
यह संजय दृष्टि … युद्ध और विनाश को रोकने में अक्षम…
महाभारत के युद्ध में एक पात्र संजय थे, जो युद्धभूमि का दृश्य देखकर धृतराष्ट्र को आंखों देखा हाल सुनाते थे। वह संजय दृष्टि महाभारत युद्ध और विनाश को रोकने में अक्षम थी। कुछ ऐसा ही हाल मध्यप्रदेश के नगरीय निकाय विकास विभाग का है। यहां एसीएस संजय दुबे ने विभागीय बैठक में खुलासा किया कि खरीदी में बड़ा गड़बड़झाला हुआ है। एक ही वस्तु को अलग अलग कीमतों में ख़रीदकर नगरीय निकायों ने बड़ा घोटाला किया है। एक जैसी कचरा गाडी, एक नगरीय निकाय ने दो लाख रुपये में खरीदी तो दूसरे नगरीय निकाय ने चार डस्टबिन जोड़कर उसी की कीमत छह लाख रुपए कर दी। कुछ इसी तरह का घोटाला एलईडी की खरीदी में किया गया। कुछ दिन पहले हुई एक बैठक में संजय ने यह साफ कर दिया कि उनकी दृष्टि से बचकर कोई भी नहीं निकल सकता। उन्होंने सब कुछ पकड़ लिया है और नगरीय निकायों को कड़ी कार्रवाई की चेतावनी भी दी है। लेकिन बड़ा सवाल यही है कि संजय दृष्टि क्या इस तरह के खुले भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने में सक्षम है? शायद जवाब सभी जगह से यही मिलेगा कि नहीं, नहीं और नहीं…।
तो कुछ बासी सी खबर यही है कि एक निकाय ने 2 लाख रुपए में कचरा वाहन खरीदा, तो दूसरे ने चार डस्टबिन के साथ इसी तरह के वाहन के लिए 6 लाख रुपए खर्च कर दिए। यानी अतिरिक्त सामान के नाम पर कीमत तीन गुना हो गई। कुछ निकायों ने डेढ़-डेढ़ करोड़ रुपए तक के कचरा वाहन खरीद डाले, जबकि उनके पास इतने वाहन चलाने के लिए पर्याप्त वार्ड तक नहीं हैं। और सवाल यही है कि आखिर सरकारी खरीदी के नाम पर आँखों में धूल झोंकने का यह काम खुलेआम क्यों चल रहा है? क्या डर नाम की कोई भी लक्ष्मण रेखा अब नहीं बची है। मध्यप्रदेश के नगरीय निकायों में खरीदी की दरों में सामने आए इस भारी अंतर पर कुछ दिन पहले नगरीय प्रशासन विभाग के अपर प्रमुख सचिव संजय दुबे अफसरों पर खूब भड़के। विभागीय बैठक में उन्होंने अधिकारियों को दो टूक चेतावनी दी कि किस निकाय ने क्या खरीदा, कितनी मात्रा में खरीदा और किस दर पर खरीदा, इसका पूरा ब्योरा विभाग के पास है।
बैठक में बताई गई जानकारी के मुताबिक, पिछले तीन साल में प्रदेश के 374 नगरीय निकायों ने गवर्नमेंट ई-मार्केट प्लेस (जैम) पोर्टल के जरिए करीब 1,134 करोड़ रुपए की खरीदी की गई। यदि सामान की खरीदी औसत दरों पर की जाती, तो करीब 250 करोड़ रुपए की बचत हो सकती थी। बैठक में नगरीय प्रशासन विभाग के अपर मुख्य सचिव संजय दुबे ने खरीदी की दरों में भारी अंतर और संभावित अनियमितताओं पर सवाल उठाए।एमपीएसईडीसी के एडिशनल एमडी अंशुमन राज ने भी जैम पोर्टल के जरिए हुई खरीदी के आंकड़े और उनका ब्यौरा प्रस्तुत कर पूरा कच्चा चिट्ठा सामने रखा। नगरीय प्रशासन विभाग के अपर मुख्य सचिव संजय दुबे ने बैठक में अधिकारियों को दो टूक कहा कि वे यह न समझें कि निकायों में क्या खरीदा जा रहा है और किस दर पर खरीदा जा रहा है, इसकी जानकारी किसी को नहीं है। विभाग के पास हर निकाय की खरीदी का पूरा ब्यौरा है। किसने क्या खरीदा, कितनी मात्रा में खरीदा और किस कीमत पर खरीदा, सबकी जानकारी रखी जा रही है। दुबे ने कचरा वाहनों की खरीदी का उदाहरण देते हुए बताया कि एक निकाय ने 2 लाख रुपए में कचरा वाहन खरीदा, जबकि दूसरे ने चार डस्टबिन के साथ इसी तरह के वाहन के लिए 6 लाख रुपए खर्च कर दिए। उन्होंने आशंका जताई कि अतिरिक्त सामान जोड़कर कीमत बढ़ाई गई और अपने लोगों के जरिए खरीदी कराई गई। पिछले साल उन्होंने इन मामलों पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया था, लेकिन इस साल से खरीदी में गड़बड़ी मिलने पर कार्रवाई की जाएगी। उन्होंने साफ किया कि अब ऐसी गलतियां बर्दाश्त नहीं की जाएंगी।
एडिशनल एमडी अंशुमन राज ने बताया कि नगरीय निकायों की खरीदी में गड़बड़ियों का पता लगाने की शुरुआत 2023 में हुई थी। उस समय वे एसडीएम थे। एक नगर पालिका में 60 लाख रुपए में 200 एलईडी बल्ब खरीदने की शिकायत मिली थी। एक लीटर केमिकल कहीं 5 रुपए में, कहीं 33,500 रुपए में। अंशुमन राज ने बताया कि एक ही तरह के सामान की खरीदी में भी कीमतों का भारी अंतर मिला है। एलईडी लाइट की खरीदी में ऐसा ही अंतर सामने आया है। 60 वाट की एलईडी लाइट कहीं 306 रुपए में खरीदी गई, जबकि भोपाल में इसकी कीमत 11,800 रुपए दर्ज हुई। भोपाल की इस खरीदी का कुल मूल्य 3.78 लाख रुपए बताया गया।
तो ऐसे खरीदी के उदाहरणों की भरमार है। अनुमान सामने आया कि अगर निकाय औसत दरों पर सामान खरीदते, तो करीब 250 करोड़ रुपए बचाए जा सकते थे। हालांकि, उन्होंने यह भी साफ किया कि विभाग का मकसद हर सामान सबसे सस्ती दर पर खरीदने के लिए कहना नहीं है। सवाल यहां नगरीय निकाय विकास विभाग और 250 करोड़ रुपए बचाने का नहीं है। सवाल यहां यह है कि क्या भ्रष्टाचार की इस परंपरा को रोकने की कोई स्थायी व्यवस्था का बन पाना संभव है। उत्तर शायद यही मिलेगा कि नहीं। एसीएस संजय दुबे की दृष्टि वह सब तो देख सकती है जो घटित हो चुका है, लेकिन भ्रष्टाचार की ऐसी मनमानी होने से पहले ही रोकने का कोई फार्मूला शायद किसी के पास नहीं है। सब कुछ सामने होते हुए भी कुछ भी न रोक पाने की यही अक्षमता संजय दृष्टि पर प्रश्न चिह्न लगाती है। संजय दृष्टि का होना बेहतर है, लेकिन युद्ध को देखकर उसका वर्णन करने तक सिमटी यह दृष्टि युद्ध और विनाश को रोकने में अक्षम थी, है और शायद हमेशा अक्षम ही रहेगी…।

कौशल किशोर चतुर्वेदी
कौशल किशोर चतुर्वेदी मध्यप्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार हैं। प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में पिछले ढ़ाई दशक से सक्रिय हैं। पांच पुस्तकों व्यंग्य संग्रह “मोटे पतरे सबई तो बिकाऊ हैं”, पुस्तक “द बिगेस्ट अचीवर शिवराज”, ” सबका कमल” और काव्य संग्रह “जीवन राग” के लेखक हैं। वहीं काव्य संग्रह “अष्टछाप के अर्वाचीन कवि” में एक कवि के रूप में शामिल हैं। इन्होंने स्तंभकार के बतौर अपनी विशेष पहचान बनाई है।वर्तमान में भोपाल और इंदौर से प्रकाशित दैनिक समाचार पत्र “एलएन स्टार” में कार्यकारी संपादक हैं। इससे पहले इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में एसीएन भारत न्यूज चैनल में स्टेट हेड, स्वराज एक्सप्रेस नेशनल न्यूज चैनल में मध्यप्रदेश संवाददाता, ईटीवी मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ में संवाददाता रह चुके हैं। प्रिंट मीडिया में दैनिक समाचार पत्र राजस्थान पत्रिका में राजनैतिक एवं प्रशासनिक संवाददाता, भास्कर में प्रशासनिक संवाददाता, दैनिक जागरण में संवाददाता, लोकमत समाचार में इंदौर ब्यूरो चीफ दायित्वों का निर्वहन कर चुके हैं। नई दुनिया, नवभारत, चौथा संसार सहित अन्य अखबारों के लिए स्वतंत्र पत्रकार के तौर पर कार्य कर चुके हैं।