दतिया चुनाव का मामला पेचीदा होता हुआ

बुवाई हो चुकी है, लेकिन पानी नहीं गिर रहा। एक-दो दिन और बारिश नहीं हुई तो मुश्किल हो जाएगी। दादा होते तो नहरों से पानी आ जाता।यह कहते हुए बहादुरपुर के रामकिशोर दांगी फिर ताश की बाजी में जुट जाते हैं। उनके लिए ‘दादा’ यानी दतिया के पूर्व विधायक नरोत्तम मिश्रा।

उपचुनाव में बीजेपी ने मिश्रा की जगह आशुतोष तिवारी को उम्मीदवार बनाया है, लेकिन टिकट बदलने का असर जमीन पर दिखाई देता है। मिश्रा के कुछ समर्थकों और उनसे जुड़े मतदाताओं में इस फैसले को लेकर नाराजगी है।

पिछले 18 वर्षों में दतिया बीजेपी संगठन में नरोत्तम मिश्रा और उनके समर्थकों का प्रभाव रहा है। इस दौरान पार्टी के पुराने कार्यकर्ताओं की सक्रियता कम हुई। अब मिश्रा का टिकट कटने के बाद पुराने कार्यकर्ता संगठन में सक्रिय हुए हैं, लेकिन जनता से उनका पहले जैसा जुड़ाव नहीं दिखता।

आशुतोष तिवारी के प्रचार रथ पर सीएम के साथ नरोत्तम मिश्रा प्रमुखता से नजर आते हैं।

बीजेपी को बूथ स्तर पर भी नए सिरे से जमावट करनी पड़ रही है, क्योंकि अब तक मिश्रा का निजी समर्थक नेटवर्क अहम भूमिका निभाता रहा था। बदले हालात में जातिगत समीकरण महत्वपूर्ण हो गए हैं और ब्राह्मण वोट चुनावी नतीजे में निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं।

दतिया के बदलते राजनीतिक समीकरणों को समझने के लिए दैनिक भास्कर ने राजनीतिक विश्लेषकों, बीजेपी प्रत्याशी आशुतोष तिवारी और पूर्व विधायक नरोत्तम मिश्रा से बातचीत की। समझिए, उपचुनाव में बीजेपी के भीतर क्या चल रहा है और जमीन पर उसके सामने क्या चुनौतियां हैं।

3 पॉइंट में समझिए: दतिया में बीजेपी के भीतर क्या चल रहा है?

1. मैदान में 8 मंत्री, 20 विधायकों को शक्ति केंद्रों की जिम्मेदारी

आशुतोष तिवारी के नामांकन के बाद बीजेपी ने चुनावी अभियान तेज कर दिया है। अब तक 8 मंत्री दतिया में प्रचार कर चुके हैं। अलग-अलग वर्गों तक पहुंचने के लिए पार्टी के विभिन्न मोर्चों के पदाधिकारी भी सक्रिय हैं। विधानसभा क्षेत्र में 20 विधायकों को अलग-अलग शक्ति केंद्रों की जिम्मेदारी दी गई है। ग्वालियर सांसद भारत सिंह कुशवाह चुनाव प्रभारी हैं।

2. चुनावी टीम में नरोत्तम, लेकिन प्रचार का तरीका अलग

नरोत्तम मिश्रा नामांकन के दौरान आशुतोष तिवारी के साथ और बाद में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की सभा के मंच पर भी नजर आए। तिवारी के प्रचार रथ और पोस्टरों पर मुख्यमंत्री व प्रदेश अध्यक्ष के साथ मिश्रा की तस्वीर भी है। पार्टी ने उन्हें चुनाव संचालन समिति का अध्यक्ष बनाया है। हालांकि, उनका प्रचार का तरीका अलग है।

वे प्रत्याशी के साथ कम और खुद घर-घर जाकर मतदाताओं से मिल रहे हैं। समर्थकों की नाराजगी के सवाल पर मिश्रा ने कहा कि अब कोई असंतुष्ट नहीं है और सभी पार्टी के लिए काम कर रहे हैं। टिकट कटने पर उन्होंने कहा, “पार्टी ने मुझे बहुत कुछ दिया। मैं 20 साल विधायक और 15 साल मंत्री रहा। हम अपने बारे में कब तक सोचेंगे? मैं सिर्फ कार्यकर्ता के रूप में काम करना चाहता हूं।”

3. होटल से चल रहा चुनावी संचालन, हाईटेक मीडिया सेल भी बनाया

बीजेपी ने चुनाव संचालन के लिए दतिया के एक होटल में अस्थायी मुख्यालय बनाया है। यहां मीडिया और सोशल मीडिया सेल भी काम कर रहा है। मीडिया सेल में नरोत्तम मिश्रा की बड़ी तस्वीर लगाई गई है।

यहीं से मीडिया ब्रीफिंग, नेताओं के दौरे और भाषणों से जुड़ी सामग्री सोशल मीडिया पर साझा की जा रही है। पार्टी के मीडिया प्रमुख और प्रदेश स्तर के पदाधिकारी भी इसी होटल से चुनावी गतिविधियों का समन्वय कर रहे हैं।

बीजेपी का हाईटेक मीडिया सेंटर।

बीजेपी के सामने 3 बड़ी चुनौतियां

राजनीतिक विश्लेषक और वरिष्ठ पत्रकार रवि ठाकुर के मुताबिक, इस उपचुनाव में बीजेपी के सामने तीन बड़ी चुनौतियां हैं-पुराने कार्यकर्ताओं को सक्रिय करना, बूथ स्तर पर नई टीम खड़ी करना और जातिगत समीकरण साधना।

चुनौती 1: पुराने कार्यकर्ताओं को फिर सक्रिय करना

रवि ठाकुर के मुताबिक, पिछले 18 साल में दतिया बीजेपी संगठन में नरोत्तम मिश्रा समर्थकों का प्रभाव बढ़ा और पुराने कार्यकर्ताओं की सक्रियता कम होती गई। कोर्ट के आदेश के बाद पूर्व विधायक राजेंद्र भारती की विधायकी खत्म होते ही मिश्रा समर्थकों ने उपचुनाव की तैयारी शुरू कर दी थी।

नरोत्तम मिश्रा के एक समर्थक ने नाम न छापने की शर्त पर कहा,

हमें पता था कि उपचुनाव होगा, इसलिए सुबह 7 से रात 11 बजे तक क्षेत्र में काम कर रहे थे। अंदाजा नहीं था कि दादा का टिकट कट जाएगा। इससे बहुत मायूसी है। दादा ही हमारे लिए सब कुछ थे, उनके बिना चुनाव नीरस लग रहा है।

रवि ठाकुर के मुताबिक, नरोत्तम समर्थक प्रचार में जुटे हैं, लेकिन उनमें पहले जैसा उत्साह नहीं दिख रहा। दूसरी ओर, लंबे समय से कम सक्रिय रहे पुराने बीजेपी कार्यकर्ता वापस तो आए हैं, लेकिन संगठन उन्हें अभी पूरी तरह सक्रिय नहीं कर पाया है। जनता से उनका संपर्क भी पहले जैसा नहीं है

चुनौती 2: 291 बूथों पर नई टीम खड़ी करना

दतिया विधानसभा में 291 बूथ हैं। बीजेपी ने हर बूथ पर प्रभारी नियुक्त किया है। क्षेत्र को 21 शक्ति केंद्रों में बांटकर विधायकों और पूर्व विधायकों को जिम्मेदारी दी गई है। इन्हें कार्यकर्ताओं के बीच तालमेल, मतदाताओं से संपर्क और मतदान प्रतिशत बढ़ाने का जिम्मा दिया गया है। रवि ठाकुर कहते हैं- इस चुनाव में बूथ मैनेजमेंट हार-जीत तय करने में अहम भूमिका निभाएगा।

ठाकुर के मुताबिक, उपचुनाव की आहट के साथ नरोत्तम मिश्रा ने ‘वन बूथ, 10 यूथ’ फॉर्मूले पर करीब 3,000 समर्थक कार्यकर्ताओं की टीम तैयार की थी। टिकट कटने के बाद इस टीम की सक्रियता प्रभावित हुई।

मिश्रा चुनाव संचालन समिति के अध्यक्ष हैं, लेकिन बूथ मैनेजमेंट की कमान संगठन ने अपने पास रखी है। पार्टी सूत्रों के मुताबिक, बूथों को संभालने के लिए संगठन ने एक समानांतर टीम भी तैयार की है।

चुनौती 3: जातिगत समीकरण साधना

बीजेपी ने अलग-अलग सामाजिक समूहों तक पहुंचने के लिए जातिगत समीकरणों के हिसाब से नेताओं को जिम्मेदारी दी है। विधानसभा के छह मंडलों में स्थानीय सामाजिक समीकरणों के आधार पर अलग-अलग नेताओं को तैनात किया गया है।

  • ब्राह्मण वोटर : इस वर्ग तक पहुंचने की जिम्मेदारी पूर्व मंत्री डॉ. नरोत्तम मिश्रा, मंत्री राकेश शुक्ला, गोपाल भार्गव और शैलेंद्र बरुआ को दी गई है।
  • क्षत्रिय समाज: मंत्री प्रद्युम्न सिंह तोमर समेत अन्य वरिष्ठ नेताओं को जिम्मेदारी दी गई है।
  • SC-ST मतदाता: उपमुख्यमंत्री जगदीश देवड़ा, मंत्री दिलीप अहिरवार और सांसद संध्या राय को इन वर्गों के बीच प्रचार की जिम्मेदारी दी गई है।
  • कुशवाह समाज: मंत्री नारायण सिंह कुशवाह, सांसद भारत सिंह कुशवाह और जिलाध्यक्ष रघुवीर सिंह कुशवाह को इस वर्ग तक पहुंचने की जिम्मेदारी दी गई है। इस वर्ग को साधने के लिए बीजेपी कुशवाह समाज सम्मेलन का आयोजन कर रही है। सीएम मोहन यादव इसमें शामिल होंगे।

कुशवाह समाज के आराध्य लव-कुश मंदिर में सीएम मोहन यादव।

वरिष्ठ पत्रकार रवि ठाकुर के मुताबिक, दतिया के चुनावों में जातिगत समीकरण अहम रहे हैं। यहां यादव और कुशवाह मतदाताओं की संख्या करीब 55 से 60 हजार है। नरोत्तम मिश्रा के चुनाव लड़ने के दौरान इन दोनों समाजों के अलग-अलग प्रत्याशी भी मैदान में रहते थे, इसलिए इनके वोट किसी एक दल के पक्ष में एकजुट नहीं होते थे।

ठाकुर के मुताबिक, मिश्रा इसकी भरपाई ब्राह्मण, ठाकुर और अन्य समाजों से मिलने वाले वोटों से करते थे। इस बार नरोत्तम मिश्रा मैदान में नहीं हैं। ऐसे में बीजेपी यादव और कुशवाह मतदाताओं के बीच अपनी पकड़ बढ़ाने की कोशिश कर रही है।

पार्टी को मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के जरिए यादव और सांसद भारत सिंह कुशवाह के जरिए कुशवाह मतदाताओं से समर्थन बढ़ने की उम्मीद है। वहीं, करीब 35 से 40 हजार ब्राह्मण मतदाताओं का रुख भी नतीजे पर अहम असर डाल सकता है।