पति पत्नी में पारिवार में कलह दूर करने के उपाय- एकादशी में चावल वजिर्त क्यों?

…. पति पत्नी में पारिवार में कलह दूर करने के उपाय …

यदि पति-पत्नी के मध्य तनाव अधिक रहता हो तीन गोमती चक्र लेकर घर के दक्षिण में हलूं बलजाद कहकर फेंक देंने से सम्बन्ध सुधरने लगते है

यदि तमाम प्रयासों के बावजूद भी घर के सदस्यों के मध्य तालमेल का आभाव हो, घर में कलह रहती हो तो घर में निश्चित ही दूटा बर्तन, टूटा काँच / शीशी , पुराना टूटा जंग खाया अनुपयोगी लोहा आदि होगा उसे शीघ्र ही घर से बाहर करें, घर के सदस्यों के आपसी सम्बन्धो में सुधार होने लगेगा

घर से कलह को दूर रखने के लिए घर में बनने वाली पहली रोटी को देसी घी से चुपड़कर गुड़ के साथ गाय को खिलाएं

झाड़ू की दो साफ सींको को उल्टा – सीधा रखकर नीले धागे से बांधकर घर के दक्षिण – पश्चिम में रखने से दाम्पत्य जीवन में प्रेम बड़ता है

सुखी दाम्पत्य जीवन के लिए पाँच गोमती चक्र को लाल सिंदूर की डिब्बी में घर में रखे , इससे पति पत्नी के बीच प्रेम बना रहता है

दो जमुनिया रत्न लेकर उन्हें गंगाजल में डूबा दें। हर शनिवार को इस गंगा जल का पूरे घर में छिड़काव करें। पति पत्नी के बीच आपसी प्रेम सम्बन्ध सदैव मधुर रहेंगे

घर से रोग, कलह, क्लेश और नकारात्मक ऊर्जा को दूर करने के लिए नित्य हनुमान चालीसा की चौपाई को ज्यादा से ज्यादा मन्त्र की तरह बोलना चाहिए

“बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरौं पवन – कुमार ।
बल बुधि बिद्या देहु मोहिं, हरहु कलेस बिकार”॥

यदि पति पत्नी के मध्य कलह रहती हो तो पति को शुक्रवार को अपनी पत्नी को काँटे रहित सुन्दर पुष्प एवं सुगन्धित इत्र भेंट करें साथ ही चाँदी की कटोरी में चम्मच से दही में चीनी मिलाकर अपनी पत्नी को खिलाऐं, इससे
आपस में सदैव प्रेम बना रहता है।
माँ शारदा ज्योतिषधाम अनुसन्धान संस्थान इंदौर
पंडित दिनेश गुरुजी ज्योतिष वास्तु,पितृदोष विशेषज्ञ
9977794111

 

एकादशी में चावल वजिर्त क्यों?
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वर्ष की चौबीसों एकादशियों में चावल न खाने की सलाह दी जाती है। ऐसा माना गया है कि इस दिन चावल खाने से प्राणी रेंगने वाले जीव की योनि में जन्म पाता है, किन्तु द्वादशी को चावल खाने से इस योनि से मुक्ति भी मिल जाती है। एकादशी के विषय में शास्त्र कहते हैं, ‘न विवेकसमो बन्धुर्नैकादश्या: परं व्रतं’ यानी विवेक के सामान कोई बंधु नहीं है और एकादशी से बढ़ कर कोई व्रत नहीं है। पांच ज्ञान इन्द्रियां, पांच कर्म इन्द्रियां और एक मन, इन ग्यारहों को जो साध ले, वह प्राणी एकादशी के समान पवित्र और दिव्य हो जाता है। एकादशी जगतगुरु विष्णुस्वरुप है, जहां चावल का संबंध जल से है, वहीं जल का संबंध चंद्रमा से है। पांचों ज्ञान इन्द्रियां और पांचों कर्म इन्द्रियों पर मन का ही अधिकार है। मन ही जीवात्मा का चित्त स्थिर-अस्थिर करता है। मन और श्वेत रंग के स्वामी भी चंद्रमा ही हैं, जो स्वयं जल, रस और भावना के कारक हैं, इसीलिए जलतत्त्व राशि के जातक भावना प्रधान होते हैं, जो अक्सर धोखा खाते हैं। एकादशी के दिन शरीर में जल की मात्र जितनी कम रहेगी, व्रत पूर्ण करने में उतनी ही अधिक सात्विकता रहेगी। महाभारत काल में वेदों का विस्तार करने वाले भगवान व्यास ने पांडव पुत्र भीम को इसीलिए निर्जला एकादशी (वगैर जल पिए हुए) करने का सुझाव दिया था। आदिकाल में देवर्षि नारद ने एक हजार वर्ष तक एकादशी का निर्जल व्रत करके नारायण भक्ति प्राप्त की थी। वैष्णव के लिए यह सर्वश्रेष्ठ व्रत है।
चंद्रमा मन को अधिक चलायमान न कर पाएं, इसीलिए व्रती इस दिन चावल खाने से परहेज करते हैं। एक और पौराणिक कथा है कि माता शक्ति के क्रोध से भागते-भागते भयभीत महर्षि मेधा ने अपने योग बल से शरीर छोड़ दिया और उनकी मेधा पृथ्वी में समा गई। वही मेधा जौ और चावल के रूप में उत्पन्न हुईं। ऐसा माना गया है कि यह घटना एकादशी को घटी थी। यह जौ और चावल महर्षि की ही मेधा शक्ति है, जो जीव हैं। इस दिन चावल खाना महर्षि मेधा के शरीर के छोटे-छोटे मांस के टुकड़े खाने जैसा माना गया है, इसीलिए इस दिन से जौ और चावल को जीवधारी माना गया है। आज भी जौ और चावल को उत्पन्न होने के लिए मिट्टी की भी जरूत नहीं पड़ती। केवल जल का छींटा मारने से ही ये अंकुरित हो जाते हैं। इनको जीव रूप मानते हुए एकादशी को भोजन के रूप में ग्रहण करने से परहेज किया गया है, ताकि सात्विक रूप से विष्णुस्वरुप एकादशी का व्रत संपन्न हो सके।
माँ शारदा ज्योतिषधाम अनुसंधान संस्थान इंदौर
पंडित दिनेश गुरुजी
9977794111

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