महंगाई, ईरान के साथ जंग और ट्रम्प की घटती लोकप्रियता के बीच रिपब्लिकन पार्टी के लिए कांग्रेस में अपना बहुमत बचाना चुनौती बन गया है। 10 बड़े पब्लिक पोल में से सिर्फ 1 में रिपब्लिकन पार्टी आगे है।मिडटर्म चुनाव में राष्ट्रपति नहीं चुना जाता। इसमें अमेरिकी संसद यानी कांग्रेस के दोनों सदनों- हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स और सीनेट की सीटों के लिए वोटिंग होती है।
फिलहाल दोनों सदनों में रिपब्लिकन पार्टी को मामूली बहुमत है। अगर डेमोक्रेट्स जरूरी सीटें जीत लेते हैं, तो वे एक या दोनों सदनों में बहुमत हासिल कर सकते हैं। इससे ट्रम्प के लिए अपने एजेंडे को लागू करना मुश्किल हो सकता है।

ट्रम्प की लोकप्रियता में गिरावट, 30% तक रेटिंग पहुंची
अमेरिका में ट्रम्प के कामकाज से खुश लोगों की संख्या घट रही है। अलग-अलग सर्वे में सिर्फ 30 से 36% लोग ही उनके काम से खुश हैं।
NBC न्यूज के सर्वे में 34% लोगों ने ट्रम्प के कामकाज को सही बताया। वॉशिंगटन पोस्ट-ABC न्यूज के सर्वे में 33% और फॉक्स न्यूज के सर्वे में 36% लोगों ने उनका समर्थन किया।
प्यू रिसर्च सेंटर के सर्वे में ट्रम्प को सबसे कम, यानी 30% लोगों का समर्थन मिला। ये ट्रम्प के पहले कार्यकाल से भी कम हैं।
पहले कार्यकाल में ट्रम्प की अप्रूवल रेटिंग सबसे कम जनवरी 2021 में संसद में दंगाईयों के घुसने वाली घटना के बाद हुई थी। तब उनकी रेटिंग 34% पहुंच गई थी।

अमेरिकी जनता महंगाई से परेशान
2024 के राष्ट्रपति चुनाव में ट्रम्प ने वादा किया था कि वे महंगाई कम करेंगे और लोगों का खर्च घटाएंगे। लेकिन अब बढ़ती कीमतें उनकी पार्टी के लिए परेशानी बन रही हैं।
अमेरिका में अंडे, दूध, ब्रेड, मांस और सब्जियां जैसी बुनियादी चीजों के दाम 20% से 30% तक महंगे हो चुके हैं। घर का किराया औसतन 1.60 लाख रुपए पहुंच गया है जो अब तक सबसे ऊंचा स्तर है।
तेल-गैस की कीमतों में करीब 20% का इजाफा हुआ है। हालांकि लोगों की तनख्वाह में थोड़ी बढ़ोतरी हुई है, लेकिन महंगाई की वजह से उन्हें इसका फायदा नहीं मिला।
रॉयटर्स-इप्सोस के सर्वे में 78% लोगों ने कहा कि चीजों के दाम उनकी कमाई से ज्यादा तेजी से बढ़ रहे हैं। AP की रिपोर्ट के मुताबिक, 65% अमेरिकी मानते हैं कि महंगाई के लिए ट्रम्प की नीतियां जिम्मेदार हैं।
राष्ट्रीय सर्वेक्षणों के मुताबिक लगभग 37% से अधिक अमेरिकी महंगाई और बढ़ती कीमतों को देश की सबसे बड़ी और गंभीर समस्या मानते हैं। ऐसे में महंगाई कम करना राष्ट्रपति ट्रम्प के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन गया है।

ईरान जंग से बढ़ी मुश्किल, विदेश नीति से भी नाराज लोग
ईरान के साथ जंग ट्रम्प के लिए एक और परेशानी बन गई है। रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, जंग के कारण पेट्रोल और डीजल की कीमतों पर दबाव बढ़ा है। इससे अमेरिकी लोगों का रोजमर्रा का खर्च बढ़ सकता है।
NBC न्यूज के सर्वे में सिर्फ 29% लोगों ने ईरान जंग को संभालने के ट्रम्प के तरीके को सही माना। वहीं, फॉक्स न्यूज के सर्वे में 64% लोगों ने उनकी विदेश नीति को गलत बताया।
हालांकि, ट्रम्प की अपनी पार्टी रिपब्लिकन के समर्थकों में उन्हें अब भी समर्थन मिल रहा है। AP के सर्वे में 69% रिपब्लिकन मतदाताओं ने उनकी विदेश नीति को सही माना।
ईरान जंग का चुनाव पर कितना असर पड़ेगा, यह अभी साफ नहीं है। लेकिन अगर जंग के कारण पेट्रोल-डीजल महंगा होता है और लोग ट्रम्प की नीतियों से नाराज रहते हैं, तो इसका नुकसान उनकी रिपब्लिकन पार्टी को हो सकता है।

अपनी ही पार्टी के उम्मीदवार ट्रम्प से दूरी बनाने लगे
ट्रम्प की लोकप्रियता घटने का असर उनकी अपनी पार्टी पर भी दिख रहा है। रॉयटर्स की अक्टूबर में आई रिपोर्ट के मुताबिक, मुकाबले वाली 62 सीटों में से 41 सीटों पर रिपब्लिकन उम्मीदवार ट्रम्प की कुछ नीतियों से असहमति जता रहे हैं या उनसे दूरी बनाकर चल रहे हैं।
ये उम्मीदवार ट्रम्प की सभी नीतियों का विरोध नहीं कर रहे। वे कुछ मुद्दों पर उनसे अलग राय रखकर उन लोगों का समर्थन हासिल करना चाहते हैं, जो किसी पार्टी के पक्के समर्थक नहीं हैं।
इन उम्मीदवारों के सामने मुश्किल यह है कि ट्रम्प के करीब रहने पर उनकी गिरती लोकप्रियता का नुकसान उठाना पड़ सकता है। वहीं, उनसे ज्यादा दूरी बनाने पर ट्रम्प के वफादार समर्थक नाराज हो सकते हैं।
संसद में बहुमत खोने पर ट्रम्प को क्या नुकसान होगा
अगर डेमोक्रेटिक पार्टी कांग्रेस के एक या दोनों सदनों में बहुमत हासिल कर लेती है, तो ट्रम्प के लिए अपने फैसलों को लागू करना मुश्किल हो सकता है।
कांग्रेस में बजट, सरकारी खर्च और नए कानूनों से जुड़े अहम फैसले लिए जाते हैं। ऐसे में डेमोक्रेट्स के पास बहुमत होने पर वे ट्रम्प के प्रस्तावों को रोक सकते हैं और उनके प्रशासन के कामकाज की जांच भी बढ़ा सकते हैं।
हालांकि, रिपब्लिकन पार्टी के पास कुछ फायदे भी हैं। रॉयटर्स के मुताबिक, पार्टी के पास चुनाव प्रचार पर खर्च करने के लिए मजबूत संसाधन हैं। इसके अलावा, डेमोक्रेटिक पार्टी के कुछ उम्मीदवारों को लेकर मध्यमार्गी मतदाताओं की चिंता भी रिपब्लिकन के पक्ष में जा सकती है।

ट्रम्प-बाइडेन पिछला मिडटर्म चुनाव हारे थे
मिडटर्म चुनाव में राष्ट्रपति की पार्टी का सीटें गंवाना काफी आम है। यह अमेरिकी राजनीति का पुराना रुझान है। हालांकि, सीटें हारने और संसद में बहुमत गंवाने में फर्क है।
- आंकड़े बताते हैं कि 1946 से 2022 तक हुए 20 में से 18 मिडटर्म चुनावों में राष्ट्रपति की पार्टी ने हाउस पर रिप्रेजेंटेटिव्स में सीटें गंवाईं। 18 में से 8 बार ऐसा हुआ जब राष्ट्रपति की पार्टी संसद में बहुमत भी गंवा बैठी।
- 2022 में जो बाइडेन की डेमोक्रेटिक पार्टी बहुमत गंवा बैठी थी। उसके पास 222 सीटें थीं, जो घटकर 213 रह गईं।
- 2018 में ट्रम्प की रिपब्लिकन पार्टी भी बहुमत गंवा बैठी थी। पार्टी की 241 से घटकर 199 सीटें रह गईं, यानी 42 सीटों का नुकसान हुआ था।
- सिर्फ 2 बार ऐसा हुआ है जब राष्ट्रपति की पार्टी ने हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स में पिछले से ज्यादा सीटें जीती हैं।
- 1998: बिल क्लिंटन (डेमोक्रेटिक पार्टी)- पार्टी ने 4 सीटें बढ़ाईं। उस समय क्लिंटन के खिलाफ महाभियोग की प्रक्रिया चल रही थी, लेकिन उनकी लोकप्रियता काफी ऊंची थी।
- 2002: जॉर्ज डब्ल्यू. बुश (रिपब्लिकन पार्टी)- पार्टी ने 8 सीटें बढ़ाईं। 11 सितंबर 2001 के आतंकी हमलों के बाद बुश की लोकप्रियता बढ़ी थी और राष्ट्रीय सुरक्षा बड़ा मुद्दा था।
मिडटर्म चुनाव में राष्ट्रपति की पार्टी अक्सर क्यों हारती है?
1. महंगाई से नाराजगी
अगर पेट्रोल, राशन, किराया और दूसरी जरूरी चीजें महंगी हो जाती हैं, तो लोग राष्ट्रपति की पार्टी से नाराज हो सकते हैं। इसका असर चुनाव में दिखता है।
2. राष्ट्रपति के कामकाज का हिसाब
मिडटर्म चुनाव को लोग राष्ट्रपति के कामकाज पर अपनी राय देने का मौका मानते हैं। अगर वे सरकार से खुश नहीं हैं, तो विपक्ष को वोट दे सकते हैं।
3. बदलाव की चाह
एक ही पार्टी के पास राष्ट्रपति पद और संसद में ज्यादा ताकत हो, तो कुछ मतदाता दूसरी पार्टी को मौका देना चाहते हैं। इससे सत्ता पर नियंत्रण और संतुलन बना रहता है।
4. राष्ट्रपति की लोकप्रियता घट जाना
अगर राष्ट्रपति के फैसलों से लोग खुश नहीं हैं, तो उनकी पार्टी के उम्मीदवारों को भी नुकसान हो सकता है। इतिहास में राष्ट्रपति की लोकप्रियता और उनकी पार्टी को मिलने वाली सीटों के बीच संबंध देखा गया है।
5. राष्ट्रपति के चुनाव जैसा उत्साह नहीं रहता
राष्ट्रपति चुनाव में लोगों की भागीदारी ज्यादा हो सकती है। दो साल बाद मिडटर्म चुनाव में राष्ट्रपति के समर्थक उतने उत्साह से वोट देने नहीं निकलते, जबकि नाराज मतदाता ज्यादा सक्रिय हो सकते हैं।
6. पिछले चुनाव की जीत का असर कम होना
राष्ट्रपति चुनाव में लोकप्रिय नेता की वजह से उनकी पार्टी के कई उम्मीदवार भी जीत जाते हैं। दो साल बाद जब राष्ट्रपति खुद चुनाव नहीं लड़ रहे होते, तो उन उम्मीदवारों को पहले जितना फायदा नहीं मिलता।