बांग्लादेश के दो नागरिकों- एक पुरुष और एक महिला- को सऊदी अरब में जिस तरह से मौत की सजा दी गई है, उसने अपनी अस्पष्टता की वजह से कई सवाल खड़े कर दिए हैं. पहले मीडिया में खबर आई कि दोनों पति-पत्नी है और दोनों को मक्का शहर की एक मस्जिद में ‘अनैतिक’ गतिविधि करने के आरोप में दोषी ठहराने के बाद मौत के घाट उतारा गया. अब दोनों के परिवार ने साफ किया है कि दोनों में ऐसा कोई रिलेशन नहीं है.

पति-पत्नी नहीं थे मक्का में ‘अनैतिक’ अचारण पर सजा-ए-मौत पाने वाले बांग्लादेशी
खास बात यह भी है कि दोनों को तीन साल पहले 2023 में ही हिरासत में लिया गया था. इस बीच अपने दो नागरिकों को सजा-ए-मौत देने पर बांग्लादेश ने असंतोष जताया है. बांग्लादेश ने खास तौर पर अपने नागरिक नजरुल इस्लाम (पुरुष) के मामले में जानकारी शेयर न करने और राजनयिक बातचीत में हुई कमियों की ओर इशारा किया है.
सऊदी ने जिस बांग्लादेशी महिला को सजा दी है उसका नाम स्वीटी अख्तर है.
दोनों का परिवार क्या कह रहा है?
बांग्लादेशी अखबार ‘द डेली स्टार’ की अनुसार नजरुल के पिता अब्दुल बशीर ने परिवार की आर्थिक स्थिति सुधारने की उम्मीद में अपने सबसे बड़े बेटे को सऊदी अरब भेजने के लिए 7 लाख टका उधार लिए थे. नजरुल 10 नवंबर, 2022 को बांग्लादेश से रवाना हुआ और वहां एक क्लीनर के तौर पर काम करने लगा. परिवार ने बताया कि उन्हें मीडिया रिपोर्टों से पता चला कि मक्का में लगभग तीन साल और तीन महीने तक हिरासत में रहने के बाद, 14 अक्टूबर को उसे फांसी दे दी गई.
बीबीसी बांग्ला की रिपोर्ट के अनुसार परिवार के मुताबिक, जेल जाने के बाद वह लगभग हर सप्ताह फोन पर उनसे थोड़ी देर बात करता था. इस दौरान उसने बताया था कि उस महिला के साथ उसका प्रेम संबंध था. कथित तौर पर यह महिला स्वीटी ही थी. अब यह परिवार बांग्लादेश सरकार से अपील कर रहा है कि वे इस फांसी से जुड़ी परिस्थितियों की जांच कराएं और सरकारी खर्च पर उसके शव को वापस लाने की व्यवस्था करे.
बेटी के शव का इंतजार कर रहा एक मजदूर पिता
‘द डेली स्टार’ की एक दूसरी रिपोर्ट के अनुसार लगभग चार साल पहले, पिता फजल मिया ने अपनी सबसे छोटी बेटी स्वीटी को सऊदी अरब भेजने के लिए 1.5 लाख टका उधार लिए थे. इस उम्मीद में कि इससे उसका भविष्य बेहतर हो जाएगा. दिहाड़ी मजदूर फजल मिया को दो दिन पहले ही पता चला कि सऊदी अरब में काम कर रही उसकी बेटी स्वीटी को मौत की सजा दी गई है. सरकार की ओर से कोई मौत की सजा मिलने की कोई आधिकारिक पुष्टि न होने के कारण, परिवार को न तो उसकी मौत का पक्का पता है और न ही इस बात का सुकून कि बेटी जीवित है.
उनके अनुसार, स्वीटी ने बताया कि सऊदी अरब में अन्य महिला कर्मचारियों के साथ बहस होने के बाद उसे फंसाकर जेल में डाल दिया गया था. इसके बाद लगभग एक साल तक परिवार का उससे संपर्क टूट गया. पिता ने कहा, “बाद में उसने फिर से घर पर फोन करना शुरू कर दिया, आमतौर पर महीने में एक बार, लेकिन उसने हमें कभी अपने मुकदमे या सजा के बारे में नहीं बताया… अपनी आखिरी कुछ कॉलों में से एक में, उसने कहा कि वह शायद दो महीने में जेल से रिहा हो जाएगी. उसने 15 दिन पहले ही जेल से हमें फोन किया था. तब भी, उसने अपनी सजा के बारे में कुछ नहीं बताया.”
सऊदी से सवाल पूछ रही बांग्लादेश सरकार
बांग्लादेश के विदेश मामलों के राज्य मंत्री हुमायूं कबीर ने सोमवार को कहा कि बांग्लादेश सरकार ने इन फांसी की सजाओं के संबंध में सऊदी अधिकारियों से विस्तृत स्पष्टीकरण मांगा है. वह इस बात की जांच कर रही है कि जानकारी लेने-देने की प्रक्रिया में कहां कमी रह गई. कबीर ने कहा, “सऊदी अरब के साथ बांग्लादेश के अच्छे और गहरे संबंध हैं, खासकर हमारे प्रधानमंत्री के स्तर पर. बांग्लादेश और सऊदी अरब, दोनों ने ही जिनेवा कन्वेंशन पर साइन किए हैं. इस घटना में सूचना शेयर करने में कमी रह गई थी. हमने सऊदी अरब से स्पष्टीकरण मांगा है ताकि यह पता चल सके कि यह कमी क्यों हुई.”
उन्होंने इन फांसी की सजाओं को निराशाजनक बताया और कहा कि दोनों पक्ष इन कमियों की जांच के लिए बातचीत कर रहे हैं. उन्होंने आगे कहा कि अब मुआवजे की कोई गुंजाइश नहीं है, क्योंकि सजा पहले ही दी जा चुकी है.
क्या कहता है वियना कन्वेंशन?
1963 के कांसुलर संबंधों पर वियना कन्वेंशन के अनुच्छेद 36 के तहत किसी विदेशी नागरिक को गिरफ्तार किए जाने या कानूनी प्रक्रिया का सामना करने पर उसे अपने देश के दूतावास से सहायता पाने का अधिकार है. लेकिन जेद्दा में बांग्लादेश के महावाणिज्य दूतावास ने पुष्टि की है कि उन्हें कोई पूर्व सूचना नहीं मिली थी. यहां मुद्दा सिर्फ इतना नहीं है कि क्या प्रोटोकॉल तोड़ा गया. असली सवाल यह है कि क्या उनके जिंदा रहते ऐसी कोई सुरक्षा व्यवस्था थी भी, जो उनकी मदद कर पाती?