‘मां’ के भाव को जी लें ‘विधायक’, तो लोकतंत्र धन्य हो जाए… कौशल किशोर चतुर्वेदी

‘मां’ के भाव को जी लें ‘विधायक’, तो लोकतंत्र धन्य हो जाए…
नवगठित सभा समितियों की संयुक्त बैठक में विधानसभा अध्यक्ष नरेंद्र सिंह तोमर ने मन को छू लेने वाली बात कही है कि विधानसभा की भूमिका मां की तरह है। विधायक विधानसभा में पूरे प्रदेश का प्रतिनिधित्व करते हैं। ऐसे में सभी विधायकों को अपने दायित्व को समझना चाहिए। और विधानसभा की तरह विधायकों को भी मां के भाव को जीते हुए प्रदेश की आठ करोड़ जनता का ख्याल रखना चाहिए। यदि विधायक अपनी इस भूमिका का निर्वहन इस भाव से नहीं कर पाते हैं तो कहीं न कहीं हमारे काम में अधूरापन है। ऐसे में लोकतंत्र की भावना भी अधूरी रह जाती है। ऐसे में लोकतंत्र जो कि हमें
हमारे पूर्वजों के त्याग और बलिदान से मिला है, उसका उद्देश्य भी अधूरा रह जाता है।
एक बार हम फिर इस पूरी बात पर गौर करते हैं कि विधानसभा अध्यक्ष नरेंद्र सिंह तोमर ने वास्तव में बहुत ही अच्छी बात कही है कि विधानसभा के बारे में जब हम विचार करते हैं तो तरह−तरह के विचार आते हैं। अगर सबसे बड़ी पंचायत लोकसभा है तो पंचायत व नगरीय निकाय सबसे छोटी इकाई हैं। विधानसभा पूरे राज्य का प्रतिनिधित्व करती है। विधानसभा की भूमिका मां की तरह होती है। जिस तरह मां अपने बच्चे को जन्म देती है, उसका लालन-पालन कर उसे देश के हित में तैयार करने की कल्पना करती है, ठीक उसी तरह हम भी विधानसभा को मां की भूमिका में देखेंगे तो हम भी अपने दायित्व को उसके संपूर्ण रूप में देख पाएंगे। अपनी भूमिका के बारे में सोच पाएंगे। यदि मां विधानसभा के सदस्य के रूप में हम सभी के विचार में प्रदेश की आठ करोड़ जनता के कल्याण का ख्याल नहीं आता है तो हमारी भूमिका अधूरी है। हमें इस अधूरी भूमिका को पूर्ण करने का कार्य करना चाहिए। इसी कड़ी में नरेंद्र सिंह तोमर ने कहा कि समितियों की बैठक नियमित होने का लक्ष्य रखा जाना चाहिए। एक वर्ष में कम से कम 12 बैठकें होने की अपेक्षा है। समिति की बैठक होने से विधानसभा के कार्य व्यवहार में सुधार की संभावना होगी। समितियों की बैठक का यदि परिणाम नहीं भी निकलता है तो भी अध्ययन प्रक्रिया से हमारा ज्ञान समृद्ध होगा। मतलब यही है कि यह ज्ञान भी कहीं न कहीं प्रदेश की आठ करोड़ आबादी के काम ही आएगा।
तो मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने संसदीय परंपरा के पालन के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि संसदीय समितियों का बड़ा महत्व है। उन्होंने भी एक स्पष्ट राय रखी कि विशेषाधिकार समिति पर ध्यान केंद्रित करने की जगह
बाकी समितियों के माध्यम से आम आदमी के हितों में कार्य करना अधिक आवश्यक है। हर समिति कहीं न कहीं प्रदेश की आबादी के कल्याण पर केंद्रित है। कहीं ना कहीं इसका संबंध भी प्रदेश की आठ करोड़ आबादी के हितों के प्रति विधायकों की भूमिका से संबंधित है।
इस बात का बार-बार उल्लेख करने का मतलब यही है कि लोकतंत्र का मतलब ही जनता द्वारा, जनता का और जनता के लिए शासन है। और हमारे पूर्वज जिस लोकतंत्र के लिए फांसी के फंदों पर खुशी-खुशी झूले थे, उस लोकतंत्र के मायने शायद अब पूरे नहीं हो पा रहे हैं। अगर जनता इस बात को महसूस कर रही है तो हमारे जिम्मेदार नेता भी इसे उतनी ही गंभीरता के साथ महसूस कर रहे हैं। आजादी के 75 साल बाद आज जब हम चुने हुए जनप्रतिनिधियों की भूमिका को देखते हैं, तो शायद देश के जिम्मेदार नागरिकों और जिम्मेदार जनप्रतिनिधियों को धक्का ही लगता है। ऐसे में विधानसभा अध्यक्ष नरेंद्र सिंह तोमर की लोकतंत्र और विधानसभा को लेकर विधायकों से की गई अपील उनके मन की पीड़ा और जन-जन के प्रति संवेदनशीलता को भी उजागर करती है। और उनकी यह अपेक्षा कि विधानसभा में मां के भाव की अनुभूति कर अगर विधायक प्रदेश की आठ करोड़ आबादी के प्रति अपने कर्तव्यों का निर्वहन करते हैं तो निश्चित तौर पर न किसान परेशान होगा, न युवा परेशान होंगे, न गरीब परेशान होंगे
और न नारी परेशान होगी। और अगर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इस ‘ज्ञान’ यानि गरीब, युवा, अन्नदाता और नारी फार्मूला के चारों वर्ग खुशहाल हो जाते हैं तो न तो मध्य प्रदेश में कोई समस्या बचेगी और न ही देश में किसी तरह की समस्या बच सकेगी। जिस तरह विधानसभा मां की भूमिका में है, उसी तरह लोकतंत्र में लोकसभा और राज्यसभा भी मां की भूमिका में ही हैं। और मां के इस भाव को जनप्रतिनिधि सांसद, विधायक महसूस कर सकें तो देश के नागरिकों की हर समस्या जड़-मूल से खत्म हो जाएगी। उम्मीद ही कर सकते हैं कि विधायकों के मन में विधानसभा का मां रूपी भाव उतर जाए और पूरे प्रदेश में खुशहाली का राज हो जाए…’विधायक’ यदि विधानसभा के ‘मां’ रूपी भाव को जी लें , तो लोकतंत्र भी धन्य हो जाए…।

कौशल किशोर चतुर्वेदी

कौशल किशोर चतुर्वेदी मध्यप्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार हैं। प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में पिछले ढ़ाई दशक से सक्रिय हैं। पांच पुस्तकों व्यंग्य संग्रह “मोटे पतरे सबई तो बिकाऊ हैं”, पुस्तक “द बिगेस्ट अचीवर शिवराज”, ” सबका कमल” और काव्य संग्रह “जीवन राग” के लेखक हैं। वहीं काव्य संग्रह “अष्टछाप के अर्वाचीन कवि” में एक कवि के रूप में शामिल हैं। इन्होंने स्तंभकार के बतौर अपनी विशेष पहचान बनाई है।वर्तमान में भोपाल और इंदौर से प्रकाशित दैनिक समाचार पत्र “एलएन स्टार” में कार्यकारी संपादक हैं। इससे पहले इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में एसीएन भारत न्यूज चैनल में स्टेट हेड, स्वराज एक्सप्रेस नेशनल न्यूज चैनल में मध्यप्रदेश‌ संवाददाता, ईटीवी मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ में संवाददाता रह चुके हैं। प्रिंट मीडिया में दैनिक समाचार पत्र राजस्थान पत्रिका में राजनैतिक एवं प्रशासनिक संवाददाता, भास्कर में प्रशासनिक संवाददाता, दैनिक जागरण में संवाददाता, लोकमत समाचार में इंदौर ब्यूरो चीफ दायित्वों का निर्वहन कर चुके हैं। नई दुनिया, नवभारत, चौथा संसार सहित अन्य अखबारों के लिए स्वतंत्र पत्रकार के तौर पर कार्य कर चुके हैं

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