मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की जबलपुर खंडपीठ ने हत्या के एक मामले की सुनवाई के दौरान राज्य के शासकीय अधिवक्ता की तैयारी पर कड़ी नाराजगी जताई। अदालत ने पाया कि सरकारी वकील केस की फाइल तक पढ़कर नहीं आए थे और न्यायालय की कोई मदद नहीं कर सके। इसे गंभीर मानते हुए हाईकोर्ट ने मुख्य सचिव को आदेश की प्रति भेजने के निर्देश दिए हैं और कहा है कि शासकीय अधिवक्ताओं की नियुक्ति योग्यता और क्षमता के आधार पर होनी चाहिए।

हाईकोर्ट ने राज्य के सरकरी वकीलों की कार्यप्रणाली पर गंभीर टिप्पणी की है। अदालत ने कहा कि आपराधिक अपील की सुनवाई में राज्य की ओर से उपस्थित सरकारी वकील केस की तैयारी करके नहीं आए थे और न्यायालय के सवालों का संतोषजनक जवाब भी नहीं दे सके।
हाईकोर्ट ने इसे गंभीर स्थिति मानते हुए आदेश की प्रति मध्यप्रदेश के मुख्य सचिव को भेजने के निर्देश दिए हैं, ताकि शासकीय अधिवक्ताओं की सूची की समीक्षा कर उनकी योग्यता और दक्षता का परीक्षण किया जा सके।
यह टिप्पणी हाईकोर्ट की जबलपुर खंडपीठ में लंबित आपराधिक अपील (लंका प्रसाद बसोर एवं अन्य बलात्म सामन आई। इस मामले पग जुणपाइ जस्टिस विवेक अग्रवाल और जस्टिस रत्नेश चंद्र सिंह बिसेन की खंडपीठ ने की।
यह मामला सिंगरौली जिले के वैढ़न स्थित सत्र न्यायालय के 21 नवंबर 2017 के फैसले से जुड़ा है। सत्र न्यायालय ने दो आरोपियों को हत्या और मारपीट के आरोप में दोषी ठहराया था।
निचली अदालत ने आरोपियों को तीन आरोपों में एक-एक वर्ष का कठोर कारावास और दो आरोपों में आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। इसके साथ ही आरोपियों पर 500 और 1000 रुपए का जुर्माना भी लगाया गया था। जुर्माना न भरने पर अतिरिक्त जेल की सजा का प्रावधान भी रखा गया था।
एफआईआर में नाम नहीं, इसलिए शोभन बसोर को राहत-
सुनवाई के दौरान अपीलकर्ताओं के वकील ने तर्क दिया कि 21 अप्रैल 2009 को थाना सरई, जिला सिंगरौली में दर्ज एफआईआर में शोभन बसोर का नाम ही नहीं है। एफआईआर में केवल पांच लोगों के नाम दर्ज थे। इनमे रामू बसोर, लंका बसोर, संतोष बसोर, जियालाल बसोर, और बच्चेलाल बसोर।
न्यायालय में दलील दी गई कि शोभन बसोर का नाम बाद में बिना स्पष्ट भूमिका बताए शामिल किया गया। रिकॉर्ड का अवलोकन करने के बाद अदालत ने माना कि अपील के अंतिम में समय लगेग हाल शोभन बसोर निलंबित कर उसे जमानत दी।
लाठी पर मिला खून, बच्चेलाल को राहत नहीं
दूसरे आरोपी बच्चेलाल बसोर के मामले में अदालत ने राहत देने से इनकार कर दिया। अदालत ने पाया कि एफएसएल रिपोर्ट में बच्चेलाल बसोर से बरामद लाठी पर खून के निशान पाए गए थे। इसके अलावा मामले में चश्मदीद गवाह भी मौजूद हैं। इन तथ्यों को देखते हुए अदालत ने कहा कि इस स्तर पर सजा निलंबित करने का कोई आधार नहीं बनता। इसलिए बच्चेलाल बसोर की जमानत और सजा निलंबन की याचिका खारिज कर दी गई।
सरकारी वकील की तैयारी पर हाईकोर्ट की नाराजगी
ई के दौरान अदा शासकीय अधिवक्ता कमल सिंह बघेल की तैयारी पर भी कड़ी नाराजगी जताई। अदालत ने कहा कि सरकारी वकील केस की फाइल पढ़कर नहीं आए थे और