13 सितंबर आज से गुरु हो रहे हैं मार्गी, इन 6 राशि वालों का शुरू होगा शुभ समय-एकादशी में चावल वजिर्त क्यों?

13 सितंबर आज से गुरु हो रहे हैं मार्गी, इन 6 राशि वालों का शुरू होगा शुभ समय

13 सितंबर, रविवार को गुरु धनु राशि में मार्गी होगा और 20 नवंबर को मकर राशि में जाने तक मार्गी ही रहेगा.

सितंबर का महीना विशेष है. इस दिन 7 ग्रहों की चाल बदल रही है. इनमें 13 सितंबर को गुरु की चाल बदल रही है

122 दिन वक्री स्थिति में रहने के बाद गुरु ग्रह 13 सितंबर को मार्गी हो जाएगा.
मार्गी का मतलब है कि कि पृथ्वी से देखने पर सीधी चाल से चलता हुआ दिखाई देगा. गुरु के मार्गी होने का असर देश राशियों पर नजर पड़ेगा.
गुरू के मार्गी होने का जहां कुछ राशियों पर अच्छा प्रभाव पड़ेगा तो वहीं कुछ राशियों पर बुरा प्रभाव पड़ेगा.
6 राशियां ऐसी हैं जिन पर गुरू के मार्गी होने का बहुत अच्छा प्रभाव पड़ने वाला हैं. जानते हैं वे कौन सी राशि हैं-

इन 6 राशियों को होगा गुरू के मार्गी होने का फायदा

मेष
व्यापार में फायदा होगा. परिवार का पूरा सहयोग मिलेगा. अधिकारियों तारीफ मिलेगी. अध्यात्मिकता की ओर झुकाव बढ़ेगा

वृषभ
समाज में मान-सम्मान बढ़ेगा, जीवन साथी का साथ मिलेगा. धन के मामले में लाभ होगा. संतान के भविष्य की चिंता खत्म होगी.

सिंह
परिवार में नया सदस्य आ सकता है. छात्रों को शुभ समाचार मिलेगा. रिश्तों में सुधार आएगा. नए अवसरों की प्राप्ति होगी.

वृश्चिक
पैतृक संपत्ति का विवाद हल होगा, आय बढ़ेगी, जो लोग नौकरी खोज रहे हैं उन्हें नौकरी मिल सकती है.

मकर
ऑफिस और कारोबार दोनों में ही समय अच्छा रहेगा. परिवार में भाई-बहनों का साथ मिलेगा. गरीबों की मदद करने की प्रेरणा मिलेगी.

कुंभ
आय बढ़ेगी, ऑफिस में अधिकारियों का सहयोग मिलेगा. समाज में सम्मान बढ़ेगा. जो भी काम हाथ में लेंगे सफलता हाथ लगेगी.
माँ शारदा ज्योतिषधाम अनुसन्धान संस्थान इंदौर
पंडित दिनेश गुरुजी
9977794111

 

एकादशी में चावल वजिर्त क्यों?
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वर्ष की चौबीसों एकादशियों में चावल न खाने की सलाह दी जाती है। ऐसा माना गया है कि इस दिन चावल खाने से प्राणी रेंगने वाले जीव की योनि में जन्म पाता है, किन्तु द्वादशी को चावल खाने से इस योनि से मुक्ति भी मिल जाती है। एकादशी के विषय में शास्त्र कहते हैं, ‘न विवेकसमो बन्धुर्नैकादश्या: परं व्रतं’ यानी विवेक के सामान कोई बंधु नहीं है और एकादशी से बढ़ कर कोई व्रत नहीं है। पांच ज्ञान इन्द्रियां, पांच कर्म इन्द्रियां और एक मन, इन ग्यारहों को जो साध ले, वह प्राणी एकादशी के समान पवित्र और दिव्य हो जाता है। एकादशी जगतगुरु विष्णुस्वरुप है, जहां चावल का संबंध जल से है, वहीं जल का संबंध चंद्रमा से है। पांचों ज्ञान इन्द्रियां और पांचों कर्म इन्द्रियों पर मन का ही अधिकार है। मन ही जीवात्मा का चित्त स्थिर-अस्थिर करता है। मन और श्वेत रंग के स्वामी भी चंद्रमा ही हैं, जो स्वयं जल, रस और भावना के कारक हैं, इसीलिए जलतत्त्व राशि के जातक भावना प्रधान होते हैं, जो अक्सर धोखा खाते हैं। एकादशी के दिन शरीर में जल की मात्र जितनी कम रहेगी, व्रत पूर्ण करने में उतनी ही अधिक सात्विकता रहेगी। महाभारत काल में वेदों का विस्तार करने वाले भगवान व्यास ने पांडव पुत्र भीम को इसीलिए निर्जला एकादशी (वगैर जल पिए हुए) करने का सुझाव दिया था। आदिकाल में देवर्षि नारद ने एक हजार वर्ष तक एकादशी का निर्जल व्रत करके नारायण भक्ति प्राप्त की थी। वैष्णव के लिए यह सर्वश्रेष्ठ व्रत है।
चंद्रमा मन को अधिक चलायमान न कर पाएं, इसीलिए व्रती इस दिन चावल खाने से परहेज करते हैं। एक और पौराणिक कथा है कि माता शक्ति के क्रोध से भागते-भागते भयभीत महर्षि मेधा ने अपने योग बल से शरीर छोड़ दिया और उनकी मेधा पृथ्वी में समा गई। वही मेधा जौ और चावल के रूप में उत्पन्न हुईं। ऐसा माना गया है कि यह घटना एकादशी को घटी थी। यह जौ और चावल महर्षि की ही मेधा शक्ति है, जो जीव हैं। इस दिन चावल खाना महर्षि मेधा के शरीर के छोटे-छोटे मांस के टुकड़े खाने जैसा माना गया है, इसीलिए इस दिन से जौ और चावल को जीवधारी माना गया है। आज भी जौ और चावल को उत्पन्न होने के लिए मिट्टी की भी जरूत नहीं पड़ती। केवल जल का छींटा मारने से ही ये अंकुरित हो जाते हैं। इनको जीव रूप मानते हुए एकादशी को भोजन के रूप में ग्रहण करने से परहेज किया गया है, ताकि सात्विक रूप से विष्णुस्वरुप एकादशी का व्रत संपन्न हो सके।
माँ शारदा ज्योतिषधाम अनुसंधान संस्थान इंदौर
पंडित दिनेश गुरुजी
9977794111

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