
कवि सुमित ओरछा का अद्भुत सृजन…’धन्य धन्य बुन्देल धरा’ का दुर्गावती जयंती पर भोपाल में मंचन…
बुन्देलखण्ड की संस्कृति और इतिहास को समग्र रूप से समझना है तो दर्जनों ग्रंथ पढ़ने की जरूरत नहीं है। कवि सुमित ओरछा ने बुंदेलखंड के इतिहास और संस्कृति को ‘धन्य धन्य बुन्देल धरा’ फिल्म में बहुत ही अद्भुत तरीके से समेटा है। पर्दे पर यहाँ फ़िल्म चलती है, तो मंच पर बुंदेली, कलाकारों की प्रस्तुति समानांतर रूप से दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर देती है। इसमें महाराजा छत्रसाल के शौर्य, रानी दुर्गावती के अदम्य साहस, रानी लक्ष्मीबाई की वीरता, आल्हा-ऊदल की स्वरगाथा, लाला हरदौल और महाराजा खेतसिंह खंगार जैसे बुंदेलखंड के महान वीरों का स्मरण किया जाता है। राजा मधुकर शाह, रानी कुंवरी देवी, महाराजा छत्रसाल, टीकम शाह, राजा जुझार सिंह और लाला हरदौल सहित बुंदेलखंड के शूरवीरों को बहुत ही प्रभावी ढंग से पेश किया गया है जिसे देखकर दर्शक बुन्देलखण्ड से सहज ही एकाकार हो जाते हैं। वीरांगना रानी दुर्गावती की जयंती पर 5 अक्टूबर 2026 को भोपाल के हिन्दी भवन में “धन्य धन्य बुंदेल धरा” के मंचन और प्रदर्शन ने दर्शकों को पूरे समय बाँधे रखा।
तो “धन्य धन्य बुंदेल धरा” कवि सुमित ओरछा द्वारा प्रस्तुत बुंदेलखंड की गौरवशाली संस्कृति, इतिहास और वीरों की गाथाओं का एक प्रसिद्ध सांस्कृतिक मंचन और कार्यक्रम है। इसे गीत, संगीत, काव्य संवाद और नृत्य के माध्यम से अत्यंत प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया जाता है। बुंदेलखंड की माटी का इतिहास इतना समृद्ध है कि इसकी गाथाएं हर भारतवासी के मन में जोश भर देती हैं। कवि सुमित ओरछा की परिकल्पना से सजे इस गीत-नाट्य और लोक कला प्रस्तुति का मुख्य उद्देश्य बुंदेलखंड की लुप्त होती धरोहर और शौर्य गाथाओं को आज की पीढ़ी तक पहुंचाना है। इस मंचन में पारंपरिक बुंदेली गायन, लोकनृत्य (जैसे राई और बधाई), और ओजपूर्ण कविताओं का बेहतरीन मिश्रण देखने को मिलता है।इस भव्य कार्यक्रम को मध्य प्रदेश स्थापना दिवस, रानी दुर्गावती जयंती, और ओरछा के प्रसिद्ध ‘युवनाद’ महोत्सव जैसे बड़े मंचों पर प्रस्तुत कर दर्शकों को मंत्रमुग्ध किया गया है। इस कार्यक्रम और कविताओं में प्रमुख विभूतियों का यशगान किया जाता है।
महाराजा छत्रसाल (बुंदेल केसरी) ने मुगल शासक औरंगज़ेब के खिलाफ विद्रोह का बिगुल फूंका और अपने दम पर एक स्वतंत्र बुंदेलखंड राज्य की स्थापना की। उनकी वीरता के बारे में महाकवि भूषण ने लिखा था: “छत्ता तेरे राज में, धक-धक धरती होय।” गोंडवाना की शासक रानी दुर्गावती ने अकबर की विशाल सेना के सामने घुटने टेकने से इनकार कर दिया था। उन्होंने अत्यंत बहादुरी से युद्ध लड़ा और अंत में आत्मसम्मान की रक्षा के लिए स्वयं के प्राणों की आहुति दे दी।आल्हा और ऊदल, महोबा के ये दो भाई अपनी अद्वितीय शक्ति और 52 युद्धों को जीतने की अमर वीरगाथा (आल्हा-खंड) के लिए जाने जाते हैं। आज भी बुंदेलखंड में मानसून के समय गाया जाने वाला ‘आल्हा’ लोकगीत रगों में खून की रफ्तार बढ़ा देता है। ओरछा के दीवान लाला हरदौल, ओरछा के राजा जुझार सिंह के छोटे भाई थे। भाभी के प्रति अपने पवित्र रिश्ते पर उठे संदेह को दूर करने और भाई के सम्मान के लिए उन्होंने हंसते-हंसते विषपान कर लिया था। आज भी बुंदेलखंड में उन्हें एक लोक देवता के रूप में पूजा जाता है और विवाह के समय सबसे पहला निमंत्रण उन्हीं को दिया जाता है।
इस धरा की प्रशंसा केवल युद्धों के लिए ही नहीं, बल्कि इसकी प्राकृतिक सुंदरता और आध्यात्मिक चेतना के लिए भी की जाती है। लोकगीतों में अक्सर यहाँ की जीवनदायिनी नदियों का वर्णन मिलता है, जैसे केन नदी और बेतवा नदी जिसके पानी को बुंदेलखंड का गौरव माना जाता है।
ओरछा धाम को “बुंदेलखंड की अयोध्या” कहा जाता है, जहाँ भगवान श्री राम को राजा के रूप में पूजा जाता है। तो ओरछा भगवान कृष्ण के जुगल किशोर स्वरूप के लिए भी जाना जाता है। प्रकृति, खनिज और संसाधनों की बुंदेलखंड को समग्र रूप से आत्मसात कराने में कवि सुमित ने धन्य धन्य बुन्देल धरा के माध्यम से सफलता पाई है। ‘धन्य-धन्य बुंदेल धरा’ कार्यक्रम के माध्यम से बुंदेलखंड की लोक संस्कृति, यहां की वीर परंपरा, ऐतिहासिक गौरव और साहित्यिक विरासत से नई पीढ़ी से जोड़ने का सुमित का सफल प्रयास माना जा सकता है। कार्यक्रम में बुंदेलखंड की माटी से जुड़ी लोककलाओं और सांस्कृतिक परंपराओं को विशेष रूप से प्रस्तुत किया गया है। ‘धन्य धन्य बुन्देल धरा’ बताती है कि बुंदेलखंड केवल अपने ऐतिहासिक दुर्गों, राजाओं और वीर योद्धाओं के लिए ही नहीं, बल्कि अपनी लोकभाषा, लोकगीत, लोकनृत्य, साहित्य और सांस्कृतिक परंपराओं के लिए भी विशिष्ट पहचान रखता है। वास्तव में ‘धन्य-धन्य बुंदेल धरा’ इसी समृद्ध विरासत को एक मंच पर प्रस्तुत करने की विशिष्ट और सफल सांस्कृतिक पहल है। यदि बुन्देलखण्ड को समझना है, तो सभी को एक बार
इसे अवश्य देखना चाहिए। इसमें बहुत कुछ जोड़ा जा सकता है, लेकिन जो दिखता है वह गागर में सागर की तरह है…।

कौशल किशोर चतुर्वेदी
कौशल किशोर चतुर्वेदी मध्यप्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार हैं। प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में पिछले ढ़ाई दशक से सक्रिय हैं। पांच पुस्तकों व्यंग्य संग्रह “मोटे पतरे सबई तो बिकाऊ हैं”, पुस्तक “द बिगेस्ट अचीवर शिवराज”, ” सबका कमल” और काव्य संग्रह “जीवन राग” के लेखक हैं। वहीं काव्य संग्रह “अष्टछाप के अर्वाचीन कवि” में एक कवि के रूप में शामिल हैं। इन्होंने स्तंभकार के बतौर अपनी विशेष पहचान बनाई है।वर्तमान में भोपाल और इंदौर से प्रकाशित दैनिक समाचार पत्र “एलएन स्टार” में कार्यकारी संपादक हैं। इससे पहले इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में एसीएन भारत न्यूज चैनल में स्टेट हेड, स्वराज एक्सप्रेस नेशनल न्यूज चैनल में मध्यप्रदेश संवाददाता, ईटीवी मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ में संवाददाता रह चुके हैं। प्रिंट मीडिया में दैनिक समाचार पत्र राजस्थान पत्रिका में राजनैतिक एवं प्रशासनिक संवाददाता, भास्कर में प्रशासनिक संवाददाता, दैनिक जागरण में संवाददाता, लोकमत समाचार में इंदौर ब्यूरो चीफ दायित्वों का निर्वहन कर चुके हैं। नई दुनिया, नवभारत, चौथा संसार सहित अन्य अखबारों के लिए स्वतंत्र पत्रकार के तौर पर कार्य कर चुके हैं।