ईमानदारी के नाम पर दुनिया में क्या बचा है…जो विला-कॉटेज पर कोहराम मचा है… कौशल किशोर चतुर्वेदी

ईमानदारी के नाम पर दुनिया में क्या बचा है…जो विला-कॉटेज पर कोहराम मचा है…
इन दिनों राजस्थान कैडर के आईएएस-आईपीएस दंपत्ति की संपत्ति को लेकर पूरे देश में कोहराम मचा है। बार-बार यह बात हो रही है कि मानो ईमानदारी शब्द के महिमामंडन के लिए ही इन आईएएस-आईपीएस दंपत्ति का जन्म हुआ हो। और बात कुछ ऐसी हो रही है जैसे दुनिया में इन दोनों के अलावा ईमानदारी सबके सिर चढ़कर बोल रही हो। यह बात और है कि इन सेवाओं में भी एक फीसदी या दो फीसदी अफसर मरे हुए ईमानदार यानी डेड ऑनेस्ट जैसे शब्दों की माला पहनकर पूरी जिंदगी गुजार देते हों लेकिन इसका मतलब यह तो कतई नहीं है कि सबको उनकी ही गिनती में शामिल करने को उतारू हो जाया जाए। अब कॉटेज विला नौकरी के समय ही खरीदे, इसमें उनका क्या दोष है? उन्हें मालूम है कि नौकरी के बाद तो उनके महकमे के पटवारी और सिपाही भी उनकी तरफ अच्छी नजरों से नहीं देखते, फिर किसी कॉटेज विला वाले से उम्मीद ही क्या की जा सकती है? इसीलिए उनने समय रहते हिसाब किताब बनाने में ही समझदारी समझी। आखिर समझदार थे इसलिए तो आईएएस-आईपीएस जैसी बड़ी नौकरी में वह चयनित हो पाए थे। फिर 33 और 31 साल की नौकरी के बाद अगर कॉटेज विला ले लिए तो इतना बवंडर मचाने की जरूरत क्या आन पड़ी।
एक भाई साहब लिख रहे हैं कि आईएएस-आईपीएस पति-पत्नी ने 40 विला-कॉटेज खरीद डाले। बाप रे बाप। इतना सस्ता कैसे? आईएएस-आईपीएस पति-पत्नी के परिवार ने खरीद डाले 40 विला-कॉटेज! 6.16 करोड़ में इतनी प्रॉपर्टी कैसे? राजस्थान में बड़ा संपत्ति विवाद! राजस्थान के वरिष्ठ आईएएस अधिकारी शिखर अग्रवाल, उनकी आईपीएस पत्नी प्रशाखा माथुर उनके दोनों बेटों और सास-ससुर द्वारा करीब ढाई साल में 40 विला और कॉटेज खरीदे जाने की खबर ने कई बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं।
मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, इस आईएएस-आईपीएस परिवार ने राजस्थान के उदयपुर और अलवर में एक ही कंपनी से लगभग 6 करोड़ 16.5 लाख रुपये में 40 विला-कॉटेज खरीदे। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि जिस कंपनी से ये संपत्तियां खरीदी गईं, उन्हीं संपत्तियों को वापस उसी कंपनी को सालाना लगभग 1 करोड़ 80 लाख रुपये की लीज पर देने की बात सामने आई है। आखिर इतनी बड़ी संपत्ति की खरीद और लीज का पूरा गणित क्या है? रिपोर्ट के अनुसार उदयपुर के बुझड़ा स्थित अनंता रिसॉर्ट में 20 कॉटेज खरीदे गए। इन कॉटेज की रजिस्ट्री सितंबर 2023 में हुई।अलवर के अजबगढ़ स्थित अनंता रिसॉर्ट में 20 विला खरीदे गए। इन विला की रजिस्ट्री मार्च 2026 में हुई।सभी संपत्तियां गोयल फैशंस प्राइवेट लिमिटेड से खरीदी गईं। कुल खरीद कीमत लगभग 6.16 करोड़ रुपए बताई गई है। सालाना लीज से 1.80 रुपए करोड़ मिलने का दावा है।
आईएएस शिखर अग्रवाल राजस्थान सरकार में अतिरिक्त मुख्य सचिव हैं। उनके पास उद्योग, एमएसएमई, सरकारी उपक्रम, दिल्ली-मुंबई औद्योगिक कॉरिडोर, निवेश और अन्य महत्वपूर्ण विभागों की जिम्मेदारियां हैं।
उनकी पत्नी प्रशाखा माथुर राजस्थान पुलिस में वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी हैं।

अब यह रिपोर्ट सामने आने के बाद शिखर अग्रवाल को सरकार ने शिखर से पटककर जमीन पर फेंक दिया है। उन्हें एपीओ यानी अवेटिंग पोस्टिंग ऑर्डर की खाई में पटक दिया गया है। अब उनके पास कोई भी विभाग नहीं है। बेचारे शिखर अग्रवाल आसमान से गिरे और खजूर में भी नहीं अटक पाए। आखिर उनने गुनाह ही क्या किया था। राजस्थान कैडर के 1993 बैच के आईएएस अफसर शिखर अग्रवाल के मध्य प्रदेश में बैचमेट संजय दुबे, नीरज मंडलोई, अनुपम राजन, अनिरुद्ध मुखर्जी, दीप्ति गौड़ मुखर्जी हैं। यह सब भी एसीएस रैंक में हैं। और नगरीय निकाय में पदस्थ एसीएस संजय दुबे ने तो हाल ही में मध्यप्रदेश में नगरीय निकाय का बड़ा घोटाला खुद ही सामने ला दिया। नीरज मंडलोई अति महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभाते हुए फिलहाल मुख्यमंत्री के एसीएस हैं। अनुपम राजन एसीएस उच्च शिक्षा की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी निभा रहे हैं। और अनिरुद्ध मुखर्जी और दीप्ति गौड़ मुखर्जी केंद्र सरकार में प्रतिनियुक्ति पर सचिव रैंक में पदस्थ हैं।
नौकरशाही की भाषा में समझा जाए तो शिखर अग्रवाल के उज्ज्वल भविष्य और राजस्थान के मुख्य सचिव बनने की राह में रोड़ा अटकाने के लिए उन्हीं के किसी प्रतिस्पर्धी ने यह गहरी साजिश रची है। अब गोयल की कंपनी कोई घाटे में रहकर तो सौदा करने से रही। सो यह उनका आपसी मामला था कि गोयल जी के मन में वह अपनी खास जगह बनाने में सफल रहे और गोयल जी ने विला-कॉटेज सस्ते में देकर शिखर के दिल में अपना अच्छा असर डाल दिया। और अगर किसी में खोजी योग्यता कूट-कूट कर भरी थी तो 2023 की रजिस्ट्री का सुराग आखिर तीन साल बाद ही क्यों लग पाया। तीन साल पहले ही भंडाफोड़ कर देते तो 2026 में भी रजिस्ट्री कराने की नौबत ही नहीं आती। और जहां तक पत्नी प्रशाखा माथुर की बात है, तो वह तो खुद आईपीएस अफसर हैं और नियम कानून सब बड़े अच्छे से जानती हैं। उनसे कोई चूक हो जाए, ऐसा हो ही नहीं सकता। यह बात और है किस समय के फेर में उनके सितारे गर्दिश में आ गए हों। प्रशाखा राजस्थान कैडर की 1995 बैच की अधिकारी हैं और मध्यप्रदेश में उनके बैचमेट श्रीमती मीनाक्षी शर्मा, डॉ.मयंक जैन, ए साई मनोहर, चंचल शेखर, जयदीप प्रसाद, योगेश देशमुख और केपी वैंकटेश्वर राव हैं। एसाई मनोहर रिटायर होने के बाद अगले ही दिन मुख्यमंत्री के सलाहकार बन गए हैं। वहीं मयंक जैन निलंबित अवस्था में ही सेवाएँ जारी रखे हुए हैं। मीनाक्षी शर्मा दिल्ली में है तो बाकी तीनों अफसर मध्य प्रदेश में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों का निर्वहन कर रहे हैं।
अब समय-समय की बात है। रात के बाद दिन है और दिन के बाद रात है। अर्नब चक्रवात की आहट से थोड़ी बहुत उथल पुथल मच गयी है। अब सब शांत है। अर्नब का समय बहुत ज्यादा नहीं रहता। शिखर और प्रशाखा के सिर से भी अंधेरा जल्दी छंट जाएगा। शत्रु ने अपना काम निकाल लिया हो तो उसका भी भला। और शिखर की सेहत पर जो आफत आनी थी सो आ गई और अब चली भी जाएगी। जिन्हें ईमानदारी और बेईमानी कहते हैं, ढोल पीटना हो वह पीटते रहें। जो कष्ट मिलना था वह शिखर को मिल गया। और जो खुशियाँ बाकी हैं वह भी शिखर के हिस्से से कोई बेदखल नहीं कर सकता। शिखर ने खरीदे हैं तो हिसाब-किताब देने की क्षमता भी उनमें है। अच्छा ही है कि मामला सामने आ गया सो नौकरी में रहते ही निपट जाएगा। वरना बाद में शिखर पर यही सब कहर बन कर टूटता और वह ज्यादा मुसीबत में पड़ जाते। इसीलिए तो कहा है कि ईश्वर जो करता है उसमें कुछ भलाई ही छिपी रहती है। वैसे भी यह तो सबको मालूम ही है कि ईमानदारी के नाम पर दुनिया में बचा ही क्या है…जो विला-कॉटेज पर इतना कोहराम मचा है…। मशहूर शायर कृष्ण बिहारी ‘नूर’ की एक बहुत चर्चित ग़ज़ल की दो पंक्तियाँ हैं:
“सच घटे या बढ़े तो सच न रहे,
झूठ की कोई इंतिहा ही नहीं।”
यह शेर भी यही बता रहा है कि ईमानदारी अगर पूरी है, तब ही ठीक है और ऐसा ठीक एक दो प्रतिशत अफसरों के हिस्से में ही आ पाया है। बाकी तो सब ठीक ही है… चाहे शिखर-प्रशाखा हों जिनके नाम पर कोहराम मचा है या अन्य वह सभी जिनके नाम सच्चाई की चादर में लिपटे लग्जरी गद्दों पर पड़े चैन की नींद सो रहे हैं वह भी तभी तक
जब तक उनके नाम पर भी कोई कोहराम न मचाए…।

कौशल किशोर चतुर्वेदी

कौशल किशोर चतुर्वेदी मध्यप्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार हैं। प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में पिछले ढ़ाई दशक से सक्रिय हैं। पांच पुस्तकों व्यंग्य संग्रह “मोटे पतरे सबई तो बिकाऊ हैं”, पुस्तक “द बिगेस्ट अचीवर शिवराज”, ” सबका कमल” और काव्य संग्रह “जीवन राग” के लेखक हैं। वहीं काव्य संग्रह “अष्टछाप के अर्वाचीन कवि” में एक कवि के रूप में शामिल हैं। इन्होंने स्तंभकार के बतौर अपनी विशेष पहचान बनाई है।वर्तमान में भोपाल और इंदौर से प्रकाशित दैनिक समाचार पत्र “एलएन स्टार” में कार्यकारी संपादक हैं। इससे पहले इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में एसीएन भारत न्यूज चैनल में स्टेट हेड, स्वराज एक्सप्रेस नेशनल न्यूज चैनल में मध्यप्रदेश‌ संवाददाता, ईटीवी मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ में संवाददाता रह चुके हैं। प्रिंट मीडिया में दैनिक समाचार पत्र राजस्थान पत्रिका में राजनैतिक एवं प्रशासनिक संवाददाता, भास्कर में प्रशासनिक संवाददाता, दैनिक जागरण में संवाददाता, लोकमत समाचार में इंदौर ब्यूरो चीफ दायित्वों का निर्वहन कर चुके हैं। नई दुनिया, नवभारत, चौथा संसार सहित अन्य अखबारों के लिए स्वतंत्र पत्रकार के तौर पर कार्य कर चुके हैं।

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