नाम) से बात की। वे जस्टिस बेला पर वकीलों को शक की निगाह से देखने का आरोप लगाते हैं। कहते हैं, ‘उनकी कोर्ट में आरोपी की बात सुनी ही नहीं जाती थी। वे हमेशा आरोपी की तरफ से बहस करने वाले को शक की नजर से देखती थीं। जांच एजेंसी या पुलिस ने जो कह दिया, उसी को सही मान लेती थीं। FIR को पत्थर की लकीर मानती थीं।’

हमने एडवोकेट किरण से जस्टिस बेला के सख्त रवैये का कोई वाकया बताने के लिए कहा। जवाब में उन्होंने सीनियर एडवोकेट कपिल सिब्बल से जुड़ा एक किस्सा सुनाया। वे बताते हैं, ‘सीनियर एडवोकेट कपिल सिब्बल के साथ जस्टिस बेला का एक केस मुझे याद है। सिब्बल साहब 2023 के आखिर में एक केस लेकर बहस कर रहे थे। केस क्या था, ये तो याद नहीं, लेकिन मैं तब कोर्ट में ही था।’

‘बहस के दौरान कपिल सिब्बल ने जस्टिस बेला से कहा- विल यू हियर मी प्लीज। इस पर जस्टिस बेला गुस्सा हो गईं और चिल्लाकर बोलीं- नो आई विल नॉट हियर यू। कपिल सिब्बल जैसे सीनियर एडवोकेट के साथ ऐसा व्यवहार किसी को पसंद नहीं आया।’

हमने इस वाकये पर कपिल सिब्बल से भी बात करने की कोशिश की। उनकी तरफ से मैसेज का रिप्लाई नहीं आया। खबर लिखे जाने तक उनकी तरफ से रिस्पॉन्स नहीं मिला। जवाब आते ही स्टोरी में शामिल किया जाएगा।

‘वकीलों के खिलाफ CBI जांच का आदेश’

एक और सीनियर एडवोकेट दावा करते हैं कि जस्टिस त्रिवेदी ने कुछ वकीलों के खिलाफ CBI जांच के आदेश दे दिए थे। इससे भी वकीलों में गुस्सा था।

केस के बारे में सीनियर एडवोकेट बताते हैं, ‘जस्टिस बेला त्रिवेदी और सतीश चंद्र शर्मा की डिवीजन बेंच ने 2024 में भगवान सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य की सुनवाई की थी। इस केस में जस्टिस त्रिवेदी ने जाली वकालतनामा का इस्तेमाल कर फर्जी याचिका दायर करने के आरोप में कुछ वकीलों के खिलाफ CBI जांच का आदेश दिया था।’

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बार एसोसिएशन ने वकीलों के लिए दया दिखाने की गुजारिश की, लेकिन उन्होंने इसे खारिज कर दिया। इस फैसले ने SCBA के वकीलों को सबसे ज्यादा नाराज किया।

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‘फेयरवेल पर ऑफिशियल मीटिंग नहीं हुई’

जस्टिस बेला को फेयरवेल न दिए जाने पर हमने सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट्स ऑन रिकॉर्ड एसोसिएशन के कोषाध्यक्ष अल्जो के. जोसेफ से बात की। वे बताते हैं, ‘फेयरवेल न देने के बारे में कोई आधिकारिक प्रस्ताव पास नहीं हुआ है। कोई ऑफिशियल मीटिंग भी नहीं हुई। पता नहीं कैसे विवाद खड़ा हो गया है।’

एडवोकेट अल्जो के. जोसेफ बताते हैं, ‘हमारे संगठन को बार काउंसिल ऑफ इंडिया की तरफ से एक लेटर मिला है। इसमें फेयरवेल नहीं देने पर नाराजगी जताई गई है। फेयरवेल न देने जैसी तो कोई बात ही नहीं थी।’

‘जस्टिस बेला त्रिवेदी के रिटायर होने की तारीख 9 जून है। अभी वे किसी काम से देश के बाहर गई हैं। ऐसे में फेयरवेल नहीं देने की बात कहां से आ गई। हर विवाद के पीछे राजनीति होती है। इस पर हम क्या कर सकते हैं।’

वे मानते हैं कि जस्टिस बेला का रवैया सख्त रहा है, लेकिन इसकी वजह से फेयरवेल नहीं देने जैसी स्थिति नहीं बन सकती। अल्जो बताते हैं कि SCAORA में पद पर रहते हुए मेरे पास जस्टिस बेला के खिलाफ किसी वकील की शिकायत नहीं आई।

इस विवाद का बार और बेंच के रिश्ते पर फर्क नहीं पड़ेगा। उनके बीच अच्छा तालमेल है। ऐसे मुद्दे आते रहे हैं। विवाद होता है, तो हम जाकर बात करते हैं।

एडवोकेट अल्जो के. जोसेफ कोषाध्यक्ष, SCAORA

पूर्व CJI काटजू बोले- बार एसोसिएशन सभी जजों का जज

बार के फैसले को बेंच किस तरह देखता है, ये समझने के लिए हमने पूर्व चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया मार्कंडेय काटजू से बात की। वे फेयरवेल के बारे में बताते हैं कि इसमें बार एसोसिएशन जज के बारे में अपने विचार रखता है। बार चाहे तो फेयरवेल का बायकॉट भी कर सकते हैं, जैसा कि जस्टिस बेला त्रिवेदी के केस में हुआ है।

वे कहते हैं, ‘फेयरवेल न देने से CJI नाराज हो गए हैं, लेकिन नाराजगी किस बात की है। क्या बार एसोसिएशन के पास ये हक नहीं है कि वो फैसला लें कि उनकी राय में जज अच्छे थे या नहीं। क्या अब हर जज को फेयरवेल देना है, हर जज की तारीफ करनी है। जज भी हर तरह के होते हैं। अच्छे, बुरे, ईमानदार और बेईमान जज भी होते हैं। कई ऐसे भी हैं, जिन्होंने ठीक से अपना काम नहीं किया।’

अगर बार एसोसिएशन का फैसला था कि बेला त्रिवेदी ने जज रहते अपना काम ठीक तरह से नहीं किया, तो इसमें क्या खराबी है।

मार्कडेय काटजू

पूर्व CJI

जस्टिस काटजू मानते हैं कि CJI गवई को बार एसोसिएशन की आलोचना नहीं करनी चाहिए थी। बार और बेंच के रिश्ते पर काटजू कहते हैं- Bar is the Judge of all the judges यानी बार सभी जजों का भी जज होता है। वकील सभी जजों का काम देखते रहते हैं कि वे अच्छे से अपना फर्ज निभा रहे हैं या नहीं।

बार और बेंच के बीच विवाद की स्थिति बनने पर क्या होता है? इस पर काटजू बताते हैं’ ‘ऐसे में बातचीत होनी चाहिए। बार के प्रेसिटेंड को CJI से मिलकर अपनी समस्या बतानी चाहिए। हल निकालने की कोशिश करनी चाहिए। जस्टिस बेला त्रिवेदी के केस में बार ने फेयरवेल न देने का फैसला लिया, इसके बावजूद प्रेसिडेंट कपिल सिब्बल सम्मान समारोह में पहुंचे। ये भी ठीक नहीं है।’

वकीलों के आरोपों पर हमने जस्टिस बेला त्रिवेदी से बात करने की कोशिश की, लेकिन उनसे कॉन्टैक्ट नहीं हो पाया।

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