प्रदेश की आर्थिक राजधानी इंदौर की अनदेखी का असर अब शहर की बुनियादी सुविधाओं पर भी साफ दिखने लगा है। मेट्रो, एलिवेटेड कॉरिडोर, फ्लाईओवर और ट्रैफिक सुधार जैसे महत्वपूर्ण काम लंबे समय से अटके हुए हैं, जिसकी भारी कीमत रोज लाखों नागरिकों को चुकानी पड़ रही है।

जब इस मुद्दे पर शहर के सभी नौ विधायकों से सवाल किया कि मेट्रोपॉलिटन अथॉरिटी के मामले में इंदौर को पीछे क्यों धकेला जा रहा है, तो राजनीतिक गलियारों में हलचल मच गई।
इस फैसले पर सभी ने असहमति तो जताई, लेकिन ज्यादातर नेता खुलकर बोलने से बचते नजर आए। जल संसाधन मंत्री तुलसी सिलावट ने कहा कि वे इस संबंध में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव से चर्चा करेंगे। वहीं, विधायक मालिनी गौड़ ने भी कहा कि जनता से मिल रहे फीडबैक से वे मुख्यमंत्री को अवगत कराएंगी। दूसरी ओर, सांसद शंकर लालवानी ने मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर मांग की है कि अथॉरिटी का मुख्यालय इंदौर में ही रहना चाहिए।
कोर्ट के दखल के बाद भी हालात जस के तस
ट्रैफिक व्यवस्था को लेकर पिछले छह महीनों में हाईकोर्ट कई बार पुलिस और प्रशासनिक अफसरों को तलब कर चुकी है। 36 ऑटोमैटिक सिग्नल चालू करने और चौराहों पर जवानों की तैनाती जैसे गंभीर मुद्दों पर कोर्ट ने सख्त टिप्पणियां भी कीं, लेकिन इसके बावजूद जमीन पर कोई बदलाव नजर नहीं आ रहा है।मेट्रो: खजराना के आगे लगा ‘फुल स्टॉप’
खजराना के आगे का मेट्रो कॉरिडोर पिछले करीब दो साल से अटका हुआ है। मूल डीपीआर (DPR) में यह हिस्सा एलिवेटेड था, लेकिन बाद में इसे अंडरग्राउंड करने का फैसला लिया गया। इस बदलाव को लेकर अभी तक स्थिति स्पष्ट नहीं हो पाई है, जिसके कारण खजराना के आगे काम पूरी तरह रुक गया है। इस देरी की वजह से परियोजना की लागत 7,500 करोड़ रुपये से बढ़कर करीब 12,500 करोड़ रुपये तक पहुंच चुकी है। आशंका है कि इस हिस्से के काम में कम से कम तीन साल का अतिरिक्त समय लगेगा।
अनदेखी: हर दूसरे निर्माण कार्य में गड़बड़ी
राजेंद्र नगर स्थित रेती मंडी फ्लाईओवर का काम लगभग पूरा होने के बाद पता चला कि वहां दो अतिरिक्त पिलर की जरूरत है। इसी तरह, मांगलिया रेलवे ओवरब्रिज का काम पिछले डेढ़ साल से बंद पड़ा है। पोलोग्राउंड और बाणगंगा ब्रिज भी अपनी डिजाइन संबंधी खामियों के कारण विवादों में घिरे हैं। इसके अलावा, सत्यसाईं, देवास नाका, मूसाखेड़ी और आईटी पार्क चौराहे पर चल रहे निर्माण कार्यों की गति बेहद धीमी है।
7 साल से फाइलों में ही कैद है एलिवेटेड कॉरिडोर
एलआईजी (LIG) से नौलखा तक बनने वाला एलिवेटेड कॉरिडोर सात साल बीत जाने के बाद भी धरातल पर नहीं उतर सका है। सॉइल टेस्टिंग और बैरिकेडिंग करने के बाद काम को रोक दिया गया। नतीजा यह है कि रोजाना हजारों वाहन चालक संकरी और बाधित सड़कों पर घंटों जाम से जूझने को मजबूर हैं। इस क्षेत्र से बीआरटीएस (BRTS) हटाने का भी जनता को कोई खास फायदा नहीं मिल पा रहा है।