
ओबीसी आरक्षण की कसौटी पर भाजपा और कांग्रेस… सुप्रीम कोर्ट का सहारा…
ओबीसी आरक्षण ने मध्यप्रदेश के दो प्रमुख राजनैतिक दलों भाजपा और कांग्रेस को कटघरे में खड़ा कर दिया है। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने ओबीसी आरक्षण पर बड़ा फैसला सुनाते हुए साफ़ कर दिया है कि ओबीसी 14 फीसदी से अधिक आरक्षण के हकदार नहीं हैं। संवैधानिक व्यवस्था में आरक्षण की 50 फीसदी सीमा को लांघकर ओबीसी को 27 फीसदी आरक्षण देने की सरकार की मंशा तर्कसंगत नहीं है। हाईकोर्ट की कसौटी पर ओबीसी आरक्षण बढ़ाने की मांग खरी नहीं उतर रही है। इसके साथ ही ओबीसी आरक्षण का मुद्दा एक बार फिर कांग्रेस और भाजपा के वाकयुद्ध की बड़ी वजह बन गया है। सवाल यहां यह कतई नहीं है कि ओबीसी को आरक्षण की जरूरत है अथवा नहीं है। सवाल केवल इतना है कि आरक्षण के मामले में, वास्तव में ओबीसी हितैषी राजनैतिक दल कौन सा है? और इसी लड़ाई में भाजपा और कांग्रेस मैदान में कूद पड़ीं हैं? अब हाईकोर्ट के बाद सुप्रीम कोर्ट में ओबीसी आरक्षण का महासंग्राम शुरू होने वाला है। मध्य प्रदेश में विधानसभा चुनाव 2028 से पहले ओबीसी आरक्षण ही सबसे बड़ा मुद्दा साबित होने वाला है।
मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने ओबीसी आरक्षण को 14 प्रतिशत पर बरकरार रखने का बड़ा फैसला सुनाया है। हाईकोर्ट ने 27 प्रतिशत आरक्षण संबंधी 2019 के अध्यादेश को असंवैधानिक करार दिया है। साथ ही 13 प्रतिशत रोके गए पदों पर अनारक्षित वर्ग के अभ्यर्थियों को तीन महीने के भीतर नियुक्ति देने के निर्देश दिए हैं। हाईकोर्ट ने दया दिखाते हुए पहले से हुई नियुक्तियों को वैध माना है। इसके साथ ही मध्य प्रदेश में अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) को 14 से बढ़ाकर 27 प्रतिशत आरक्षण देने पर करीब सात वर्ष पहले शुरू हुई कानूनी लड़ाई पर फिलहाल विराम लग गया है। कोर्ट ने ओबीसी आरक्षण 27 प्रतिशत करने संबंधी वर्ष 2019 के अध्यादेश और संशोधन कानून को असंवैधानिक ठहराते हुए निरस्त कर दिया। गौरतलब है कि कांग्रेस की कमल नाथ सरकार ने यह कानून बनाया था।
हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि प्रदेश में लोक सेवाओं और उच्च शिक्षा में ओबीसी आरक्षण 14 प्रतिशत ही रहेगा। न्यायमूर्ति आनंद पाठक और न्यायमूर्ति विनय सराफ की विशेष युगलपीठ ने इस मामले के लंबित रहने के कारण भर्ती प्रक्रियाओं में रोके गए 13 प्रतिशत पदों पर अनारक्षित वर्ग के अभ्यर्थियों को तीन महीने के भीतर नियुक्ति देने के निर्देश दिए हैं। इनकी प्रतीक्षा सूची पहले से तैयार है। हाई कोर्ट ने विस्तृत आदेश में सुप्रीम कोर्ट के इंद्रा साहनी और जयश्री लक्ष्मणराव पाटिल प्रकरणों में प्रतिपादित सिद्धांतों का उल्लेख करते हुए कहा कि आरक्षण की कुल 50 प्रतिशत सीमा का पालन किया जाना चाहिए। इस मामले में इसे पार करने वाली कोई असाधारण परिस्थिति स्थापित नहीं हुई। यह विवाद ओबीसी को आरक्षण देने का नहीं, बल्कि आरक्षण की सीमा बढ़ाकर 27 प्रतिशत करने का है। कोर्ट ने माना कि ओबीसी वर्ग 14 प्रतिशत आरक्षण पाने का हकदार है, लेकिन इसे बढ़ाकर 27 प्रतिशत करने के लिए पर्याप्त संवैधानिक आधार प्रस्तुत नहीं किया जा सका। लोक सेवाओं में ओबीसी वर्ग के प्रतिनिधित्व को संविधान के अनुच्छेद 16(4) के संदर्भ में हाईकोर्ट ने पर्याप्त माना। कमलनाथ सरकार के इस निर्णय के विरुद्ध अक्षिता दुबे ने जनहित याचिका लगाई थी। बाद में अन्य याचिकाएं भी इसमें शामिल होती गईं। मामला सुप्रीम कोर्ट तक चला गया। सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट से ही सुनवाई करने को कहा था।
तो मध्य प्रदेश में ओबीसी आरक्षण पर लटकी संशय की बदली छंट गई है। लेकिन भाजपा और कांग्रेस की नैया उलझ गई है। ओबीसी आरक्षण पर हाई कोर्ट भले ही संविधान का हवाला देकर पल्ला झाड़ ले, लेकिन राजनैतिक दलों की सबसे बड़ी विडम्बना यह है कि वह ओबीसी मतदाताओं के सामने किस हैसियत से जाकर अपना मुंह दिखाएं। और मुँह दिखा भी दें। तो किस हैसियत से वोट मांगें। और ओबीसी के वोट बिना किसी भी राजनैतिक दल की सत्ता पाने की महत्वाकांक्षा पूरी नहीं हो सकती। और इसीलिए बयानबाजी शुरू हो गई है।
भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष एवं विधायक हेमंत खण्डेलवाल ने अन्य पिछड़ा वर्ग आरक्षण पर मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय के निर्णय को लेकर कहा कि कांग्रेस ने लोकसभा चुनाव से पहले राजनीतिक लाभ लेने की जल्दबाजी में ओबीसी आरक्षण बढ़ाने का अध्यादेश जारी किया, लेकिन उसे मजबूत संवैधानिक एवं कानूनी आधार देने में गंभीर चूक की। अब कांग्रेस अपनी सरकार की गलतियों की जिम्मेदारी लेने के बजाय भाजपा सरकार पर आरोप लगाकर जनता को गुमराह करने का प्रयास कर रही है।उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व में भाजपा सरकार ओबीसी वर्ग के सामाजिक, शैक्षणिक और आर्थिक सशक्तिकरण के लिए प्रतिबद्ध है। सरकार उच्च न्यायालय के निर्णय के सभी कानूनी पहलुओं का अध्ययन कर आगे की रणनीति तय करेगी। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी ने कहा है कि भारतीय जनता पार्टी के कुकर्म, छल, झूठ और विश्वासघात का पर्दाफाश हो चुका है। उन्होंने 200 करोड़ खर्च किए और 200 करोड़ के वकील खड़े कर दिए। पिछले 8 वर्षों से वे कांग्रेस द्वारा लागू किए गए ओबीसी आरक्षण को रोकने के रास्ते तलाश रहे हैं। मैं अपने ओबीसी भाइयों से अपील करना चाहता हूँ कि डरने या निराश होने की जरूरत नहीं है। कांग्रेस पार्टी आपके अधिकारों की लड़ाई सुप्रीम कोर्ट तक लड़ेगी। 2028 में जब आप कांग्रेस को सत्ता में लाएंगे, तो हम ओबीसी आरक्षण को उसकी मूल मंशा के अनुरूप पूरी तरह बहाल करेंगे।
तो अब ओबीसी आरक्षण सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाने को तैयार है। भाजपा और कांग्रेस दोनों ही राजनैतिक दल इस लड़ाई में बाजी मारने को उतावले हैं। यह बात साफ है कि इस महत्वपूर्ण संग्राम में मध्यप्रदेश के दो महत्वपूर्ण राजनैतिक दलों में यदि जीतेंगे तो जीत का बंटवारा होगा और यदि हारेंगे तो हार का ठीकरा एक दूसरे पर फोड़ा जाएगा। संविधान के प्रावधान को जीत हार से परे मानकर फिलहाल यही कहा जा सकता है कि ओबीसी आरक्षण की कसौटी पर भाजपा और कांग्रेस हैं… और दोनों को ही सुप्रीम कोर्ट का एकमात्र सहारा है…। अच्छा तो यही है कि ओबीसी खुद आगे आकर राजनैतिक दलों से अपना पल्ला छुड़ा लें, हालांकि यह संभव प्रतीत नहीं होता।

कौशल किशोर चतुर्वेदी
कौशल किशोर चतुर्वेदी मध्यप्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार हैं। प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में पिछले ढ़ाई दशक से सक्रिय हैं। पांच पुस्तकों व्यंग्य संग्रह “मोटे पतरे सबई तो बिकाऊ हैं”, पुस्तक “द बिगेस्ट अचीवर शिवराज”, ” सबका कमल” और काव्य संग्रह “जीवन राग” के लेखक हैं। वहीं काव्य संग्रह “अष्टछाप के अर्वाचीन कवि” में एक कवि के रूप में शामिल हैं। इन्होंने स्तंभकार के बतौर अपनी विशेष पहचान बनाई है।वर्तमान में भोपाल और इंदौर से प्रकाशित दैनिक समाचार पत्र “एलएन स्टार” में कार्यकारी संपादक हैं। इससे पहले इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में एसीएन भारत न्यूज चैनल में स्टेट हेड, स्वराज एक्सप्रेस नेशनल न्यूज चैनल में मध्यप्रदेश संवाददाता, ईटीवी मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ में संवाददाता रह चुके हैं। प्रिंट मीडिया में दैनिक समाचार पत्र राजस्थान पत्रिका में राजनैतिक एवं प्रशासनिक संवाददाता, भास्कर में प्रशासनिक संवाददाता, दैनिक जागरण में संवाददाता, लोकमत समाचार में इंदौर ब्यूरो चीफ दायित्वों का निर्वहन कर चुके हैं। नई दुनिया, नवभारत, चौथा संसार सहित अन्य अखबारों के लिए स्वतंत्र पत्रकार के तौर पर कार्य कर चुके हैं।