मनुस्मृति का रोना हम कब तक रोते रहेंगे… कौशल किशोर चतुर्वेदी

मनुस्मृति का रोना हम कब तक रोते रहेंगे…
भारत 21 वीं सदी में एक बार फिर विश्व गुरु बनने का दावा कर रहा है। 1947 में आजाद हुए भारत में लोकतंत्रात्मक शासन का स्रोत भारत का संविधान है। और अब भारत में समान नागरिक संहिता को लागू करने की बात चल रही है। महिला-पुरुष समानता के दृश्य पूरे देश में देखे जा सकते हैं। हाल ही में, जंतर मंतर पर कोकरोज जनता पार्टी के प्रदर्शन में महिलाओं की बराबर से भागीदारी भारत में महिलाओं की स्वतंत्रता की कहानी ही बयां कर रही थी। महिला पुरुष समानता के बहुत सारे दृश्य अभी भी आम भारतीयों की आंखों में कैद होंगे। भारत में महिला सशक्तिकरण को लेकर कदम लगातार आगे बढ़ाए जा रहे हैं। और ऐसे कई क्षेत्र हैं जहाँ महिलाएं पुरुषों से आगे खड़ी नजर आती हैं। ऐसे में अगर भारतीय राजनीति में मनुस्मृति को आधार बनाकर एक राजनीतिक भ्रम उत्पन्न करने की कोशिश अभी भी हो रही है तो क्या इसे तर्कसंगत माना जा सकता है। शायद अधिकतर जवाब ‘नहीं’ के पक्ष में ही खड़े नजर आएंगे। और यह सही भी है। क्योंकि यदि मनुस्मृति को आधार बनाकर सत्ता के सिंहासन को पाने की लालसा मन में है, तो यह पूरी तरह से गलत सोच है। भारत का लोकतंत्र, भारत का संविधान और अब समान नागरिक संहिता के दौर में मनुस्मृति का राजनीतिकरण कतई सही नहीं माना जा सकता है।
वर्तमान संदर्भ यह है कि महाराष्ट्र के पुणे में कांग्रेस सांसद और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने 22 अगस्त 2026 को ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम में मनुस्मृति का जिक्र किया। इसके बाद भारतीय जनता पार्टी ने उनकी आलोचना की है। राहुल ने मनुस्मृति में महिलाओं के बारे में लिखे गए एक उद्धरण को शर्मनाक बताया।उन्होंने कहा, “महिलाएं किसी के अधीन नहीं हो सकती हैं।” राहुल गांधी ने कहा, “एक समस्या है और काफी बड़ी समस्या है। जब भी मैं पुरुषों से बात करता हूं, महिलाओं को तीन बॉक्स में रखा जाता है। महिलाओं को बेटी, पत्नी या मां के रूप में।” राहुल ने कहा कि “मां, पत्नी और बेटी के रूप में देखे जाने में कोई बुराई नहीं है। लेकिन सिर्फ़ यही एक आपकी पहचान नहीं हो सकती। महिलाएं प्रोफेशनल, खिलाड़ी, लीडर, क्रिएटर, आंतरप्रेन्योर और भी बहुत कुछ हैं। फिर भी पुरुष उन्हें ये तीन पहचान ही देते हैं। इन तीनों पहचानों का पुरुषों के साथ रिश्ता है। चाहे मां हो, पत्नी हो, या बेटी हो।”
ऐसा कहा जाता है कि डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर ने 25 जुलाई, 1927 को महाराष्ट्र के कोलाबा जिले में (वर्तमान में रायगढ) के महाद में सार्वजनिक रूप से मनुस्मृति को जलाया था। आंबेडकर अपनी किताब ‘फ़िलॉसफ़ी ऑफ़ हिंदूइज़्म’ में लिखते हैं, “मनु ने चार वर्ण व्यवस्था की वकालत की थी।” और यही मनुस्मृति के प्रति अंबेडकर की मुख्य नाराजगी थी। बाद में इसी आधार पर राजनीतिक दल राजनीति करते रहे।
तो समान नागरिक संहिता (यूनिफॉर्म सिविल कोड यानि यूसीसी) एक ऐसा कानून है जो सभी धर्मों के लोगों के लिए विवाह, तलाक, विरासत, बच्चा गोद लेने और संपत्ति के अधिकार जैसे व्यक्तिगत मामलों में एक समान नियम तय करता है। इसका उद्देश्य देश के सभी नागरिकों के लिए एक समान कानूनी ढांचा बनाना है। अनुच्छेद 44 के तहत भारतीय संविधान के नीति निर्देशक तत्वों में राज्य से अपेक्षा की गई है कि वह पूरे देश में एक समान नागरिक संहिता लागू करने का प्रयास करे।
भारत में समान नागरिक संहिता मुख्य रूप से उत्तराखंड में कानूनी रूप से लागू है, जबकि गोवा में पुर्तगाली शासन के समय से एक पुराना कॉमन सिविल कोड लागू चला आ रहा है। इसके अलावा गुजरात, असम और मध्य प्रदेश की विधानसभाओं ने भी इससे जुड़े विधेयक पारित कर दिए हैं।
तो साफ है कि भारत का संविधान और समान नागरिक संहिता 21वीं सदी के भारत का निर्माण करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। ऐसे में मनुस्मृति का उदाहरण देकर कहीं ऐसा तो नहीं कि आने वाली पीढ़ी के मन में भी मनुस्मृति के प्रति जहर घोलने की मंशा है। यदि यह प्रयास हो रहा है तो इस पर विराम लगाया जाना चाहिए। वास्तव में समान नागरिक संहिता और संविधान के दौर में मनुस्मृति पर राजनीति मेरी नजर में कतई तर्कसंगत नहीं है… आखिरकार मनुस्मृति का रोना हम कब तक रोते रहेंगे…।

कौशल किशोर चतुर्वेदी

कौशल किशोर चतुर्वेदी मध्यप्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार हैं। प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में पिछले ढ़ाई दशक से सक्रिय हैं। पांच पुस्तकों व्यंग्य संग्रह “मोटे पतरे सबई तो बिकाऊ हैं”, पुस्तक “द बिगेस्ट अचीवर शिवराज”, ” सबका कमल” और काव्य संग्रह “जीवन राग” के लेखक हैं। वहीं काव्य संग्रह “अष्टछाप के अर्वाचीन कवि” में एक कवि के रूप में शामिल हैं। इन्होंने स्तंभकार के बतौर अपनी विशेष पहचान बनाई है।वर्तमान में भोपाल और इंदौर से प्रकाशित दैनिक समाचार पत्र “एलएन स्टार” में कार्यकारी संपादक हैं। इससे पहले इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में एसीएन भारत न्यूज चैनल में स्टेट हेड, स्वराज एक्सप्रेस नेशनल न्यूज चैनल में मध्यप्रदेश‌ संवाददाता, ईटीवी मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ में संवाददाता रह चुके हैं। प्रिंट मीडिया में दैनिक समाचार पत्र राजस्थान पत्रिका में राजनैतिक एवं प्रशासनिक संवाददाता, भास्कर में प्रशासनिक संवाददाता, दैनिक जागरण में संवाददाता, लोकमत समाचार में इंदौर ब्यूरो चीफ दायित्वों का निर्वहन कर चुके हैं। नई दुनिया, नवभारत, चौथा संसार सहित अन्य अखबारों के लिए स्वतंत्र पत्रकार के तौर पर कार्य कर चुके हैं।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *