दतिया में फिर उपचुनाव होगा?: घनश्याम सिंह के निर्वाचन को HC में चुनौती, हार के 49 दिन बाद भाजपा ने बदला जिलाध्यक्ष; नरोत्तम को तरजीह की चर्चा के बीच आशुतोष समर्थक को कमान

दतिया एक साल में चौथी बार चर्चा में है। पहले राजेंद्र भारती की सदस्यता खत्म होने से उपचुनाव घोषित हुए। भाजपा ने नरोत्तम मिश्रा का टिकट काट दिया, फिर उपचुनाव हुआ और अब जीते हुए विधायक घनश्याम सिंह के निर्वाचन को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई है। इसी बीच भाजपा ने आखिरकार हार के 49 दिन बाद नया जिलाध्यक्ष भी चुन लिया है।

कांग्रेस विधायक राजेंद्र भारती को अदालत से 2 साल की सजा सुनाए जाने के बाद उनकी सदस्यता गई, कांग्रेस ने भी उन्हें पार्टी से निष्कासित कर दिया, और दतिया सीट खाली हुई। भाजपा ने 15 साल से लगातार विधायक रहे नरोत्तम मिश्रा का टिकट काटकर आशुतोष तिवारी को मैदान में उतारा। कांग्रेस ने घनश्याम सिंह पर भरोसा जताया। 30 जुलाई को हुए उपचुनाव में आशुतोष तिवारी को 6,016 वोटों से हार मिली।

हार के बाद भाजपा ने 4 अगस्त को दतिया का पूरा जिला संगठन भंग कर दिया, तत्कालीन जिलाध्यक्ष रघुवीर सिंह कुशवाहा समेत पूरी कार्यकारिणी हटा दी गई। इसके बाद करीब 49 दिन तक नया जिलाध्यक्ष घोषित नहीं हुआ। इसी दौरान खबरें आने लगीं कि पार्टी नरोत्तम मिश्रा को फिर तरजीह दे सकती है, दिल्ली और भोपाल में कई बड़े नेताओं से उनकी मुलाकातें हुईं, फोटो और बयान वायरल हुए।अब एक ही दिन में दो बड़े घटनाक्रम सामने आए हैं- घनश्याम सिंह के निर्वाचन को हाईकोर्ट में चुनौती और भाजपा के नए जिलाध्यक्ष की नियुक्ति।

सवाल 2: घनश्याम सिंह की विधायकी के खिलाफ याचिका क्यों, क्या सदस्यता जाएगी?

जवाब: भाजपा नेता और अधिवक्ता दीपक बेलपत्री ने 17 सितंबर को हाईकोर्ट में याचिका दायर की है।याचिका के मुताबिक 1991 में राजीव गांधी की हत्या के बाद दतिया में हुए विरोध प्रदर्शन और चक्काजाम के दौरान अलग-अलग जगहों पर FIR दर्ज हुई थीं, और एक FIR में करीब 22 लोगों के साथ घनश्याम सिंह का नाम भी शामिल था। घनश्याम सिंह ने अपने शपथ पत्र में दो लंबित आपराधिक मामलों की जानकारी दी थी, लेकिन इस मामले का जिक्र नहीं किया। चर्चा यह भी है कि याचिका का आइडिया आशुतोष तिवारी का है।

यहां सवाल यह है कि चुनावी शपथ पत्र (फॉर्म 26) में हर पुरानी FIR बताना कानूनन जरूरी है या नहीं…

फॉर्म 26 में उम्मीदवार से सभी लंबित आपराधिक मामलों की जानकारी मांगी जाती है, सिर्फ उन्हीं की नहीं जिनमें चार्जशीट पेश हो चुकी हो। लेकिन अदालतों की व्याख्या इस पर अलग-अलग रही है। 2024 में कर्नाटक हाईकोर्ट के एक फैसले में कहा गया था कि सिर्फ उन्हीं आपराधिक मामलों का खुलासा जरूरी है जिनमें अदालत ने संज्ञान लिया हो या आरोप तय हो चुके हों, महज दर्ज हुई FIR का नहीं।

हालांकि, बाद में इस फैसले की व्याख्या पर सवाल उठे। जानकारों का कहना था कि फॉर्म 26 में बदलाव के बाद लंबित मामलों की जानकारी देने का नियम पहले से ज्यादा व्यापक है। घनश्याम सिंह का कहना है कि- उन्हें केस दर्ज होने की जानकारी ही नहीं थी, और यह मामला कभी चालान या अदालती सुनवाई तक पहुंचा ही नहीं

जिलाध्यक्ष बनने के बाद बुधवार को माधवेंद्र सिंह ने सीएम और भाजपा प्रदेश अध्यक्ष से मुलाकात की।

सवाल 3: अगर चुनाव रद्द हुआ, तो क्या फिर उपचुनाव होगा?

जवाब: जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 के मुताबिक चुनाव सिर्फ चुनाव याचिका के जरिए ही चुनौती दी जा सकती है, और उसकी समयसीमा नतीजे की घोषणा से 45 दिन है।घनश्याम सिंह 30 जुलाई को जीते थे, यानी यह सीमा करीब 13 सितंबर को खत्म हो चुकी थी, जबकि याचिका 17 सितंबर को दायर हुई। यह याचिका औपचारिक चुनाव याचिका है या सामान्य रिट, यह अभी सामने नहीं आया है। इसलिए इसकी समयसीमा पर भी निर्भर करेगा कि सुनवाई होती भी है या नहीं।

अगर मान भी लें कि याचिका आगे बढ़ती है और कोर्ट चुनाव रद्द करता है, तो कानून (धारा 101) के मुताबिक दो रास्ते हैं- कोर्ट सीधे दूसरे नंबर के उम्मीदवार आशुतोष तिवारी को विजयी घोषित कर सकता है, या चुनाव पूरी तरह रद्द कर सकता है।मार्च 2026 में ग्वालियर हाईकोर्ट ने ठीक ऐसे ही एक मामले में विजयपुर सीट के विधायक मुकेश मल्होत्रा का निर्वाचन रद्द किया था, आरोप था कि उन्होंने अपने शपथ पत्र में 6 आपराधिक मामलों की जानकारी छिपाई थी। लेकिन कोर्ट ने वहां दोबारा उपचुनाव कराने का आदेश नहीं दिया, बल्कि सीधे दूसरे नंबर पर रहे भाजपा उम्मीदवार रामनिवास रावत को विजयी घोषित कर दिया। हालांकि उस आदेश के खिलाफ आगे की कानूनी प्रक्रिया भी हुई।

अगर सीट पूरी तरह खाली घोषित हुई, तो सामान्य नियम (धारा 151A) के मुताबिक 6 महीने के भीतर उपचुनाव कराना होगा। राजनीतिक विश्लेषक रवि ठाकुर के मुताबिक निर्वाचन रद्द होने की संभावना एक प्रतिशत भी नहीं है, क्योंकि मूल केस कभी अदालत तक पहुंचा ही नहीं था।राजनीतिक विश्लेषक देवश्री माली के मुताबिक अगर मामला दो-तीन साल खिंच भी गया, तो अगला विधानसभा चुनाव आते ही यह याचिका अपने आप बेमतलब हो जाएगी।

सवाल 4: नरोत्तम को तरजीह मिल रही थी फिर आशुतोष समर्थक को जिलाध्यक्ष क्यों बनाया?

जवाब: हार के बाद संगठन को नए सिरे से खड़ा करना भाजपा के सामने चुनौती थी।माधवेंद्र परिहार लंबे समय से संगठन में सक्रिय हैं और संघ से जुड़े पूर्णकालिक कार्यकर्ता रहे हैं। भाजपा में वे दो बार जिला उपाध्यक्ष और एक बार महामंत्री रह चुके हैं। साल 2000 में जिला महामंत्री बने थे, यानी दतिया संगठन में उनकी पुरानी पकड़ है। जिलाध्यक्ष की जिम्मेदारी उन्हें पहली बार मिली है।

रवि ठाकुर के मुताबिक, माधवेंद्र सिंह परिहार भाजपा उम्मीदवार रहे आशुतोष तिवारी और विधानसभा अध्यक्ष नरेंद्र सिंह तोमर के करीबी हैं। मूल रूप से दतिया जिले की भांडेर विधानसभा सीट से आते हैं।देवश्री माली इसे व्यक्तिगत खेमेबंदी से ज्यादा एक संरचनात्मक मजबूरी के तौर पर देखते हैं। उनके मुताबिक- दतिया में लगभग हर सक्रिय कार्यकर्ता किसी न किसी तरह नरोत्तम से जुड़ा रहा है, इसलिए पार्टी के लिए ऐसा चेहरा ढूंढना मुश्किल था जो न नरोत्तम का करीबी हो, न खुलकर विरोधी। माधवेंद्र इसी खाली जगह में फिट बैठे।

सवाल 5: अब दतिया भाजपा में क्या बदलेगा, और नरोत्तम अब कहां खड़े हैं?जवाब: भाजपा के लिए अब परीक्षा नई जिला कार्यकारिणी बनाने और संगठन को फिर सक्रिय करने की है।भाजपा प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल ने संगठन में गुटबाजी की खबरों के बीच दतिया में संगठन को फिर सक्रिय करने के लिए उन पर भरोसा जताया है। देवश्री माली के मुताबिक असली चुनौती यही होगी कि नई टीम कहां से लाई जाए, क्योंकि दतिया में दूसरी-तीसरी-चौथी कतार का लगभग हर कार्यकर्ता किसी न किसी रूप में नरोत्तम खेमे से जुड़ा रहा है।

नरोत्तम के लिए क्या कोई नया समीकरण अब भी बन सकता है?

उपचुनाव की हार के बाद भाजपा की समीक्षा बैठक में नरोत्तम मिश्रा को नहीं बुलाया गया, जबकि वे चुनाव संचालन समिति के प्रमुख थे।

दूसरी ओर, हाल ही में तीन पूर्व मंत्रियों- प्रभुराम चौधरी, अरविंद सिंह भदौरिया और मीना सिंह- को बंगला खाली करने का नोटिस भेजा गया है। लेकिन नरोत्तम मिश्रा को उल्टा 2028 तक के लिए नए सिरे से बंगला आवंटित किया गया है। देवश्री माली के मुताबिक यह इत्तेफाक नहीं हो सकता, ऊपर से कोई संकेत मिले बिना ऐसा फैसला संभव नहीं है।

क्या उत्तर प्रदेश में अहम जिम्मेदारी देने की कवायद है…

मार्च 2027 में उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव होने हैं, जहां ब्राह्मण वोट अहम है। राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक भाजपा इस वर्ग को नाराज नहीं करना चाहती, और हाल ही में दिनेश शर्मा को चुनाव से पहले राज्यपाल बनाया जाना भी इसी रणनीति की एक कड़ी माना जा रहा है। दिल्ली और भोपाल में नरोत्तम से हो रही मुलाकातों को भी इसी बड़े ब्राह्मण-समीकरण से जोड़कर देखा जा रहा है। हालांकि, अभी यह सिर्फ चर्चा है।

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