तो क्या दूसरे कन्हैया कुमार साबित होंगे अभिजीत दीपके… कौशल किशोर चतुर्वेदी

तो क्या दूसरे कन्हैया कुमार साबित होंगे अभिजीत दीपके…

भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की टिप्पणी से कॉकरोच शब्द उठाकर कॉकरोच जनता पार्टी बना कर भारत और पूरी दुनिया में जेन-ज़ी का तहलका मचाने वाले अभिजीत दीपके अब लगता है जल्द ही गुमनामी के दौर में पहुंचने वाले हैं। और यह भी हो सकता है कि राहुल गांधी जल्दी ही दीपके को कांग्रेस में शामिल होने का आमंत्रण दे दें। हाल की गतिविधियों से यही लग रहा है कि दीपके ने जिस तरह से खुद को मोदी विरोधी और विपक्ष का हिमायती साबित करने की कोशिश की है, उससे वह जेन-ज़ी की आँखों से दूरी बनाते नजर आए हैं। और अब अक्टूबर के महीने में मोदी सरकार ने अभिजीत दीपके के प्रदर्शनों को पूरी तरह से कुचलकर उनकी दो बार गिरफ्तारी कर
यह घोषित कर दिया है कि अगर तीसरी बार दीपके ने जमानत की शर्तों का उल्लंघन किया तो वह कन्हैया कुमार की तरह देशद्रोही की श्रेणी में शामिल हो जाएंगे। तस्वीर पूरी तरह से साफ है कि राहुल गांधी समर्थित अभिजीत दीपके अब राहुल गांधी समर्थित कन्हैया कुमार की पंक्ति में शामिल हो चुके हैं। और जेन-ज़ी के समर्थन का उनका दावा अब खुले तौर पर विपक्ष, कम्युनिस्ट और कांग्रेस समर्थन तक सिमट गया है। और अब जेन-ज़ी भी इसी तरह अलग-अलग खेमों में बिखर गया है।
फरवरी 2016 में, कन्हैया कुमार को दिल्ली पुलिस ने जेएनयू परिसर में एक कार्यक्रम में देशद्रोह के आरोप में गिरफ्तार किया था। कुमार ने देश की अखंडता के खिलाफ किसी भी तरह की नारेबाजी से इनकार किया। कुमार की गिरफ्तारी पर विपक्षी दलों, शिक्षकों, छात्रों और शिक्षाविदों ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की। उनकी गिरफ़्तारी के विरोध में जेएनयू में छात्र हड़ताल पर चले गये। मामले की सुनवाई के लिए पटियाला हाउस अदालत में लाए जाने पर कुमार पर कई बार हमला किया गया। सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त पैनल ने बाद में पुष्टि की कि अदालत में मौजूद पुलिसकर्मी सुरक्षा चूक के लिए जिम्मेदार थे। 2 मार्च 2016 को, कुमार को दिल्ली उच्च न्यायालय द्वारा 6 महीने के लिए अंतरिम जमानत दी गई थी, इस शर्त पर कि वह “किसी भी राष्ट्र-विरोधी गतिविधि में भाग नहीं लेंगे”। न्यायाधीश प्रतिभा रानी ने कहा कि कुमार की राष्ट्रविरोधी नारों में भाग लेने की कोई रिकॉर्डिंग नहीं है। दिल्ली सरकार द्वारा नियुक्त एक अलग मजिस्ट्रेट जांच ने निष्कर्ष निकाला कि उसे कुमार के राष्ट्र-विरोधी नारों में भाग लेने का कोई सबूत नहीं मिला। जेल से रिहा होने के बाद, कुमार को जान से मारने की धमकियों का सामना करना पड़ा। भाजपा की युवा शाखा के एक नेता ने कुमार की जीभ काटने वाले को 5 लाख रुपये का इनाम देने की पेशकश की। नई दिल्ली में पोस्टर लगाए गए जिसमें कुमार की हत्या करने वाले को 11 लाख रुपये का इनाम देने की पेशकश की गई। 3 मार्च 2016 को, कन्हैया कुमार ने जेएनयू परिसर में एक खचाखच भरे सभा में भाषण दिया, जिसके दौरान उन्होंने कहा कि वह भारत से आजादी नहीं, बल्कि भारत के भीतर आजादी मांग रहे हैं। उन्होंने अपने साथी छात्रों से देश को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के चंगुल से मुक्त कराने की अपील की, जो उनका कहना था कि संघ देश को विभाजित करने की कोशिश कर रहा है। उन्होंने अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद का जिक्र करते हुए उन्हें अपना ‘विरोधी’ बताया, दुश्मन नहीं। उन्होंने अपने समर्थकों से आजादी के नारे लगाते रहने का आग्रह किया। इस भाषण को गैर-भाजपा दलों के नेताओं के साथ-साथ स्वतंत्र टिप्पणीकारों से भी प्रशंसा मिली। शशि थरूर ने टिप्पणी की कि इसने कुमार को “देशव्यापी राजनीतिक सितारा” बना दिया और इस घटना को बनाने के लिए भाजपा को बधाई दी। कुछ लोगों ने इस बात पर भी चिंता व्यक्त की कि उनके भाषण में जेएनयू में लगाए गए “तथाकथित राष्ट्र-विरोधी नारों की महानता” और उन्हें रोकने के लिए कुमार ने क्या किया, इस पर चर्चा नहीं हुई। 8 मार्च 2016 को, अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस कार्यक्रम में बोलते हुए, कुमार ने भारतीय सेना के कार्मिक द्वारा किए गए कश्मीरी महिला के बलात्कार का मुद्दा उठाया। भारतीय जनता युवा मोर्चा (बीजेवाईएम) द्वारा इसे “राष्ट्र-विरोधी” बताकर इसकी आलोचना की गई। बीजेवाईएम ने कुमार और जेएनयू प्रोफेसर निवेदिता मेनन के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई और उन पर “राष्ट्र-विरोधी” बयान देने का आरोप लगाया। फिलहाल कन्हैया कुमार एक भारतीय राजनीतिक कार्यकर्ता हैं, जो पहले जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय छात्र संघ के अध्यक्ष के रूप में कार्यरत थे और अखिल भारतीय छात्र परिषद के नेता थे। उन्होंने भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के राष्ट्रीय कार्यकारी परिषद के सदस्य के रूप में भी कार्य किया। हाल ही में, वह 28 सितंबर, 2021 को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में शामिल हुए। कुमार की आत्मकथा, बिहार टू तिहाड़: माई पॉलिटिकल जर्नी(बिहार से तिहाड़: मेरी राजनीतिक यात्रा) अक्टूबर 2016 में प्रकाशित हुई थी। कुमार ने 2019 के भारतीय आम चुनाव के लिए भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के टिकट पर बेगुसराय से चुनाव लड़ा। कुल 269,976 वोट और 22.03% वोट शेयर के साथ वह चुनाव हार गए।
और अब बात अभिजीत दीपके की।कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के फ़ाउंडर अभिजीत दीपके को 17 अक्टूबर 2026 को जमानत पर रिहा कर दिया गया। सीजेपी ने कहा कि रिहाई के बाद अभिजीत दीपके वहां से चले गए। एनसीपी के राष्ट्रीय प्रवक्ता अनीष गवांडे ने एक्स पर पोस्ट कर कहा, “अभिजीत को मनमाने ढंग से हिरासत में रखे जाने के 24 घंटे बाद रिहा कर दिया गया है। मुझे उम्मीद है कि सौरव और आशुतोष को भी जल्द ही तिहाड़ जेल में उनकी ग़ैरक़ानूनी हिरासत से रिहा कर दिया जाएगा।”
दरअसल अभिजीत दीपके दिल्ली में अनीष के घर रुके हुए थे। रिहाई के बाद अभिजीत दीपके की मां अनीता दीपके ने खुशी जाहिर करते हुए कहा, “अब हम काफी बेहतर महसूस कर रहे हैं और राहत मिली है, क्योंकि कल से हम बहुत तनाव में थे। मेरी सास को गुजरे अभी 10 दिन भी नहीं हुए हैं और उसके बाद हमें यह खबर मिली, जिससे हम बहुत परेशान हो गए थे।” दीपके ने 16 अक्टूबर की शाम को ‘लहरा दो तिरंगा’ मार्च का आह्वान किया था लेकिन उन्हें तिरंगा मार्च से पहले ही प्रिवेंटिव डिटेंशन में ले लिया गया था। सीजेपी के दो दूसरे प्रमुख चेहरे सौरव दास और आशुतोष रांका पहले से ही न्यायिक हिरासत में हैं। उन्हें जंतर-मंतर में बिना अनुमति दाखिल होने के मामले में पांच दिन की न्यायिक हिरासत में भेजा गया है। 17 अक्टूबर को दोपहर अभिजीत दीपके को कनॉट प्लेस के पास मंदिर मार्ग पुलिस स्टेशन लाया गया। वहां उन्हें स्पेशल एग्ज़ीक्युटिव मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया।
इस बीच रत्ना सिंह ने सुनवाई में देरी पर सवाल उठाते हुए एक्स पर लिखा, “सुनवाई दोपहर 12 बजे होनी थी। लेकिन शाम 3.38 बजे तक इसके कोई संकेत नहीं मिल रहे। अगर यह जानबूझकर नहीं है तो क्या है।”
आंदोलन के प्रमुख युवा चेहरों के पुलिस कार्रवाई के दायरे में आने के बावजूद 16 अक्टूबर को कनॉट प्लेस और उसके आसपास सैकड़ों लोग जमा हुए। इनमें से कई लोगों के हाथों में तिरंगा था। इस दौरान कई प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया गया। अभिजीत दीपके ने मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे के खिलाफ अपने आंदोलन को सीजेपी 2.0 कहा था, लेकिन पुलिस की सख्त कार्रवाई से सवाल उठने लगा है कि इस आंदोलन का अब आगे क्या होगा। और लगभग साफ है कि अब सीजेपी को और अभिजीत दीपके को किसी भी हालत में सरकार के खिलाफ प्रदर्शन की अनुमति नहीं मिल पाएगी। दरअसल, मोदी सरकार ने सीजेपी के पहले प्रदर्शन में मिले जेन-ज़ी के अतिसमर्थन के बाद धर्मेन्द्र प्रधान का केंद्रीय मंत्री पद से इस्तीफा स्वीकार किया था। इसके बाद जहां सीजेपी और अभिजीत दीपके की टीम अति उत्साह में थी, वहीं केंद्र सरकार ने दोबारा ऐसी गलती नहीं करने की रणनीति बना ली थी जिसमें उसको घेरा जा सके। और धर्मेन्द्र प्रधान के इस्तीफे के दौरान और उसके बाद दीपके पूरी तरह से कांग्रेस और विपक्षी दलों के इर्द गिर्द सिमटी नजर आए थे।
तो अब पूरी तरह से साफ है कि सीजेपी
के जनक अभिजीत दीपके के सितारे भी कन्हैया कुमार की राह पर ही हैं। और दोनों ही मामलों में, एक समानता है कि कांग्रेस के सर्वेसर्वा राहुल गांधी का प्रेम दोनों पर ही बराबरी से उमड़ा है। और लगता यही है कि अब दीपके का सूर्य उदय होने के पहले ही अस्तांचल की ओर जाने को है। सवाल यही है अभिजीत दीपके क्या दूसरे कन्हैया कुमार साबित होंगे …।

कौशल किशोर चतुर्वेदी

कौशल किशोर चतुर्वेदी मध्यप्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार हैं। प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में पिछले ढ़ाई दशक से सक्रिय हैं। पांच पुस्तकों व्यंग्य संग्रह “मोटे पतरे सबई तो बिकाऊ हैं”, पुस्तक “द बिगेस्ट अचीवर शिवराज”, ” सबका कमल” और काव्य संग्रह “जीवन राग” के लेखक हैं। वहीं काव्य संग्रह “अष्टछाप के अर्वाचीन कवि” में एक कवि के रूप में शामिल हैं। इन्होंने स्तंभकार के बतौर अपनी विशेष पहचान बनाई है।वर्तमान में भोपाल और इंदौर से प्रकाशित दैनिक समाचार पत्र “एलएन स्टार” में कार्यकारी संपादक हैं। इससे पहले इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में एसीएन भारत न्यूज चैनल में स्टेट हेड, स्वराज एक्सप्रेस नेशनल न्यूज चैनल में मध्यप्रदेश‌ संवाददाता, ईटीवी मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ में संवाददाता रह चुके हैं। प्रिंट मीडिया में दैनिक समाचार पत्र राजस्थान पत्रिका में राजनैतिक एवं प्रशासनिक संवाददाता, भास्कर में प्रशासनिक संवाददाता, दैनिक जागरण में संवाददाता, लोकमत समाचार में इंदौर ब्यूरो चीफ दायित्वों का निर्वहन कर चुके हैं। नई दुनिया, नवभारत, चौथा संसार सहित अन्य अखबारों के लिए स्वतंत्र पत्रकार के तौर पर कार्य कर चुके हैं।

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