
कंगना रनौत ने हाल ही में एक इंटरव्यू में कहा है कि सांसद की सैलरी लगभग ₹1.24 लाख प्रति माह होती है, लेकिन खर्चे इतने अधिक हैं कि उन्हें अपनी जेब से लाखों रुपये खर्च करने पड़ते हैं:
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कंगना का मानना है कि राजनीति “एक बहुत महंगा शौक” है।
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सांसदों को सरकारी बेसिक सैलरी के साथ ₹70,000 क्षेत्रीय भत्ता और ₹60,000 कार्यालय खर्च की मंजूरी होती है।
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मार्च 2025 में सांसदों की तनख्वाह में 24% वृद्धि हुई, जिसके बाद कुल ₹1,24,000 मासिक मिलते हैं।
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कंगना बताती हैं कि कुक और ड्राइवर के वेतन काटने के बाद केवल ₹50–60 हजार ही बचते हैं।
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राजस्व फ़ोन, स्टाफ, यात्रा, स्टेशनरी, ईंधन और आवास जैसे खर्च सांसद को खुद ही उठाने पड़ते हैं।
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वे कहती हैं कि मंडी क्षेत्र में 300–400 किमी की यात्राएँ करनी पड़ती हैं, जिससे लाखों रुपये खर्च हो जाते हैं।
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कंगना कहती हैं, “अगर आपको स्टाफ के साथ यात्रा करनी है, तो खर्च लाखों में होता है।”
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उनका कहना है कि राजनीति को प्रोफेशन से अलग नहीं किया जा सकता—अगर आप ईमानदार हैं, तो नौकरी भी करनी होगी।
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उन्होंने कहा कि बहुत से सांसद फंड जुटाने के लिए वकील या बिजनेस करते हैं।
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मीडिया रिपोर्ट में कहा गया कि उनका बयान राजनीति की महंगी प्रकृति की सच्चाई दर्शाता है।
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सांसदों को MPLADS के रूप में ₹5 करोड़ प्रति वर्ष मिलते हैं, पर उसके उपयोग में भी नियम और सीमाएँ हैं।
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विश्लेषण में बताया गया कि ईमानदार लोग राजनीति में टिकना मुश्किल पाते हैं।
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अमिताभ बच्चन का ज़िक्र करते हुए कहा गया कि राजनीति का जोखिम और खर्च उन्हें महंगा पड़ा।
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कई सांसद MPLADS का पूरा उपयोग नहीं करते क्योंकि उसका पारदर्शी उपयोग मुश्किल होता है।
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राजनीति में टिकने के लिए निजी संसाधनों की जरूरत होती है।
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कंगना ने कहा कि ₹50,000 की नेट सैलरी से सांसद का जीवन नहीं चल सकता।
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उन्होंने कहा कि राजनीति में सिर्फ सरकारी वेतन से गुज़ारा मुमकिन नहीं।
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सोशल मीडिया पर उनके बयान को लेकर तीखी प्रतिक्रियाएँ आ रही हैं।
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कुछ लोग समर्थन कर रहे हैं, कुछ आलोचना।
कंगना का यह बयान दर्शाता है कि सांसद की सैलरी सीमित है और निजी खर्च बहुत ज़्यादा हैं।