9 साल तक छात्रसंघ चुनाव नहीं हुए, लेकिन विश्वविद्यालय छात्रों से हर साल छात्रसंघ शुल्क वसूलते रहे। अब मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने राज्य में सितंबर 2026 तक चुनाव कराने के निर्देश दिए हैं। ये फैसला अचानक नहीं आया। 2017 से बंद पड़े इन चुनावों को बहाल कराने के लिए पिटीशन डालने वाले भोपाल के अदनान अंसारी 2 साल से कोर्ट के चक्कर काट रहे थे। अब सवाल उठ रहे हैं कि…
2006 में ऐसा क्या हुआ कि पूरे देश की चुनावी व्यवस्था बदल गई, और 2017 के बाद मध्य प्रदेश में छात्रसंघ चुनाव क्यों ठप पड़ गए; पूरी कहानी आज के मध्य प्रदेश एक्सप्लेनर में…
सवाल 1: आखिर MP में छात्रसंघ चुनाव बंद क्यों किए गए थे? 2006 में ऐसा क्या हुआ था?
जवाब: हाईकोर्ट ने चुनाव बहाल करने का रास्ता खोल दिया है, लेकिन यह समझना जरूरी है कि आखिर चुनाव बंद क्यों हुए थे। इसकी कहानी करीब 20 साल पीछे से शुरू होती है।

2006 का सभरवाल कांड- पूरे देश की चुनाव व्यवस्था बदली
मध्य प्रदेश में पहले छात्रसंघ के प्रत्यक्ष चुनाव होते थे। यानी छात्र सीधे वोट डालकर अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, सचिव जैसे पद चुनते थे। बाद में कई विश्वविद्यालयों में अप्रत्यक्ष (CR आधारित) व्यवस्था अपनाई गई, जिसमें पहले हर कक्षा से क्लास रिप्रेजेंटेटिव (CR) चुने जाते थे और फिर यही CR मिलकर छात्रसंघ अध्यक्ष व अन्य पदाधिकारियों का चुनाव करते थे।
2006 में उज्जैन के माधव कॉलेज में एक चुनाव के दौरान गड़बड़ी की शिकायत मिलने पर राजनीति विज्ञान के प्रोफेसर एच.एस. सभरवाल ने चुनाव रद्द कर दिया। इसके बाद कॉलेज के बाहर उनके साथ मारपीट हुई, जिसमें उनकी मौत हो गई। तत्कालीन ABVP नेता विमल तोमर समेत छह लोगों पर हत्या का केस दर्ज हुआ। मुकदमा मध्य प्रदेश से महाराष्ट्र ट्रांसफर हुआ, और 2009 में सबूतों के अभाव में सभी आरोपी बरी हो गए और आरोपियों को क्लीन चिट दे दी गई। बाद में नवंबर 2011 में विमल तोमर ने ग्वालियर में फांसी लगाकर जान दे दी।

2006 में हमले के बाद प्रोफेसर सभरवाल को अस्पताल ले जाते लोग।
2. फिर 2017 के बाद चुनाव क्यों बंद हो गए?
2017 के इन्हीं चुनावों के दौरान मालवा-निमाड़ के आदिवासी इलाकों में सक्रिय संगठन जय आदिवासी युवा शक्ति (जयस) ने धार, झाबुआ, बड़वानी, खरगोन और खंडवा जैसे जिलों के कई कॉलेजों में असरदार प्रदर्शन किया। इससे पहली बार ABVP और NSUI के अलावा एक तीसरी ताकत उभरती दिखी।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि इसके बाद ही असली टालमटोल शुरू हुई। 2018 के विधानसभा चुनाव से पहले तत्कालीन भाजपा सरकार शायद किसी नए छात्र-आधारित राजनीतिक समीकरण का जोखिम नहीं लेना चाहती थी, इसलिए अगला चुनाव टाल दिया गया- हालांकि सरकार ने कभी आधिकारिक तौर पर यह वजह नहीं मानी।
2018 में सत्ता बदली, कांग्रेस सरकार आई, तत्कालीन उच्च शिक्षा मंत्री जीतू पटवारी ने चुनाव कराने की घोषणा भी की- पर 2019 के लोकसभा चुनाव नजदीक आ गए और बात फिर टल गई। इसके बाद कोविड, शैक्षणिक सत्र में बदलाव औ मामला लगातार

सवाल 2: हाईकोर्ट को दखल क्यों देना पड़ा और चुनाव कब होंगे?जवाब: करीब 9 साल तक चुनाव नहीं हुए।आखिरकार मामला हाईकोर्ट पहुंचा। कोर्ट को दखल क्यों देना पड़ा और अब आगे क्या होगा इसे ऐसे समझिए…
यह मामला भोपाल के अदनान अंसारी और इंदौर के अवि सूर्यवंशी की जनहित याचिकाओं से जुड़ा है। अंसारी छात्र राजनीति से जुड़े रहे हैं। उनका कहना है कि कोविड के दौरान जब कॉलेजों में पढ़ाई तक बंद थी, तब भी विश्वविद्यालय छात्रों से छात्रसंघ शुल्क और सांस्कृतिक शुल्क वसूलते रहे, लेकिन वर्षों तक छात्रसंघ चुनाव नहीं कराए गए। इसी सवाल को लेकर उन्होंने पहले आरटीआई लगाई और फिर हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
हाईकोर्ट ने अपने 3 अगस्त 2026 के आदेश में माना कि याचिका लंबित रहने के दौरान 2024-25 और 2025-26, दोनों शैक्षणिक सत्र निकल गए, लेकिन प्रदेश के किसी भी सरकारी विश्वविद्यालय में छात्रसंघ चुनाव नहीं हुए। इसी दौरान राम एकेडमिक कैलेंड ऐप खोलें कोर्ट को 2026-27 का संबर 2026 में छात्रसंघ चुनाव कराने का कार्यक्रम शामिल था।ने कहा कि जरूरत पड़ने पर संबंधित कॉलेज के प्राचार्य या विश्वविद्यालय के कुलपति स्थानीय एसपी या कलेक्टर से पुलिस सुरक्षा मांग सकते हैं।
सवाल 3: चुनाव नहीं हुए तो करोड़ों का छात्रसंघ शुल्क कहां गया?
जवाब: कोर्ट में चुनाव कराने की मांग के साथ एक और सवाल भी उठा- जब चुनाव हुए ही नहीं, तो छात्रों से हर साल लिया गया छात्रसंघ शुल्क आखिर गया कहां…यह सिर्फ आरोप नहीं हैं, दस्तावेजों में दर्ज है। अंसारी को यह जानकारी खुद RDVV से मिली- सूचना आयोग के आदेश पर विश्वविद्यालय ने 5 जून 2026 को यह ब्यौरा भेजा। सिर्फ इस एक यूनिवर्सिटी में, साढ़े चार साल के भीतर, छात्रों से इतनी रकम वसूली गई…
कुल मिलाकर करीब ₹8.07 करोड़ और यह सिर्फ एक यूनिवर्सिटी का आंकड़ा है, जबकि कोर्ट का आदेश प्रदेश के 15 सरकारी विश्वविद्यालयों पर लागू होता है। इतने पैसे के बदले इन साढ़े चार सालों में एक भी चुनाव नहीं हुआ।यह पैसा कहां और कैसे खर्च हुआ, इसका ब्यौरा RTI जवाब में नहीं दिया गया। अंसारी बताते हैं कि राज्य सूचना आयोग ने यूनिवर्सिटी से खर्च का हिसाब मांगा था, लेकिन वह हिस्सा अब तक सार्वजनिक नहीं हुआ।
कांग्रेस के प्रदेश प्रवक्ता और पूर्व NSUI नेता विवेक त्रिपाठी का दावा है कि सिर्फ चुनाव शुल्क नहीं, छात्र इंश्योरेंस, लाइब्रेरी फीस, NSS फीस, जनभागीदारी समिति शुल्क जैसी कई और मदों का पैसा भी लिया जाता है, पर फायदा शायद ही कभी मिलता है। ‘यह फंड यूनिवर्सिटी के खाते में जमा होता रहता है, और धीरे-धीरे सरकार इसका इस्तेमाल कहीं और कर लेती है।’
सवाल 4: सितंबर में चुनाव- वोट सीधे पड़ेंगे या CR मॉडल लौटेगा?जवाब: हाईकोर्ट ने सितंबर 2026 तक छात्रसंघ चुनाव कराने का आदेश वो ने दिया है, लेकिन सबसे बड़ा सवाल1. छात्र संगठन क्या चाहते हैं और सरकार क्या कह रही?प्रदेश के दो सबसे बड़े छात्र संगठन ABVP और NSUI एक ही राय रखते हैं। दोनों चाहते हैं कि छात्र सीधे वोट डालकर अध्यक्ष, उपाध्यक्ष और अन्य पदाधिकारी चुनें।
ABVP के प्रदेश मंत्री दर्शन का कहना है कि 2017 की तरह अप्रत्यक्ष (CR आधारित) व्यवस्था नहीं, बल्कि प्रत्यक्ष चुनाव होने चाहिए। उनके मुताबिक, इससे छात्रों को लोकतांत्रिक प्रक्रिया सीखने का मौका मिलता है और कैंपस में स्वस्थ चुनावी माहौल बनता है। वहीं NSUI भी सुप्रीम कोर्ट से मान्यता प्राप्त लिंगदोह समिति के मापदंडों के आधार पर प्रत्यक्ष चुनाव की मांग कर रही है।
याचिकाकर्ता अदनान अंसारी और NSUI के पूर्व नेता विवेक त्रिपाठी भी प्रत्यक्ष चुनाव के पक्ष में हैं। त्रिपाठी का सुझाव है कि बड़ी यूनिवर्सिटीज में पहले हर यूनिवर्सिटी टीचिंग डिपार्टमेंट (UTD) का अध्यक्ष चुना जाए, ताकि नेतृत्व नीचे से ऊपर तक लोकतांत्रिक तरीके से विकसित हो।सरकार अभी किसी एक मॉडल पर मुहर लगाने से बच रही है। 5 अगस्त को इंदौर में एक कार्यक्रम के दौरान उच्च शिक्षा मंत्री हाईकोर्ट के
3. चुनाव के बाद सबसे बड़ा टेस्ट क्या होगा?राजनीतिक विश्लेषक रशीद किदवई के मुताबिक असली परीक्षा सिर्फ चुनाव कराने की नहीं होगी, बल्कि यह देखने की होगी कि इन चुनावों से निकलने वाली नई छात्र लीडरशिप आगे राज्य की राजनीति में कितनी जगह बना पाती है।
रशीद के मुताबिक छात्रसंघ चुनाव में निर्दलीय उम्मीदवार भी जीत सकते हैं, लेकिन उन्हें विधानसभा और लोकसभा की मुख्यधारा की राजनीति तक पहुंचाने का रास्ता आसान नहीं होता। आने वाले चुनाव यह भी तय करेंगे कि नई पीढ़ी एबीवीपी, एनएसयूआई जैसे पारंपरिक संगठनों के साथ जाती है या कोई नया विकल्प उभरता है।सवाल 5: इससे MP की राजनीति पर क्या असर पड़ेगा?जवाब: 2 एंगल से इसे समझा जा सकता है…’नर्सरी ऑफ डेमोक्रेसी’ और Gen-Z की एंट्री:राजनीतिक
लीडरशिप फैक्ट्री दोबारा शुरू होगी, पर असर में वक्त लगेगा: त्रिपाठी के मुताबिक, राजस्थान जैसे पड़ोसी राज्यों में जहां नियमित छात्रसंघ चुनाव होते रहे, वहां से सांसद-विधायक तक निकले, जबकि मध्य प्रदेश पिछड़ गया। हालांकि किदवई सतर्क करते हैं कि नतीजे ‘तुरंत नहीं, बल्कि लगातार 2-3 चुनाव होने के बाद ही दिखेंगे,’ और राजनीतिक दल नए उभरते चेहरों को अपनी तरफ खींचने की पूरी कोशिश करेंगे।