इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: ‘हर रोमांटिक रिश्ते का अंत शादी नहीं’, पहले रेप का आरोप फिर उसी युवक से शादी, 5 साल पुराने सहमति वाले संबंध में केस रद्द


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लखनऊ:‘हर प्रेम संबंध का नतीजा शादी ही हो ये जरूरी नहीं…’ ये टिप्पणी इलाहाबाद हाई कोर्ट ने गुरुवार को शादी के झूठे वादे पर दर्ज रेप केस की कार्यवाही को रद्द करते हुए की. अदालत ने कहा कि आपसी तालमेल न बैठने या फिर प्रायोरिटी बदलने जैसी कई ऐसी वजहें हैं, जिनके चलते कुछ रिश्तों का अंत हो सकता है.  हालांकि अदालत ने ये भी कहा कि पढ़े-लिखे बालिग शख्स को रश्ता शुरू करते समय इस बात को समझने की जरूरत है कि अगर रिश्ता कामयाब नहीं होता है तो उसे अपराध साबित करने के लिए कानून का सहारा नहीं लिया जा सकता.

रेप केस में इलाहाबाद हाई कोर्ट का बड़ा फैसला

अदालत ने फटकार लगाते हुए कहा कि रिश्ता खत्म होना कोई अपराधिक मामला नहीं है. इस तरह के मामलों को संवेदनशीलता को ध्यान में रखकर दोनों लोगों की पसंद, उनकी आजादी का पूरा सम्मान करते हुए देखा जाने की जरूरत है. यह मामला प्रयागराज के थाना कर्नलगंज से जुड़ा है जहां आवेदक के खिलाफ 2019 में आईपीसी की धारा 376, 323, 504 and 506 में एफआईआर दर्ज हुई थी.

सहमति से चले संबंध शादी नहीं करने पर रेप नहीं

हाईकोर्ट ने फैसला सुनाते हुए कहा कि दो वयस्कों के बीच लंबे समय तक सहमति से चले संबंध को केवल शादी का वादा पूरा न होने के आधार पर रेप नहीं माना जा सकता. कोर्ट ने सुनवाई के दौरान पेश की गई दलीलें, परिस्थितियों और रिकॉर्ड पर मौजूद जानकारी को देखने के बाद पाया कि दोनों पक्षों के बीच संबंध आपसी सहमति से बने थे इसलिए आरोपी के खिलाफ प्रथम दृष्टया कोई अपराध नहीं बनता है. कोर्ट ने अपने 34 पन्नों के फैसले में स्पष्ट किया कि अगर पीड़िता ने आरोपी के साथ यौन संबंध बनाने के लिए पूरी तरह से सहमति दी थी तो आरोपी रेप के अपराध का दोषी नहीं है.

रेप का कोई अपराध नहीं बनता

कोर्ट ने माना कि इस मामले में आवेदक के खिलाफ रेप का कोई अपराध नहीं बनता है और यह FIR पीड़िता ने इसलिए दर्ज कराई थी क्योंकि वह आवेदक के व्यवहार से नाराज थी. FIR दर्ज होने के बाद पीड़िता ने आवेदक से शादी कर ली जिससे यह भी पता चलता है कि FIR आवेदक पर दबाव बनाने के लिए दर्ज कराई गई थी ताकि आवेदक और पीड़िता की शादी हो सके. कोर्ट ने माना कि यह मामला ‘दुर्लभ से दुर्लभतम’ (Rarest of rare) मामलों की श्रेणी में आता है, जहां आपराधिक कार्यवाही को आगे बढ़ाना न सिर्फ निरर्थक होगा बल्कि यह न्यायिक प्रक्रिया का घोर दुरुपयोग भी होगा. कोर्ट ने इस मामले में आरोपी के खिलाफ दर्ज रेप समेत अन्य धाराओं के तहत ट्रायल कोर्ट में चल रहे मुकदमे की संपूर्ण कार्यवाही को रद्द कर दिया. यह आदेश जस्टिस विवेक कुमार सिंह की सिंगल बेंच ने आवेदक संजय सरोज उर्फ संजय कुमार की याचिका को स्वीकार करते हुए दिया है.

मारपीट और धमकी देने का आरोप

शिकायतकर्ता महिला जो मूल रूप से प्रतापगढ़ की रहने वाली थी वर्ष 2014 में प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए प्रयागराज आई थी. आरोपी आवेदक उसका दूर का रिश्तेदार था जिसने उसकी पढ़ाई और रहने में मदद की. इसी दौरान दोनों के बीच संपर्क बढ़ा और संबंध स्थापित हो गए.एफआईआर में महिला द्वारा आरोप लगाया गया कि आरोपी ने शादी का झूठा वादा कर शारीरिक संबंध बनाए और बाद में शादी से मुकर गया. शिकायतकर्ता महिला का कहना था कि जब भी वह शादी की बात करती थी आरोपी उसके साथ मारपीट करता था और धमकी देता था. जांच के दौरान पीड़िता ने अपने बयान में यह भी कहा कि आरोपी उसके साथ रहता था और उसने कथित रूप से एक आपत्तिजनक वीडियो बनाकर ब्लैकमेल भी किया.

पीड़िता ने भी यह स्वीकार किया कि आवेदक के रिश्तेदारों की मौजूदगी में एक दिखावटी शादी की गई थी. हालांकि मेडिकल जांच में किसी तरह की चोट के प्रमाण नहीं मिले. पुलिस ने जांच के बाद 2020 में चार्जशीट दाखिल की और 2021 में मजिस्ट्रेट ने संज्ञान ले लिया. इसके खिलाफ आरोपी ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में याचिका दाखिल कर पूरी कार्यवाही रद्द करने की मांग की.

संबंध सहमति पर आधारित था

कोर्ट ने पूरे मामले और दोनों पक्षों की तरफ से पेश की गई दलीलें और बयानों का विश्लेषण करते हुए पाया कि दोनों के बीच संबंध कई वर्षों तक चला और यह एक सहमति पर आधारित रिश्ता था. कोर्ट ने कहा कि ऐसा नहीं लगता कि शुरुआत से ही आरोपी का इरादा धोखा देने का था. हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों जैसे प्रमोद सूर्यभान पवार, रविश सिंह राणा और दीपक गुलाटी का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि रेप का मामला तभी बनता है जब यह साबित हो कि शादी का वादा शुरू से ही झूठा था और उसी के आधार पर सहमति ली गई थी.

रेप का मामला बना देना कानून का दुरुपयोग होगा

हाईकोर्ट ने कहा कि यहां संबंध 2014 से 2019 तक चला यानी करीब पांच साल तक दोनों संपर्क में रहे. ऐसे में यह मानना मुश्किल है कि हर बार सहमति केवल शादी के वादे के कारण ही दी गई थी. कोर्ट ने यह भी कहा कि लंबे समय तक चले रिश्ते के बाद यदि विवाद उत्पन्न होता है तो उसे रेप का मामला बना देना कानून का दुरुपयोग होगा. कोर्ट ने माना कि यह मामला सहमति से बने रिश्ते के बाद बिगड़ने का है न कि झूठे वादे के जरिए धोखे से बनाए गए संबंध का. इसलिए आरोपी के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही जारी रखना न्यायोचित नहीं है.

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