विदेश से शक्कर बुला रही सरकार, MP की 6 चीनी मिलों पर ताले: सालों से बंद फैक्ट्रियां कर्ज में डूबीं, महंगी चीनी के बीच उठे सवाल

देश6 फैक्ट्रियां सालों से बंद, कर्ज में डूबीं; क्यों मुश्किल में प्रदेश के चीनी कारखाने में चीनी की कीमतें बढ़ने के बीच सरकार ने बाजार में सप्लाई बनाए रखने के लिए 10 लाख टन चीनी आयात करने का फैसला किया है। दूसरी ओर, मध्य प्रदेश की कई चीनी मिलें वर्षों से बंद हैं और उनकी मशीनरी व परिसंपत्तियां जर्जर हो रही हैं।

मुरैना की कैलारस शुगर मिल को दोबारा शुरू कराने की मांग को लेकर कांग्रेस विधायक पंकज उपाध्याय के आमरण अनशन ने इस मुद्दे को फिर चर्चा में ला दिया। सरकार के आश्वासन के बाद अनशन खत्म हो गया, लेकिन किसानों और कर्मचारियों में नाराजगी बनी हुई है।

एमपी में 26 शुगर मिल हैं, जिनमें से 6 पूरी तरह से बंद हो चुकी हैं

पहले जानिए एमपी में शुगर मिल का मुद्दा कैसे गर्माया

ये मुद्दा मुरैना की कैलारस शुगर मिल से गर्माया, जो करीब 15 साल से बंद है। इसे दोबारा शुरू कराने की मांग को लेकर कांग्रेस विधायक पंकज उपाध्याय ने आमरण अनशन शुरू किया। इसके बाद प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी भी अनशन स्थल पर पहुंचे, जबकि राहुल गांधी ने आंदोलन को समर्थन दिया।

विधायक ने मुरैना बंद की चेतावनी दी, जिसे क्षेत्र के कई किसान और कर्मचारी संगठनों का समर्थन मिला। सरकार के आश्वासन के बाद अनशन खत्म हो गया। कृषि मंत्री एदल सिंह कंसाना ने कहा कि कैलारस शक्कर मिल को दोबारा शुरू करने के लिए आगे की कार्रवाई की जा रही है।

हालांकि, विधायक और संगठन इससे संतुष्ट नहीं हैं। वजह यह है कि मिल को शुरू करने के लिए सरकार 2017 के बाद दो बार प्रयास कर चुकी है, लेकिन दोनों बार मामला कागजी प्रक्रिया से आगे नहीं बढ़ पाया।

15 साल में 6 शुगर फैक्ट्रियां बंद हो गईं…

कैलारस मिल का मामला अकेला नहीं है। मध्य प्रदेश की छह बड़ी चीनी मिलें वर्षों से बंद हैं। इससे उनसे जुड़े किसान, कर्मचारी और स्थानीय कारोबार प्रभावित हुए हैं।

1. भोपाल शुगर इंडस्ट्रीज, सीहोर (नवाबों के दौर की मिल)

  • इतिहास: इसकी स्थापना 1937 में भोपाल के अंतिम नवाब हमीदुल्लाह खान ने की थी, बाद में यह मुंबई के वाधवाना समूह के पास चली गई। इसकी क्षमता 1,250 TCD (टन गन्ना प्रतिदिन) थी।
  • बंद होने की वजह: 1994 से प्रबंंधन-मजदूर विवाद शुरू हुए। प्रबंधन पर मिल को जानबूझकर घाटे में दिखाकर “बीमार इकाई” घोषित करने के आरोप लगे। 2002-03 में मिल बंद हो गई।
  • विवाद: मिल के पास 4,365 एकड़ से अधिक कृषि भूमि है। आरोप है कि प्रबंधन ने भू-माफियाओं के साथ मिलकर जमीन बेची और कॉलोनियां विकसित कीं। हजारों मजदूरों का 107 करोड़ रुपये से अधिक वेतन और PF बकाया होने का दावा है। इसे लेकर हाईकोर्ट में कानूनी लड़ाई चल रही है।

2. डबरा शुगर मिल, ग्वालियर (सिंधिया रियासत की विरासत)

  • इतिहास: 1940 में सिंधिया रियासत के दौरान स्थापित इस मिल को तत्कालीन ग्वालियर राज्य ने जमीन दी थी। इसकी क्षमता 1,250 TCD थी।
  • बंद होने की वजह: वित्तीय संकट के चलते किसानों को गन्ने का भुगतान समय पर नहीं मिला। इसके बाद किसानों ने गन्ने की जगह दूसरी फसलें लेना शुरू कर दिया। कच्चे माल की कमी से मिल बंद हो गई। अब इसकी मशीनरी और जमीनें विवाद में हैं। डबरा चीनी मिल संघर्ष समिति के संजीव राजपूत कहते हैं कि मिल सरकार की उदासीनता के कारण बंद हुई है।

द मालवा सहकारी शक्कर कारखाना, बरलाई (इंदौर)

  • इतिहास: नवंबर 1980 में स्थापित यह प्रदेश की बड़ी सहकारी चीनी मिलों में से एक थी। इंदौर, देवास और उज्जैन के 10,000 किसानों के अंशदान से बनी मिल की क्षमता 1,250 TCD थी।
  • बंद होने की वजह: 2001 के सूखे से गन्ने का उत्पादन घटा। कुप्रबंधन और करोड़ों के कर्ज के बीच 2002-03 में सरकार के आदेश पर मिल बंद कर दी गई। मिल पर सरकार का ₹165 करोड़ कर्ज दर्ज है और किसान अपने अधिकारों को लेकर प्रदर्शन कर रहे हैं।

4. नारायणपुरा मिल, गुना (सहकारिता मॉडल की चुनौती)

  • इतिहास: वर्ष 2000 में सहकारिता मॉडल पर स्थापित इस मिल की क्षमता 2,500 क्विंटल प्रतिदिन थी। इससे 3,000 हेक्टेयर क्षेत्र के किसान जुड़े थे।
  • बंद होने की वजह: बैंक कर्ज और बढ़ते ब्याज से मिल घाटे में चली गई। किसानों का भुगतान अटकने पर उन्होंने गन्ने की खेती बंद कर दी। इसके बाद 2017-18 में मिल बंद हो गई।
  • ताजा स्थिति: जुलाई 2026 में गुना कलेक्टर किशोर कुमार कन्याल ने तकनीकी टीम के साथ मिल का निरीक्षण किया। उन्होंने इसे दोबारा शुरू करने के लिए विशेष एक्शन प्लान की बात कही।नारायणपुरा शक्कर मिल संगठन के राधेश्याम चंदेल कहते हैं कि मिल बंद होने से करीब 80 गांवों के किसान प्रभावित हुए हैं, 2-3 हजार कर्मचारियों का वेतन बकाया है। सरकार इच्छाशक्ति दिखाए तो जर्जर फैक्ट्री को अब भी दोबारा चलाया जा सकता है।

क्या MP की मिलें बंद होने से चीनी के दाम बढ़े?

एक्सपर्ट्स के मुताबिक, MP की मिलों के बंद होने को चीनी की मौजूदा कीमतों की सीधी वजह नहीं माना जा सकता। कीमतों पर मौसम, एक्सपोर्ट पॉलिसी और त्योहारों की मांग जैसे राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय कारकों का असर है। व्यापारी संघ के पदाधिकारी विवेक साहू के मुताबिक “एथेनॉल ब्लेंडिंग बढ़ने से गन्ने का एक हिस्सा चीनी उत्पादन से हट रहा है।

वहीं सरकार के अनुसार, एथेनॉल के लिए डायवर्ट होने वाली चीनी का हिस्सा 2022-23 के 12% से घटकर 2025-26 में करीब 9% रह गया है। इसलिए एथेनॉल डायवर्जन को कीमत बढ़ने की एकमात्र वजह नहीं माना जा सकता।

  1. बारिश से गन्ने को नुकसान: अत्यधिक बारिश से गन्ने की फसल प्रभावित हुई और शुगर रिकवरी रेट 12% से नीचे आ गई। यानी 100 किलो गन्ने से पहले की तुलना में कम चीनी बनी और कुल उत्पादन घटा।
  2. एथेनॉल में डायवर्जन: एथेनॉल ब्लेंडिंग पॉलिसी के तहत गन्ने और शीरे का एक हिस्सा चीनी के बजाय एथेनॉल उत्पादन में गया। इससे बाजार में चीनी की उपलब्धता प्रभावित हुई।
  3. एक्सपोर्ट से घटा घरेलू स्टॉक: सरकार ने नवंबर 2025 और फरवरी 2026 में कुल 20 लाख टन चीनी निर्यात की अनुमति दी। मई 2026 में रोक लगने तक करीब 8 लाख टन चीनी निर्यात हो चुकी थी। इससे घरेलू स्टॉक घटा।
  4. त्योहारों में बढ़ी मांग और जमाखोरी: अगस्त से नवंबर के बीच गणेश चतुर्थी, नवरात्रि और दिवाली के कारण मिठाई व बेकरी उद्योगों में चीनी की मांग बढ़ती है। एक्सपर्ट्स के अनुसार, कुछ कारोबारियों की जमाखोरी ने कीमतों पर और दबाव डाला।

सरकार का डैमेज कंट्रोल: उठाए 4 बड़े कदम

चीनी की कीमतों पर नियंत्रण और जमाखोरी रोकने के लिए सरकार ने 20 अगस्त 2026 को चार फैसले लिए।

  • स्टॉक लिमिट घटाई: महीने में 10 टन से ज्यादा चीनी इस्तेमाल करने वाले बड़े खरीदार अब अधिकतम 15 दिन का स्टॉक रख सकेंगे।
  • सप्लायर्स पर भी सीमा: बड़े सप्लायर और डीलर अधिकतम 4,000 क्विंटल चीनी का स्टॉक रख सकेंगे।
  • मिलों को अतिरिक्त बिक्री की अनुमति: चीनी मिलें सामान्य कोटे से 50 हजार टन ज्यादा चीनी बेच सकेंगी। बिक्री के 7 दिनों के भीतर इसे फैक्ट्री से बाहर भेजना होगा।
  • 10 लाख टन ड्यूटी-फ्री इम्पोर्ट: सरकार ने 31 अक्टूबर तक 10 लाख टन कच्ची चीनी बिना इम्पोर्ट ड्यूटी के आयात करने की मंजूरी दी है। एक्सपर्ट्स के मुताबिक, इससे थोक कीमतों में करीब ₹500 प्रति क्विंटल तक राहत मिल सकती है।

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