दयारा बुग्याल मिस्ट्री: 27 दिन बाद भी लापता बबीता पांडे का नहीं मिला सुराग, क्या वाकई ‘परियां’ ले गईं? उत्तराखंड के ‘परियों के देश’ की लोककथाओं के बीच रहस्य और गहराया

देहरादून:उत्तरकाशी के दयारा बुग्याल ट्रेक से बबीता पांडे को गायब हुए 27 दिन बीच चुके हैं लेकिन अब तक उसका कुछ अता-पता नहीं. पुलिस-प्रशासन के हाथ कोई सुराग नहीं लग पा रहा है. बबीता की तलाश लगातार जारी है. 29 मई को उत्तराखंड के रामनगर की रहने वाली 24 साल की एमबीए छात्रा बबीता पांडे दयारा बुग्याल ट्रेक से रहस्यमय परिस्थितियों में लापता हो गई थी.

27 दिन बाद भी बबीता पांडे को कोई सुराग नहीं मिला.

पुलिस, प्रशासन, एसडीआरएफ, एनडीआरएफ, आईटीबीपी, वन विभाग, स्थानीय पुलिस, डॉग स्क्वाड, गोताखोरों, नेहरू पर्वतारोहण संस्थान और स्थानीय ग्रामीणों ने व्यापक स्तर पर खोज अभियान चलाया, लेकिन अब तक कोई सफलता हाथ नहीं लगी है. जांच का फोकस मोबाइल सर्विलांस, सीडीआर और सीसीटीवी फुटेज पर केंद्रित है. लेकिन उत्तराखंड की एक कहानी लोग दबी आवाज में बता रहे हैं, जिसे पुरानी पहाड़ों की किवदंतियों से जोड़ा जा रहा है कि क्या बबिता को परियां ले गई?

दयारा बुग्याल ट्रैक से कहां गायब हो गई बबीता पांडे?

उत्तराखंड की लोक संस्कृति ,लोक कथाओं में परियों की कहानी हमेशा मुख्य हिस्सा रही है. उत्तराखंड के स्थानीय भाषा में परियों को आंचरी या फिर वन देवी कहा जाता है. यहां तक कि उत्तराखंड के टिहरी जिले में स्थित खैट पर्वत को परियों का देश कहा जाता है. बाकायदा इसका वहां पर एक बोर्ड भी लगाया गया है. इस पर लिखा गया है -प्रसिद्ध खैट पर्वत परियों का देश.

बबीता को लेकर इलाके के लोग कई बातें कर रहे हैं.  कुछ स्थानीय लोग पहाड़ों की पुरानी लोक कथाओं और दैवीय शक्तियों से इस घटना को जोड़कर देख रहे हैं. इस क्षेत्र में लंबे समय से ट्रैकिंग करने वाले आशुतोष का कहना है कि पूरा क्षेत्र जंगल का है. चारों तरफ ऊंची पहाड़ियां और जंगल हैं. आशुतोष ने कहा कि पिछले लंबे समय से तलाश के बाद भी उसका कोई पता नहीं चला. हमारी पौराणिक मान्यता और लोग कथाओं में यह बातें सामने आती रही है कि इन क्षेत्रों में परियों का वास करता है जिन्हें आंचरी कहते हैं. हालांकि नई पीढ़ी इन बातों को नहीं मानती. लेकिन आज भी हमारे पहाड़ों में इन ऊंचाई वाले क्षेत्रों में इस तरह की कहानी किस्से जिंदा है.

सुनसान जगह पर होता है किसी के होने का ऐहसास

आशुतोष ने कहा कि हमारे बुजुर्ग अभी भी कहते हैं कि इन ऊंचाई वाले क्षेत्रों में चमकीले और भड़कीले कपड़े पहनकर मत जाया करो. साथ ही यहां चिल्लाना और शोर भी नहीं मचाना चाहिए. आशुतोष ने कहा कि वह लंबे समय से इस एरिया में ट्रैकिंग कर रहे हैं. इन जगहों पर जब आप अकेले जाते हैं तो ऐसा लगता है कि वहां कोई है.

लोक मान्यता यह है कि पुराने समय में चौडा गांव में आशा रावत की नौ बेटियां थी जो काफी सुंदर थी. माना जाता है कि जब वे महज 12 साल की थीं तब उन्होंने सुबह चारों तरफ अंधेरा देखा. लेकिन खैट पर्वत की तरफ रोशनी दिख रही थी. ससभी 9 बहनें इस रोशनी को देखने के लिए जैसे ही उसे जगह पर पहुंची तो वह कभी लौट के नहीं आईं. किदवंती के मुताबिक, ये सभी बहनें परियां बन गई. आज भी माना जाता है कि खैट पर्वत के अलग-अलग 9 पहाड़ों पर रहकर ये परियां क्षेत्र की रक्षा करती है.

बांसुरी बजाने वाले को परियां ले जाने वाली कहानी

दूसरी लोक कथाओं और किस्से-कहानियों में जीतू बगड़वाल का जिक्र आता है. मान्यता है कि जीतू पहाड़ी बहुत ही स्मार्ट लड़का था, जो काफी मधुर बांसुरी बजाता था. जब भी वह अपने मवेशियों को चराने ले जाता या खेतों में काम करने ले जाता तब वह खाली समय में बांसुरी बजाता था. पहाड़ों में ये कहा जाता है कि एक बार खैट पर्वत के पास से गुजरते हुए उसने रुक कर बांसुरी बजाई. उसकी बांसुरी की धुन से परियां आकर्षित हो गई और उसे अपने साथ ले गई. कहा जाता है कि उस समय जीतू अपनी बहन के ससुराल रैथल गांव उसे लेने जा रहा था.

उत्तराखंड की लोक कथाओं और लोक संस्कृत में कहा जाता है की ऊंचाई वाले उच्च हिमालय क्षेत्र में मान्यता है कि इन जगहों पर परियों का वास है. यहां  तेज आवाज में चिल्लाना, गाना बजाना या हुड़दंग करना बिल्कुल मना है. इन जगहों पर चमकदार चटकीले कपड़े पहनाने की भी मनाही है.

100 से ज्यादा लोग कर रहे बबीता की तलाश

बबीता पांडे के लापता होने के बाद लगातार आधुनिक तकनीक से उसे तलाशा जा रहा है.  मोबाइल सर्विलांस, ड्रोन के साथ ही 100 से ज्यादा लोगों को तलाशी पर लगाया गया है. इस क्षेत्र के स्थानीय लोग कह रहे हैं कि बबीता को परियां भी ले जा सकती हैं. सुनने में ये अंधविश्वास से ज्यादा कुछ नहीं लगता. क्यों कि 21वीं सादी जहां हाइटेक कंप्यूटर, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, सीसीटीवी ड्रोन कैमरा थर्मल कैमरे जैसी बड़ी टेक्नोलॉजी है, उस जमाने में परियों की बात अजीब लगती है. लेकिन इन परियों की चर्चा अक्सर उस क्षेत्र की लोक मान्यता, लोक कथाएं और किदवंतियों में होती रही है. बबीता को हर जगह तलाशा जा चुका है.

27 दिन बाद भी बबीता को कोई सुराग नहीं मिला

हालांकि पुलिस और प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि जांच पूरी तरह वैज्ञानिक और तकनीकी आधार पर की जा रही है.वहीं स्थानीय ट्रैकिंग व्यवसायी और सामाजिक कार्यकर्ता भी लोगों से अफवाहों से बचने और जांच एजेंसियों का सहयोग करने की अपील कर रहे हैं. 27 दिन बीत जाने के बाद भी बबीता पांडे की गुमशुदगी रहस्य बनी हुई है. परिजन उनकी सकुशल वापसी की उम्मीद लगाए बैठे हैं, जबकि पुलिस और बचाव दल लगातार हर संभावित सुराग पर काम कर रहे हैं. फिलहाल पूरे उत्तराखंड की नजरें इस रहस्यमयी मामले की जांच और उसके नतीजों पर टिकी हुई हैं.

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