
इजराइल चुनाव के बाद मुख्य मुद्दा यही है कि वोटिंग ईवीएम से हो या बैलेट पेपर से…
इजराइल में चुनाव के बाद अब एक बार फिर मुद्दा यही है कि ऑनलाइन या ईवीएम से वोटिंग होनी चाहिए अथवा बैलेट पेपर से मतदान अधिक विश्वसनीय है। दुनिया के सबसे बड़े लोकतन्त्र में से एक भारत में सालों से अक्सर यही चर्चा हो रही है कि वोट की चोरी हो रही है और ईवीएम की जगह बैलेट पेपर से वोटिंग होनी चाहिए। और पूरा विपक्ष मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग कर रहा है। चुनाव आयोग और केंद्र सरकार को कटघरे में खड़ा किया जा रहा है। और मोदी सरकार की पहली पारी के बाद यानी 2019 में हुए लोकसभा चुनाव से वोट चोरी-वोट चोरी की कहानी ही लगातार विपक्ष के मुंह पर है। जिस तरह के परिणाम इजराइल में आए हैं, वह वास्तव में चौंकाने वाले हैं। किसी भी दल को पूर्ण बहुमत न मिलना यही साबित कर रहा है कि इज़राइल की चुनाव प्रक्रिया फूलप्रूफ है तो इजराइल का मतदाता यह समझ नहीं पा रहा है कि वहाँ सत्ता का बदलाव होना चाहिए अथवा नहीं।
तो इजराइल का चुनाव परिणाम अपनी जगह है। लेकिन पहले हम यहां मतदान की प्रक्रिया समझ लेते हैं। इजरायल में वोटिंग (चुनाव) की प्रक्रिया पूरी तरह से पारंपरिक बैलेट पेपर और बैलेट बॉक्स के जरिए होती है। वहां कोई ईवीएम (इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन) या ऑनलाइन वोटिंग का इस्तेमाल नहीं किया जाता है। इजरायल दुनिया के सबसे हाई-टेक देशों में से एक होने के बावजूद बैलेट पेपर से वोटिंग कराता है, इजरायल के पोलिंग बूथ के अंदर एक ट्रे या केबिन होता है, जिसमें चुनाव लड़ रही सभी राजनीतिक पार्टियों के नाम और उनके विशेष चुनावी कोड छपे हुए कागज के छोटे-छोटे पर्चे रखे होते हैं। मतदाता को बूथ के अंदर जाते समय एक खाली आधिकारिक लिफाफा दिया जाता है। मतदाता पर्दे के पीछे जाकर अपनी मनपसंद पार्टी का कागज का पर्चा उठाता है, उसे उस लिफाफे के अंदर बंद करता है और बाहर आकर बैलेट बॉक्स में डाल देता है। मतदान समाप्त होने के बाद, मतपेटियों को खोला जाता है और चुनाव कर्मचारी एक-एक लिफाफे को खोलकर हाथों से पर्चियां गिनते हैं। गिनती के लिए किसी भी डिजिटल मशीन का उपयोग नहीं किया जाता ताकि नतीजों में किसी भी तरह की गड़बड़ी की गुंजाइश न रहे।इजरायल का मानना है कि इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम या इंटरनेट से जुड़े किसी भी माध्यम को हैक किया जा सकता है। बाहरी दुश्मनों या हैकर्स से चुनाव प्रणाली को पूरी तरह सुरक्षित रखने के लिए वे कागज के पर्चों (बैलेट पेपर) पर ही भरोसा करते हैं। उनका मानना है कि कागजी पर्चों की फिजिकल गिनती से धांधली का खतरा खत्म हो जाता है और जनता का चुनाव परिणामों पर भरोसा बना रहता है।
वैसे भारत की तरह इजरायल में अलग-अलग क्षेत्रों की लोकसभा या विधानसभा सीटें नहीं होतीं। पूरा देश एक ही चुनाव क्षेत्र माना जाता है। जनता किसी एक उम्मीदवार को नहीं, बल्कि सीधे पार्टी को वोट देती है। देश भर में किसी पार्टी को जितने प्रतिशत वोट मिलते हैं, उसी अनुपात में उसे संसद (नेसेट) की 120 सीटों में से सीटें मिल जाती हैं। संसद में जगह बनाने के लिए किसी भी दल को कम से कम 3.25% वोट पाना अनिवार्य होता है।
इसराइल के आम चुनाव के आंशिक नतीजों से पता चलता है कि प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू अपने प्रतिद्वंद्वी और पूर्व सैन्य प्रमुख गादी आइजनकोट से आगे चल रहे हैं, लेकिन संसद में बहुमत हासिल करने से अभी भी दूर हैं। 85% मतों की गिनती के बाद, नेतन्याहू और उनके सहयोगी 120 सीटों वाली संसद में 53 सीटें जीतने की स्थिति में हैं तो आइजनकोट की याशर पार्टी और उनके गुट की तीन अन्य यहूदी विपक्षी पार्टियां 48 सीटें जीतने की ओर बढ़ रही हैं।दोनों नेताओं ने कहा है कि वे गठबंधन सरकार बनाने की कोशिश करेंगे। वहीं अरब नेतृत्व वाली पार्टियां 19 सीटों पर जीत हासिल कर सकती हैं। अब ये पार्टियां किंगमेकर के रूप में उभर सकती हैं। लेकिन यहूदी पार्टियों में से एक को छोड़कर बाकी सभी ने उनके साथ काम न करने का निर्णय लिया है।
सैनिकों, राजनयिकों और अस्पतालों में भर्ती मरीजों समेत विभिन्न समूहों के चार लाख 30 हजार से चार लाख 80 हजार डाक मतपत्रों की गिनती अभी बाकी है, इसलिए अंतिम चुनाव नतीजे आने में एक या दो दिन और लग सकते हैं।
इजराइल में हुए चुनाव को अगर भारत के संदर्भ में देखा जाए तो वहाँ सबसे खूबसूरत बात यही है कि कोई भी दल या नेता चुनाव प्रक्रिया और मतदान पर सवाल नहीं उठा रहा है। गठबंधन की सरकार बनाने के दावे हो रहे हैं लेकिन कौन सरकार बनाएगा, इसको लेकर स्थिति साफ नहीं है। यानि जो भी परिणाम हैं और परिणामों के अनुसार जो भी सरकार गठित होगी, उस पर सबका भरोसा है। और वास्तव में एक बेहतर लोकतंत्र की यही पहचान है कि चुनावी प्रक्रिया और चुनाव आयोग के प्रति किसी भी दल और किसी भी व्यक्ति को तनिक भी संदेह नहीं होना चाहिए। मतदान पारदर्शी और हर मतदाता के और हर राजनीतिक दल के भरोसे पर खरा उतरना चाहिए। इसका मतलब यह कतई नहीं है कि भारत में परंपरागत बैलेट पेपर से मतदान की तरफ लौटा जाना चाहिए। लेकिन इजराइल चुनाव के बाद मुख्य मुद्दा भी यही है कि लोकतंत्र में सबका भरोसा जीतने के लिए वोटिंग ईवीएम से हो या बैलेट पेपर से…।

कौशल किशोर चतुर्वेदी
कौशल किशोर चतुर्वेदी मध्यप्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार हैं। प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में पिछले ढ़ाई दशक से सक्रिय हैं। पांच पुस्तकों व्यंग्य संग्रह “मोटे पतरे सबई तो बिकाऊ हैं”, पुस्तक “द बिगेस्ट अचीवर शिवराज”, ” सबका कमल” और काव्य संग्रह “जीवन राग” के लेखक हैं। वहीं काव्य संग्रह “अष्टछाप के अर्वाचीन कवि” में एक कवि के रूप में शामिल हैं। इन्होंने स्तंभकार के बतौर अपनी विशेष पहचान बनाई है।वर्तमान में भोपाल और इंदौर से प्रकाशित दैनिक समाचार पत्र “एलएन स्टार” में कार्यकारी संपादक हैं। इससे पहले इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में एसीएन भारत न्यूज चैनल में स्टेट हेड, स्वराज एक्सप्रेस नेशनल न्यूज चैनल में मध्यप्रदेश संवाददाता, ईटीवी मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ में संवाददाता रह चुके हैं। प्रिंट मीडिया में दैनिक समाचार पत्र राजस्थान पत्रिका में राजनैतिक एवं प्रशासनिक संवाददाता, भास्कर में प्रशासनिक संवाददाता, दैनिक जागरण में संवाददाता, लोकमत समाचार में इंदौर ब्यूरो चीफ दायित्वों का निर्वहन कर चुके हैं। नई दुनिया, नवभारत, चौथा संसार सहित अन्य अखबारों के लिए स्वतंत्र पत्रकार के तौर पर कार्य कर चुके हैं।