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चलो आज पश्चिम बंगाल, ऑल इंडिया फॉरवर्ड ब्लॉक और सुभाष चंद्र बोस की बात करते हैं…
पश्चिम बंगाल में इन दिनों सबको 4 मई 2026 का बेसब्री से इंतजार है। 4 मई को ही यह फैसला होना है कि ममता दीदी को चौथी बार पश्चिम बंगाल का मुख्यमंत्री बनने का जनादेश मिलता है अथवा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह की रणनीति सफलता में तब्दील होकर पश्चिम बंगाल में कमल खिलाने में सफल होती है। आज हम पश्चिम बंगाल के बहाने भारत की आजादी में नायक की भूमिका में स्थापित, नेताजी सुभाष चंद्र बोस की बात करते हैं। नेताजी राजनीति में ऐसे नायक हैं जिन्हें भूतो न भविष्यति की श्रेणी में रखा जा सकता है। और नेताजी की बात हम आज इसलिए कर हैं क्योंकि उनके द्वारा स्थापित फॉरवर्ड ब्लॉक, जो बाद में स्वतंत्र राजनीतिक दल ऑल इंडिया फारवर्ड ब्लॉक बनकर आज भी जीवित हैं। भले ही उसने अपना जनाधार खो दिया है, लेकिन
यह दावा किया जा सकता है कि अगर सुभाष बाबू कुछ समय और जिंदा रहे होते तब ऑल इंडिया फॉरवर्ड ब्लॉक का इतिहास कुछ और ही होता।
पहले ऑल इंडिया फॉरवर्ड ब्लॉक की वर्तमान स्थिति पर नजर डालते हैं। पश्चिम बंगाल में ऑल इंडिया फॉरवर्ड ब्लॉक ( एआईएफबी) की स्थिति अब बेहद कमजोर हो चुकी है। कभी वाम मोर्चा का प्रमुख हिस्सा और बंगाल में मजबूत ताकत रही यह पार्टी, 2011 के बाद से लगातार अपना जनाधार खो रही है। वर्तमान में, यह कांग्रेस और वामपंथी दलों के साथ गठबंधन में है, लेकिन राज्य में इसकी चुनावी उपस्थिति नगण्य या नाममात्र की रह गई है। इसके ऐतिहासिक संदर्भ की चर्चा करें तो सुभाष चंद्र बोस द्वारा स्थापित, यह पार्टी लंबे समय तक वाम मोर्चा के साथ सत्ता में रही। 2014 के बाद से पार्टी ने लोकसभा चुनावों में कोई सीट नहीं जीती है। 2021 और 2026 के चुनावों में भी पार्टी का प्रदर्शन कमजोर रहा। पार्टी अब वाम मोर्चा ( सीपीआई-एम, आरएसपी, सीपीआई के साथ) का हिस्सा है और कांग्रेस के साथ तालमेल में चुनाव लड़ती है, लेकिन मुख्य मुकाबला टीएमसी और बीजेपी के बीच होने से इसका महत्व कम हो गया है। पार्टी का अभी भी कुछ जिलों में कैडर आधारित वफादार वोट बैंक है, लेकिन यह चुनावी जीत में बदलने में असमर्थ है। भारत निर्वाचन आयोग द्वारा इसे पश्चिम बंगाल में एक ‘मान्यता प्राप्त राज्य दल’ के रूप में मान्यता प्राप्त है। तो बंगाल में फॉरवर्ड ब्लॉक का अस्तित्व अब केवल वाम मोर्चे के एक प्रतीकात्मक साथी के रूप में बचा है, न कि एक प्रमुख चुनावी शक्ति के रूप में।
आज हम ऑल इंडिया फॉरवर्ड ब्लॉक की चर्चा इसलिए कर रहे हैं क्योंकि ऑल इंडिया फॉरवर्ड ब्लॉक नेताजी सुभाष चंद्र बोस द्वारा 3 मई 1939 को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के भीतर स्थापित एक वामपंथी राष्ट्रवादी राजनीतिक दल है। कांग्रेस से मतभेदों के बाद, यह एक स्वतंत्र पार्टी बन गई जिसका लक्ष्य वैज्ञानिक समाजवाद, साम्राज्यवाद-विरोध और ‘पूर्ण स्वराज’ था। इसका चुनाव चिन्ह ‘उछलता हुआ शेर’ है। इसका उद्देश्य ब्रिटिश शासन के खिलाफ संघर्ष को तेज करना और स्वतंत्रता के बाद एक समाजवादी राज्य की स्थापना करना था। यह पश्चिम बंगाल में सबसे मजबूत रही है तो तमिलनाडु, केरल और त्रिपुरा में भी सक्रिय रही है। यह पार्टी वर्तमान में मुख्य रूप से पश्चिम बंगाल में केंद्रित है और अपनी खोई हुई जमीन पाने के लिए संघर्ष कर रही है, साथ ही केंद्र की वामपंथी नीतियों का समर्थन करती है।एआईएफबी पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा और राष्ट्रीय स्तर पर वाम मोर्चे का हिस्सा है, लेकिन केरल में वाम लोकतांत्रिक मोर्चे का हिस्सा नहीं है। इस पार्टी का गठन कांग्रेस के त्रिपुरा अधिवेशन के बाद हुआ था, जब गांधीजी के साथ मतभेदों के कारण सुभाष चंद्र बोस ने अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया था। यह पार्टी भारत के स्वतंत्रता संग्राम में एक क्रांतिकारी और राष्ट्रवादी विकल्प के रूप में उभरी।
1951-1952 और 1957 के भारतीय आम चुनावों के दौरान , पार्टी को फॉरवर्ड ब्लॉक के नाम से जाना जाता था। पार्टी के वर्तमान महासचिव जी. देवराजन हैं। अनुभवी भारतीय राजनीतिज्ञ शरत चंद्र बोस (सुभाष चंद्र बोस के भाई) और चित्त बसु स्वतंत्र भारत में पार्टी के प्रमुख स्तंभ रहे हैं।जनमानस पर नेताजी के प्रभाव का लाभ उठाते हुए, संगठन ने स्वतंत्रता के बाद तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, केरल और असम जैसे राज्यों में अपनी चुनावी छाप स्थापित की थी, जिसमें पश्चिम बंगाल इसका प्रमुख गढ़ था। हालाँकि, आठ दशकों के बाद, पार्टी, जो अब चुनिंदा क्षेत्रों तक ही सीमित है, के पास संसद या विधानसभा का कोई प्रतिनिधि नहीं है।
आज हम इतना ही कह सकते हैं कि ‘तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा’ का आह्वान करने वाले सुभाष बाबू ने आज़ादी के पहले न केवल आईसीएस परीक्षा पास करने के बाद भी नौकरशाह बनने से बेहतर देश की आजादी के लिए संघर्ष को चुना था। और महात्मा गांधी से मत भिन्नता के बाद फॉरवर्ड ब्लॉक के रूप में पहले कांग्रेस के अंदर अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज कराई थी, तो बाद में कांग्रेस से बाहर एक स्वतंत्र राजनीतिक दल के रूप में ऑल इंडिया फॉरवर्ड ब्लॉक सामने आया था। आजादी के 78 साल बाद भले ही आज ऑल इंडिया फॉरवर्ड ब्लॉक ने अपना जनाधार खो दिया हो, लेकिन आज भी इसके जरिए हम सुभाष बाबू को तो याद कर ही रहे हैं। और आज पूरे देश को एक और सुभाष बाबू की जरूरत है जो 21 वीं सदी में भारत को उच्चतम शिखर पर पहुंचाकर, विश्व गुरु की संकल्पना को साकार कर सके… तो पश्चिम बंगाल और ऑल इंडिया फॉरवर्ड ब्लॉक का शुक्रिया, जो आज सुभाष चंद्र बोस को याद करने का जरिया बने…।

कौशल किशोर चतुर्वेदी
कौशल किशोर चतुर्वेदी मध्यप्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार हैं। प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में पिछले ढ़ाई दशक से सक्रिय हैं। पांच पुस्तकों व्यंग्य संग्रह “मोटे पतरे सबई तो बिकाऊ हैं”, पुस्तक “द बिगेस्ट अचीवर शिवराज”, ” सबका कमल” और काव्य संग्रह “जीवन राग” के लेखक हैं। वहीं काव्य संग्रह “अष्टछाप के अर्वाचीन कवि” में एक कवि के रूप में शामिल हैं। इन्होंने स्तंभकार के बतौर अपनी विशेष पहचान बनाई है।वर्तमान में भोपाल और इंदौर से प्रकाशित दैनिक समाचार पत्र “एलएन स्टार” में कार्यकारी संपादक हैं। इससे पहले इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में एसीएन भारत न्यूज चैनल में स्टेट हेड, स्वराज एक्सप्रेस नेशनल न्यूज चैनल में मध्यप्रदेश संवाददाता, ईटीवी मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ में संवाददाता रह चुके हैं। प्रिंट मीडिया में दैनिक समाचार पत्र राजस्थान पत्रिका में राजनैतिक एवं प्रशासनिक संवाददाता, भास्कर में प्रशासनिक संवाददाता, दैनिक जागरण में संवाददाता, लोकमत समाचार में इंदौर ब्यूरो चीफ दायित्वों का निर्वहन कर चुके हैं। नई दुनिया, नवभारत, चौथा संसार सहित अन्य अखबारों के लिए स्वतंत्र पत्रकार के तौर पर कार्य कर चुके हैं