“एक बार बिदाई दे मा घूरे आशी”… कौशल किशोर चतुर्वेदी

“एक बार बिदाई दे मा घूरे आशी”…
खुदीराम बोस पर रचित सबसे प्रसिद्ध और ऐतिहासिक बंगला लोकगीत “एक बार बिदाई दे मा घूरे आशी” (एक बार विदा दे माँ, घूम कर आऊँ) है। इसे पीताम्बर दास ने लिखा था, जो 18 वर्ष की अल्प आयु में 11 अगस्त 1908 को हँसते-हँसते फाँसी पर चढ़ने वाले महान क्रांतिकारी खुदीराम बोस के बलिदान के बाद बंगाल की गली-गली में गूँज उठा था। इसका ऐतिहासिक महत्व यही है कि शहादत के बाद यह गीत बंगाल के घर-घर और लोक गायकों की जुबान पर छा गया। इस गीत में माँ से हँसते-हँसते फाँसी पर झूलने और पुनर्जन्म लेकर फिर से देश सेवा करने की इच्छा व्यक्त की गई है। खुदीराम बोस के सम्मान में बंगाल में लोकगीतों के साथ-साथ उनके नाम की धोती और चूड़ियाँ भी प्रचलित हो गई थीं।
प्रसिद्ध बंगला लोकगीत के बोल यही है कि –
“एक बार बिदाई दे मा घूरे आशी,
हँसी हँसी पोरबो फाँसी, देखबे जगतबासी।
कर्णाभेदे आबार आसी, मागो तोर ए कोले,
आबार जन्म हबे देशेर माटीते, जाबो हँसे हँसे।”
हिन्दी भावार्थ:
“हे माँ! मुझे एक बार विदा दे ताकि मैं घूमकर (नया जन्म लेकर) वापस आऊँ।
मैं हँसते-हँसते फाँसी पर चढ़ूँगा और यह पूरी दुनिया देखेगी।
फाँसी के फंदे को चीरकर मैं हे माँ! फिर से तेरी इसी गोद में आऊँगा।
देश की इस माटी में मेरा फिर से जन्म होगा और मैं हँसते-हँसते (देश के लिए) जाऊँगा।”
11 अगस्त की तारीख वास्तव में भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के संदर्भ में खुदीराम बोस की कर्जदार है। खुदीराम बोस ( जन्म: 03 दिसम्बर 1889, मृत्यु: 11 अगस्त 1908) भारतीय स्वाधीनता के लिये मात्र 18 वर्ष की आयु में भारत की स्वतन्त्रता के लिए फाँसी पर चढ़ गये थे। कुछ इतिहासकारों की यह धारणा है कि वे अपने देश के लिये फाँसी पर चढ़ने वाले सबसे कम उम्र के ज्वलन्त तथा युवा क्रान्तिकारी देशभक्त थे। अपवाद केवल एक ही है कि खुदीराम से पूर्व 17 जनवरी 1872 को 68 कूकाओं के सार्वजनिक नरसंहार के समय 13 वर्ष का एक बालक भी शहीद हुआ था। उपलब्ध तथ्यानुसार उस बालक को, जिसका नंबर 50वाँ था, जैसे ही तोप के सामने लाया गया,उसने लुधियाना के तत्कालीन डिप्टी कमिश्नर कावन की दाढ़ी कसकर पकड़ ली और तब तक नहीं छोड़ी जब तक उसके दोनों हाथ तलवार से काट नहीं दिये गए। बाद में उसे उसी तलवार से मौत के घाट उतार दिया गया था।
खुदीराम का जन्म 3 दिसम्बर 1889 को पश्चिम बंगाल के मिदनापुर जिले के बहुवैनी नामक गाँव में कायस्थ परिवार में बाबू त्रैलोक्यनाथ बोस के यहाँ हुआ था। उनकी माता का नाम लक्ष्मीप्रिया देवी था। बालक खुदीराम के मन में देश को आजाद कराने की ऐसी लगन लगी कि नौवीं कक्षा के बाद ही पढ़ाई छोड़ दी और स्वदेशी आन्दोलन में कूद पड़े। छात्र जीवन से ही ऐसी लगन मन में लिये इस नौजवान ने हिन्दुस्तान पर अत्याचारी सत्ता चलाने वाले ब्रिटिश साम्राज्य को ध्वस्त करने के संकल्प में अलौकिक धैर्य का परिचय देते हुए पहला बम फेंका और मात्र 19 वें वर्ष में हाथ में भगवद गीता लेकर हँसते-हँसते फाँसी के फन्दे पर चढ़कर इतिहास रच दिया।
मुज़फ्फरपुर जेल में जिस मजिस्ट्रेट ने उन्हें फाँसी पर लटकाने का आदेश सुनाया था, उसने बाद में बताया कि खुदीराम बोस एक शेर के बच्चे की तरह निर्भीक होकर फाँसी के तख्ते की ओर बढ़े थे। उनकी शहादत से समूचे देश में देशभक्ति की लहर उमड़ पड़ी थी। उनके साहसिक योगदान को अमर करने के लिए गीत रचे गए और उनका बलिदान लोकगीतों के रूप में मुखरित हुआ। उनके सम्मान में भावपूर्ण गीतों की रचना हुई जिन्हें बंगाल के लोक गायक आज भी गाते हैं।
खुदीराम बोस अगर आज जिंदा होते तो
आजाद भारत के बारे में क्या सोचते? तीन दिन बाद भारत आजादी के 79 साल पूरे कर रहा है। 80 वां स्वतंत्रता दिवस समारोह हर्ष और उल्लास के साथ मनाया जाएगा। तब सबसे बड़ा सवाल यही होगा कि क्या वर्तमान राजनेता जो देश के सांसद हैं, विधायक हैं और महत्वपूर्ण संवैधानिक पदों पर विराजित हैं… क्या वह खुदीराम बोस की तस्वीर सामने रखकर अपनी अंतरात्मा से यह स्वीकार कर सकते हैं कि जैसी शहादत खुदीराम बोस ने 18 साल की उम्र में भारत की आजादी के लिए दी थी, उसकी उम्मीदों पर हम सांसद, विधायक या सभी जन प्रतिनिधि खरे उतर रहे हैं। जंतर मंतर पर ऐसे विषयों को लेकर भी प्रदर्शन होने चाहिए और मंथन भी किया जाना चाहिए…। आओ, हम सभी एक स्वर में कहते हैं कि खुदीराम बोस की शहादत पर हमें गर्व है। आओ आज हम सब मिलकर यही गीत दोहराते हैं कि एक बार बिदाई दे मा घूरे आशी…।

कौशल किशोर चतुर्वेदी

कौशल किशोर चतुर्वेदी मध्यप्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार हैं। प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में पिछले ढ़ाई दशक से सक्रिय हैं। पांच पुस्तकों व्यंग्य संग्रह “मोटे पतरे सबई तो बिकाऊ हैं”, पुस्तक “द बिगेस्ट अचीवर शिवराज”, ” सबका कमल” और काव्य संग्रह “जीवन राग” के लेखक हैं। वहीं काव्य संग्रह “अष्टछाप के अर्वाचीन कवि” में एक कवि के रूप में शामिल हैं। इन्होंने स्तंभकार के बतौर अपनी विशेष पहचान बनाई है।वर्तमान में भोपाल और इंदौर से प्रकाशित दैनिक समाचार पत्र “एलएन स्टार” में कार्यकारी संपादक हैं। इससे पहले इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में एसीएन भारत न्यूज चैनल में स्टेट हेड, स्वराज एक्सप्रेस नेशनल न्यूज चैनल में मध्यप्रदेश‌ संवाददाता, ईटीवी मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ में संवाददाता रह चुके हैं। प्रिंट मीडिया में दैनिक समाचार पत्र राजस्थान पत्रिका में राजनैतिक एवं प्रशासनिक संवाददाता, भास्कर में प्रशासनिक संवाददाता, दैनिक जागरण में संवाददाता, लोकमत समाचार में इंदौर ब्यूरो चीफ दायित्वों का निर्वहन कर चुके हैं। नई दुनिया, नवभारत, चौथा संसार सहित अन्य अखबारों के लिए स्वतंत्र पत्रकार के तौर पर कार्य कर चुके हैं।

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