नही थम रहा राधा-रानी पर उठा विवाद…इससे पहले भी पंडित मिश्रा के वह बयान जिन पर हुआ खूब विवाद – देखे VIDEO

राधा-रानी के जन्म और विवाह पर पंडित प्रदीप मिश्रा के प्रवचन से उठा विवाद थमने का नाम नहीं ले रहा है। मथुरा में लोग उनके खिलाफ प्रदर्शन और एफआईआर दर्ज कराने की मांग कर रहे हैं। प्रेमानंद महाराज ने तो तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा- ‘चार श्लोक पढ़ क्या लिए, भागवत प्रवक्ता बन गए। तुम नरक में जाओगे।

ये पहला मामला नहीं है जब पंडित प्रदीप मिश्रा ने प्रवचन के दौरान ऐसी विवादित टिप्पणी की हो। पिछले दिनों महाराष्ट्र में अपनी कथा के दौरान एक नेता और पार्टी के समर्थन में वोट देने की अपील की थी। इसकी शिकायत कांग्रेस ने चुनाव आयोग से की थी।

इसके पहले भी वे कई विवादित टिप्पणी कर विवाद खड़ा कर चुके हैं। पंडित प्रदीप मिश्रा के इसी तरह के बयानों की पड़ताल की। धर्माचार्यों से ये भी समझा कि आखिर कथावाचक ऐसी टिप्पणियां करते क्यों हैं? पढ़िए ये रिपोर्ट…

पंडित मिश्रा के वह बयान जिन पर हुआ विवाद

अब जानिए क्या है ताजा विवाद, जिस पर पंडित मिश्रा ने सफाई दी

पंडित मिश्रा की शिव कथा 9 जून से ओंकारेश्वर में शुरू हुई है। कथा के पहले ही दिन प्रवचन के दौरान उन्होंने कहा- राधा-रानी का नाम भगवान श्रीकृष्ण की 108 पटरानियों और 1600 रानियों में नहीं हैं। राधा के पति का नाम अनय घोष, उनकी सास का नाम जटिला और ननद का नाम कुटिला था। राधा जी का विवाह छाता में हुआ था। राधा जी बरसाना की नहीं, रावल की रहने वाली थीं। बरसाना में तो राधा जी के पिता की कचहरी थी, जहां वह साल भर में एक बार आती थीं।

पंडित प्रदीप मिश्रा का ये प्रवचन वायरल होते ही ब्रजधाम के लोग आक्रोशित हो गए। सबसे तल्ख टिप्पणी आई प्रेमानंद महाराज की तरफ से। उन्होंने कहा- लाड़ली जी के बारे में तुम्हें पता ही क्या है? तुम जानते ही क्या हो? अगर तुम किसी संत के चरण रज का पान करके बात करते तो तुम्हारे मुख से कभी ऐसी वाणी नहीं निकलती।

ये भी कहा कि संतों से अभी सामना हुआ नहीं है। चार लोगों को घेरकर उनसे पैर पुजवाता है तो समझ लिया कि तू बड़ा भागवताचार्य है।

पंडित प्रदीप मिश्रा बोले- हम प्रमाण दे चुके

विवाद बढ़ा तो पंडित प्रदीप मिश्रा की ओर से सफाई आई। उन्होंने इस पूरे विवाद को मोड़ने की कोशिश की। कहा-राधा रानी प्रसंग पर मैंने जो कुछ भी कहा, वो शास्त्रों के अनुसार है। जिस-जिस महाराज को प्रमाण चाहिए, वो कुबरेश्वर धाम आ जाएं।

मैंने तो ब्रह्म वैवर्त्य पुराण राधा रानी का संवाद बोला, राधा रहस्य में से राधा का संवाद बोला, गोड़िया सम्प्रदाय के काली पीठ से निकलने वाली पुस्तक राधा जी का संवाद लिखा है, वो बोला। कुछ लोग शिव पुराण का विरोध करना चाहते हैं। इस व्यास पीठ का विरोध करना चाहते हैं। प्रदीप मिश्रा का विरोध करना चाहते हैं। वो लोग राधा रानी की आड़ में हमें बदनाम करना चाहते हैं।

आखिर सच क्या है, राधा-रानी कौन है?

पंडित सुरेंद्र बिहारी गोस्वामी से इसका सच जानना चाहा, तो उन्होंने कहा कि-ब्रह्म वैवर्त्य पुराण और गर्ग संहिता के अनुसार, राधा और कृष्ण का विवाह भगवान ब्रह्मा की उपस्थिति में वृंदावन के पास भांडिरवन नामक जंगल में हुआ था।

राधा-रानी तीनों लोक की मालकिन हैं। ब्रह्म वैवर्त्य पुराण के प्रकृति खंड में स्वयं शिव जी ने पार्वती जी से 4 अध्याय 40, 49, 50, 51 में राधा तत्व पर बात की है। जो लोग राधा के संदर्भ में जो भी बात या लांछन लगाते हैं, वो बिल्कुल वहां नहीं हैं। राधा जी ही तीन लोक की स्वामिनी हैं।

कथावाचकों की कथा से इतर टिप्पणियों को लेकर क्या कहते हैं धर्माचार्य

हर कथावाचक का अपना इंटरप्रिटेशन होता है – पं. विजयशंकर मेहता

जीवन प्रबंधन गुरु पंडित विजय शंकर मेहता का मानना है कि भारत में जो शास्त्र और पुराण हैं, वो इतने गहरे और विस्तृत लिखे हुए हैं कि हर कथावाचक उसका अपना इंटरप्रिटेशन करता है।

जब हम मूल ग्रंथ का इंटरप्रिटेशन करते हैं, अगर आप उसमें मर्यादा चूक जाएं या भूल हो जाए तो जो दूसरे ज्ञाता है वह आपत्ति लेंगे। वाल्मीकि रामायण में लिखा है कि भगवान श्रीराम का विवाह होने के बाद जब बारात लौटी तो परशुराम जी जंगल में मिले। तुलसीदास जी रामचरित मानस में देश, काल और परिस्थिति के अनुसार परशुराम जी को उस राजसभा में ले आए, जिसमें रामजी ने धनुष तोड़ा था। अब अगर आप कथा पकड़ेंगे तो तुलसीदास जी को भी कह सकते हैं कि जब परशुराम जी जंगल में आए तो आप कैसे राजसभा में ले आए?

देश, काल परिस्थिति को देखते हुए तुलसीदास जी ये संदेश देना चाहते थे कि उस राजसभा में जब परशुराम आए तब जितने राजा थे, जो इस स्वयंवर का विरोध कर रहे थे वो सब परशुराम से डरते थे। तुलसीदास जी को लगा कि मेरे राम की जो छवि है उसे ऐसे समय लाऊं, जब सारे राजा देख रहे हो। ये लेखक का इंटरप्रिटेशन है।

आज कथावाचक भी इतनी स्वतंत्रता लेते हैं, लेकिन धार्मिक विषयों पर किसी भी पात्र या विषय पर टिप्पणी करने से पहले लोगों की भावना आहत न हो जाए इसका ध्यान रखना चाहिए।

मुझे ऐसा लगता है कि कई बार भावावेश में व्यास पीठ पर बैठकर जब आप अपना कोई इंटरप्रिटेशन बताना चाहते हैं या अपने विचार को लोकप्रिय करना चाहते हैं, तो कभी-कभी वाणी दाएं-बाएं हो जाती है। दूसरे लोगों को इस वाक युद्ध में मजा आ जाता है। सनातन धर्म बन जाता है दनादन धर्म।

कथावाचक मन की कथा कहते हैं- पं. सुरेंद्र बिहारी गोस्वामी

पंडित सुरेंद्र बिहारी गोस्वामी ने कहा – मूलत: हमारे सनातन संस्कृति में पुराणों का बड़ा महत्व है। 18 प्रकार के अधिकृत पुराण हैं। जब कोई व्यक्ति इन पुराणों का विशेषज्ञ हो जाता है, तो उसे भाष्य का वेद कहा जाता है।

जब कोई व्यवस्थित रूप से अध्यात्म के अनुसार किसी पुराण पर अपनी बात करता है तो वो पुराण से संस्कृत के श्लोक, उद्धरण और किस संदर्भ में बोल रहा है, क्रमवार उसका वर्णन करता है। अभी ज्यादातर कथावाचक सामान्य तौर पर अपनी मन की कथा कहते हैं।

पुराण को सामने रख उसकी पूजा करा लेंगे, लेकिन कहेंगे वो ही, जो मन की बातें होती हैं। यदि कोई आपसे पूछे कि श्रीमद् भागवत क्या है, तो ये वो ही बता सकेगा, जिसने वास्तव में श्रीमद् भागवत सुना होगा। यदि पुराण के नाम पर आपने केवल किस्से, कहानियां, चुटकले और चमत्कारों पर बात सुनी है, तो इसी तरह का विवाद खड़ा होगा।

कथावाचकों को मीडिया में आने का शौक बढ़ा – महामंडलेश्वर अखिलेश्वरानंद गिरी

महामंडलेश्वर अखिलेश्वरानंद गिरी इस बारे में कहा – मैं इस बारे में इसलिए कुछ नहीं कह पा रहा हूं कि ये मेरे मन की पीड़ा है। आजकल जो इलेक्ट्रॉनिक मीडिया चल पड़ा है। उसमें कथावाचकों को मीडिया में आने का शौक है। उनकी लोकप्रियता होती है। लोकप्रियता के कारण पब्लिक में जो कमजोर मानसिकता के लोग हैं, जो भटक रहे हैं।

मैं तो मानता हूं कि इसे प्रचारित- प्रसारित नहीं करना चाहिए। ये लोग अनर्गल प्रलाप कर जाते हैं, बिना सिर पैर की बात करते हैं। मैं इन लोगों पर ज्यादा टिप्पणी नहीं करता क्योंकि मैं इनके स्तर का आदमी नहीं हूं ।

ऐसी बातें करने वालों को शास्त्रों का ज्ञान नहीं- डॉक्टर इंदु भवानंद

ज्योतिषाचार्य डॉ. इंदु भवानंद मानते हैं कि जो कथावाचक कथा के बीच में ऐसे कहानियां सुनाते हैं, वो पढ़े-लिखे नहीं रहते हैं। हमारे यहां सारे ज्ञान का आधार वेद को माना जाता है। वेद पढ़ने के लिए वेदांग पढ़ना होता है। जब वे इसे पढ़ेंगे तो ज्ञान आएगा। बुद्धिमान लोग इस पर चर्चा नहीं करते।

जब व्यक्ति संत महात्माओं के पास रहता है, उनकी सेवा करता है तो विद्या ज्ञान वान होती है। गुरु की सेवा महत्वपूर्ण होती है। पुस्तकों में कहानी पढ़कर व्यक्ति बात तो करता है, पर उसका अर्थ नहीं समझ पाता।

इनका कथा करना आय का स्त्रोत है। कर्मकांड करते करते कथावाचक लोग निरंकुश हो जाते हैं। इन्हें आराध्य और इष्ट का ज्ञान नहीं होता। उनकी ताकत का ज्ञान नहीं होता। ज्ञान तब होता है जब व्यक्ति को शास्त्र का ज्ञान हो। तब उसे समझ आता है कि परम तत्व क्या है। ये परमात्मा की लीला है। परमात्मा लोक कल्याण के लिए लीला करते हैं।

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