आज भगवामय पश्चिम बंगाल संग रवींद्रनाथ टैगोर की बात करते हैं… कौशल किशोर चतुर्वेदी

आज भगवामय पश्चिम बंगाल संग रवींद्रनाथ टैगोर की बात करते हैं…
पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता फिलहाल सबसे ज्यादा चर्चा में है। 15 साल मुख्यमंत्री रहीं ममता बनर्जी
जनाधार खोने के बाद भी सीएम पद से त्यागपत्र देने को तैयार नहीं हैं। उधर, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पश्चिम बंगाल फतह करने की बधाई प्रधानमंत्री मोदी को दी है। केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह पश्चिम बंगाल पहुंचकर 9 मई 2026 को आजादी के बाद पहली बार सत्ता में आई भाजपा के मुख्यमंत्री के नाम का ऐलान करने वाले हैं जो 9 मई को सुबह 10 बजे शपथ ग्रहण कर पश्चिम बंगाल में नया इतिहास बनाएंगे। पश्चिम बंगाल की झोलमुड़ी इन दिनों पूरे देश में सबसे ज्यादा स्वाद बांट रही है। यह सब बातें पश्चिम बंगाल की हैं और कोलकाता सबके केंद्र में है। तो आज हम पश्चिम बंगाल के साथ ही कोलकाता में आज के दिन ही जन्मे नोबेल पुरस्कार विजेता रवींद्रनाथ टैगोर की बात करते हैं। पश्चिम बंगाल की चर्चा हो तो किसी की भी जुबां पर सबसे पहले रवींद्रनाथ टैगोर का ही नाम आता है। और यह संयोग ही है कि उनका जन्मदिन ऐसे समय ही आया है, जब कांग्रेस कम्युनिस्ट और तृणमूल कांग्रेस की सरकारों के बाद पहली बार पश्चिम बंगाल में भगवा सरकार बन रही है।
रवीन्द्रनाथ ठाकुर (7 मई 1861-7 अगस्त 1941) विश्वविख्यात कवि, साहित्यकार, दार्शनिक और भारतीय साहित्य के नोबेल पुरस्कार विजेता हैं। उन्हें बांग्ला साहित्य के माध्यम से भारतीय सांस्कृतिक चेतना में नयी जान फूँकने वाले युगदृष्टा माना जाता है। वे एशिया के प्रथम नोबेल पुरस्कार सम्मानित व्यक्ति हैं। वे एकमात्र कवि हैं जिसकी दो रचनाएँ दो देशों का राष्ट्रगान बनीं। भारत का राष्ट्र-गान ‘जन गण मन’ और बाँग्लादेश का राष्ट्रीय गान ‘आमार सोनार बांङ्ला’ गुरुदेव की ही रचनाएँ हैं।
रवीन्द्रनाथ ठाकुर का जन्म 7 मई 1861 को कोलकाता के जोड़ासाँको ठाकुरबाड़ी में हुआ था। उनके पिता देवेन्द्रनाथ ठाकुर और माता शारदा देवी थीं। उनकी आरम्भिक शिक्षा प्रतिष्ठित सेंट जेवियर स्कूल में हुई। उन्होंने बैरिस्टर बनने की इच्छा में 1878 में इंग्लैंड के ब्रिजटोन में पब्लिक स्कूल में नाम लिखाया फिर लन्दन विश्वविद्यालय में कानून का अध्ययन किया किन्तु 1880 में बिना डिग्री प्राप्त किए ही स्वदेश पुनः लौट आए। सन् 1883 में मृणालिनी देवी के साथ उनका विवाह हुआ। ठाकुर परिवार बंगाल पुनर्जागरण के समय अग्रणी था। ठाकुर ने ड्राइंग, शरीर विज्ञान, भूगोल और इतिहास, साहित्य, गणित, संस्कृत और अंग्रेजी को अपने सबसे पसंदीदा विषय का अध्ययन किया था। हालाँकि ठाकुर ने औपचारिक शिक्षा से नाराजगी व्यक्त की। कई वर्षो बाद उन्होंने कहा कि शिक्षण चीजों की व्याख्या नहीं करता है। उनके अनुसार उचित शिक्षण, जिज्ञासा है।
ठाकुर ने लगभग 2,230 गीतों की रचना की। रवींद्र संगीत बाँग्ला संस्कृति का अभिन्न अंग है। ठाकुर के संगीत को उनके साहित्य से अलग नहीं किया जा सकता। उनकी अधिकतर रचनाएँ तो अब उनके गीतों में शामिल हो चुकी हैं।हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत की ध्रुवपद शैली से प्रभावित ये गीत मानवीय भावनाओं के अलग-अलग रंग प्रस्तुत करते हैं। अलग-अलग रागों में गुरुदेव के गीत यह आभास कराते हैं मानो उनकी रचना उस राग विशेष के लिए ही की गई थी। प्रकृति के प्रति गहरा लगाव रखने वाला यह प्रकृति प्रेमी ऐसा एकमात्र व्यक्ति है जिसने दो देशों के लिए राष्ट्रगान लिखा।
गुरुदेव ने जीवन के अंतिम दिनों में चित्र बनाना शुरू किया। इसमें युग का संशय, मोह, क्लान्ति और निराशा के स्वर प्रकट हुए हैं। मनुष्य और ईश्वर के बीच जो चिरस्थायी सम्पर्क है, उनकी रचनाओं में वह अलग-अलग रूपों में उभरकर सामने आया। ठाकुर और महात्मा गाँधी के बीच राष्ट्रीयता और मानवता को लेकर हमेशा वैचारिक मतभेद रहा। जहां गान्धी पहले पायदान पर राष्ट्रवाद को रखते थे, वहीं ठाकुर मानवता को राष्ट्रवाद से अधिक महत्व देते थे। लेकिन दोनों एक दूसरे का बहुत अधिक सम्मान करते थे। ठाकुर ने गान्धीजी को डाकू का विशेषण दिया था। एक समय था जब शान्तिनिकेतन आर्थिक कमी से जूझ रहा था और गुरुदेव देश भर में नाटकों का मंचन करके धन संग्रह कर रहे थे। उस समय गान्धी जी ने ठाकुर को 60 हजार रुपये के अनुदान का चेक दिया था। जीवन के अन्तिम समय 7 अगस्त 1941 से कुछ समय पहले इलाज के लिए जब उन्हें शान्तिनिकेतन से कोलकाता ले जाया जा रहा था तो उनकी नातिन ने कहा कि आपको मालूम है हमारे यहाँ नया पावर हाउस बन रहा है। इसके जवाब में उन्होंने कहा कि हाँ पुराना आलोक चला जाएगा और नए का आगमन होगा।
उनकी रचनाओं में मनुष्य और ईश्वर के बीच के चिरस्थायी सम्पर्क की विविध रूपों में अभिव्यक्ति मिलती है। उन्होंने बंगाली साहित्य में नए तरह के पद्य और गद्य के साथ बोलचाल की भाषा का भी प्रयोग किया। इससे बंगाली साहित्य क्लासिकल संस्कृत के प्रभाव से मुक्त हो गया। ठाकुर की रचनायें बांग्ला साहित्य में एक नई ऊर्जा ले कर आई। उन्होंने एक दर्जन से अधिक उपन्यास लिखे। इनमे चोखेर बाली, घरे बहिरे, गोरा आदि शामिल है। उनके उपन्यासों में मध्यम वर्गीय समाज विशेष रूप से उभर कर सामने आया। 1913 ईस्वी में गीतांजलि के लिए इन्हें साहित्य का नोबल पुरस्कार मिला जो कि एशिया मे प्रथम विजेता साहित्य मे है। मात्र आठ वर्ष की उम्र मे पहली कविता और केवल 16 वर्ष की उम्र मे पहली लघुकथा प्रकाशित कर बांग्ला साहित्य मे एक नए युग की शुरुआत की रूपरेखा तैयार की। उनकी कविताओं में नदी और बादल की अठखेलियों से लेकर अध्यात्मवाद तक के विभिन्न विषयों को बखूबी उकेरा गया है। उनकी कविता पढ़ने से उपनिषद की भावनाएं परिलक्षित होती है। 1915 ई. में उन्हें राजा जॉर्ज पंचम ने नाइटहुड की पदवी से सम्मानित किया था। 1919 ई. में जलियाँवाला बाग हत्याकांड के विरोध में उन्होंने यह उपाधि लौटा दी थी।
तो अब पश्चिम बंगाल में फिर एक नए युग की शुरुआत हो रही है। निश्चित तौर पर आज ममता भी उनकी हार के लिए चुनाव आयोग को जिम्मेदार ठहरा रही हैं। लेकिन नियति ने तय कर दिया है कि पश्चिम बंगाल में अब भगवा सरकार राज करेगी। ऐसे परिवर्तन के बीच जन्मदिन के दिन रवींद्रनाथ टैगोर को इस समय याद करना भी एक सुखद क्षण है।

कौशल किशोर चतुर्वेदी

कौशल किशोर चतुर्वेदी मध्यप्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार हैं। प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में पिछले ढ़ाई दशक से सक्रिय हैं। पांच पुस्तकों व्यंग्य संग्रह “मोटे पतरे सबई तो बिकाऊ हैं”, पुस्तक “द बिगेस्ट अचीवर शिवराज”, ” सबका कमल” और काव्य संग्रह “जीवन राग” के लेखक हैं। वहीं काव्य संग्रह “अष्टछाप के अर्वाचीन कवि” में एक कवि के रूप में शामिल हैं। इन्होंने स्तंभकार के बतौर अपनी विशेष पहचान बनाई है।वर्तमान में भोपाल और इंदौर से प्रकाशित दैनिक समाचार पत्र “एलएन स्टार” में कार्यकारी संपादक हैं। इससे पहले इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में एसीएन भारत न्यूज चैनल में स्टेट हेड, स्वराज एक्सप्रेस नेशनल न्यूज चैनल में मध्यप्रदेश‌ संवाददाता, ईटीवी मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ में संवाददाता रह चुके हैं। प्रिंट मीडिया में दैनिक समाचार पत्र राजस्थान पत्रिका में राजनैतिक एवं प्रशासनिक संवाददाता, भास्कर में प्रशासनिक संवाददाता, दैनिक जागरण में संवाददाता, लोकमत समाचार में इंदौर ब्यूरो चीफ दायित्वों का निर्वहन कर चुके हैं। नई दुनिया, नवभारत, चौथा संसार सहित अन्य अखबारों के लिए स्वतंत्र पत्रकार के तौर पर कार्य कर चुके हैं

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