“RSS में बड़ा संगठनात्मक बदलाव: प्रांत प्रचारक पद खत्म, राज्य-संभाग मॉडल लागू; 2027 तक नई संरचना, यूपी चुनाव में होगा पहला टेस्ट”

40 लाख सदस्य और 83 हजार से ज्यादा शाखाओं वाला राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपने स्ट्रक्चर में बड़ा बदलाव करने वाला है। इसके मुताबिक अब अलग-अलग प्रांत प्रचारकों की जगह एक राज्य प्रचारक होगा। क्षेत्र प्रचारकों की संख्या भी कम होगी। जिला, तहसील, ब्लॉक और गांवों तक कार्यकर्ताओं को ज्यादा अधिकार मिलेंगे। बदलाव का प्रस्ताव हरियाणा में पानीपत के समालखा गांव में 13, 14 और 15 मार्च को होने वाली बैठक में पेश होगा।

इसकी जरूरत क्यों पड़ी? इसका जवाब बैठक के आयोजकों में से एक RSS के पदाधिकारी देते हैं। वे कहते हैं, ‘दुनिया के सबसे बड़े स्वयंसेवी संगठन को पहले से ज्यादा टारगेट और रिजल्ट ओरिएंटेड बनाने के लिए ये बदलाव जरूरी हैं। ये एक तरह से डिसेंट्रलाइजेशन है। संघ की ताकत बिल्कुल निचले स्तर तक पहुंचाने और देश के हर व्यक्ति तक संघ की पहुंच बनाने की प्रक्रिया है।’

सोर्स के मुताबिक, बैठक में सभी सुझावों के साथ एक प्रस्ताव बनेगा, जिसे सितंबर 2026 की बैठक में पारित किया जाएगा। फिर जनवरी-फरवरी 2027 तक सभी जगह लागू किया जाएगा। इस पूरी कवायद का सबसे

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के 100 साल पूरे होने पर अलग-अलग शहरों में कार्यक्रम हो रहे हैं। समालखा गांव में होने वाली बैठक भी इसी का हिस्सा है। फोटो देहरादून में 23 फरवरी को हुए कार्यक्रम की है। इसमें सरसंघचालक मोहन भागवत भी शामिल हुए थे।

100 साल में दूसरी बार इतना बड़ा बदलाव

क्या इतना बड़ा बदलाव पहली बार हो रहा है? सोर्स ने जवाब दिया, ‘बदलाव तो संघ में होते रहे हैं, लेकिन इतना बड़ा बदलाव दूसरी बार है। पहली बार 1949 में हुआ था, जब संघ ने लिखित संविधान बनाकर सरकार को सौंपा था। उसी वक्त संघ ने राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे को भी स्वीकार किया था।’

‘उस वक्त ढांचे और काम करने के तरीकों में भी कई बड़े बदलाव किए गए थे। उसके बाद बड़ा बदलाव ड्रेस में किया गया, लेकिन ढांचे में कुछ खास नहीं बदला गया था। पिछले 4 साल से इसी बदलाव के लिए चर्चा चल रही थी, जो अब ठोस रूप में आ गई है।’

संघ की रीढ़ प्रांत प्रचारक व्यवस्था खत्म होगी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अंदर अब तक राज्य कोई इकाई नहीं थी। बड़े राज्य कई प्रांतों में बंटे हैं। इनके प्रांत प्रचारक जमीनी और शीर्ष कार्यकर्ताओं के बीच कड़ी का काम करते थे। अब नए स्ट्रक्चर में प्रांत प्रचारकों की

ब्रजः मथुरा, आगरा, अलीगढ़

अवधः लखनऊ, अयोध्या, बाराबंकी

मेरठ: पश्चिमी UP का हिस्सा (मेरठ, सहारनपुर)

कानपुरः कानपुर, फतेहपुर

काशी: वाराणसी, आजमगढ़, मिर्जापुर

गोरक्षः गोरखपुर, देवरिया, कुशीनगर

हर प्रांत में प्रचारक होता है। अब उनकी जगह एक राज्य प्रचारक होगा। यानी 6 प्रांत प्रचारक की बजाय सिर्फ एक राज्य प्रचारक होगा। इसके ऊपर क्षेत्र प्रचारक बने रहेंगे। बड़े राज्यों जैसे उत्तर प्रदेश में दो क्षेत्र हैं- पूर्वी उत्तर प्रदेश (कानपुर, काशी, गोरक्ष, अवध प्रांत) और पश्चिमी उत्तर प्रदेश (मेरठ, ब्रज)। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में उत्तराखंड भी शामिल है।

सोर्स के मुताबिक, प्रांत प्रचारक कम करके जमीनी स्तर के प्रचारक बढ़ाए जाएंगे। हालांकि प्रांत प्रचारकों के पद पर तैनात सदस्यों के लिए नई जिम्मेदारी अभी तय नहीं हुई है। पद खत्म करने के बाद खाली हुए सदस्यों को संघ के दूसरे कामों में लगाया जाएगा।

क्षेत्रों की संख्या घटेगी, क्षेत्र प्रचारक कम होंगे

अभी देशभर में 11 क्षेत्र हैं। इनमें 11 क्षेत्र प्रचारक हैं। नई व्यवस्था में क्षेत्रों की संख्या घटाकर 9 करने का प्रस्ताव है। लिहाजा क्षेत्र प्रचारकों की संख्या भी घटेगी। अभी ये क्षेत्र है-

1. उत्तर क्षेत्रः दिल्ली, पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर, लद्दाख

2. पश्चिम क्षेत्रः महाराष्ट्र, गुजरात, गोवा

3. दक्षिण क्षेत्रः तमिलनाडु, केरल, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, तेलंगाना

4. पूर्व क्षेत्र: बंगाल, ओडिशा, बिहार, झारखंड

5. मध्य क्षेत्रः मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़

6. उत्तर-पूर्व क्षेत्रः असम, मणिपुर, नगालैंड आदि पूर्वोत्तर राज्य

7. पूर्वी उत्तर प्रदेश क्षेत्रः कानपुर, काशी, गोरक्ष, अवध

8. पश्चिमी उत्तर प्रदेश क्षेत्र: मेरठ, ब्रज, उत्तराखंड

9. उत्तर पश्चिम क्षेत्र या उत्तराखंड सहित पश्चिमी यूपी

10. राजस्थान क्षेत्र

11. पश्चिमी या दक्षिणी उप-क्षेत्र

संभागों की संख्या और उनके पदाधिकारी बढ़ेंगे

उच्च पदाधिकारियों की संख्या घटेगी, लेकिन संभाग या डिवीजन स्तर पर नए पदाधिकारी, प्रांत प्रचारक नियुक्त होंगे। ऐसा नहीं है कि संभाग अब तक कहीं भी नहीं थे। कई जगहों पर थे, लेकिन ये व्यवस्था पूरे देश में नहीं थी। ये प्रचारक जैसा अहम पद नहीं था। अब नई व्यवस्था में किसी राज्य की दो प्रशासनिक कमिश्नरी या मंडलों को मिलाकर संभाग या डिवीजन बनेगा।

उत्तर प्रदेश में जैसे 18 प्रशासनिक मंडल हैं। इन्हें 9 संभागों में बांटने का प्रस्ताव है। यहां 9 संभाग प्रचारक होंगे। इसी तरह मध्य प्रदेश में 10 मंडल हैं, तो वहां 5 संभाग प्रचारक होंगे। राजस्थान में 7 मंडल हैं। इसलिए वहां 3 से 4 संभाग प्रचारक होंगे। बिहार में 9 मंडल हैं, तो यहां पर 4 से 5 संभाग प्रचारक होंगे।

जिला, तहसील, ब्लॉक और गांवों तक पावर का डिस्ट्रीब्यूशन

सोर्स ने बताया, ‘अभी जिला, तहसील, ब्लॉक और गांव स्तर पर संघ कार्यकर्ता तो हैं, लेकिन उन्हें प्रांत स्तर के पदाधिकारियों के भरोसे रहना पड़ता था। अब ये कार्यकर्ता संभाग प्रचारकों के संपर्क में रहेंगे। साथ ही संघ भी इन कार्यकर्ताओं को ज्यादा शक्तियां देगा।’

पहले भी निचले स्तर तक संघ कार्यकर्ता मौजूद होते थे, फिर अब क्या बदलेगा? सोर्स ने बताया, ‘हां, मौजूद होते थे, लेकिन उन्हें हर मुद्दे और प्रपोजल के लिए प्रांत प्रचारक के पास ही जाना पड़ता था। प्रांत प्रचारक और जमीनी कार्यकर्ताओं के बीच भौगोलिक और पद की दूरी ज्यादा होती थी, लेकिन अब ऐसा नहीं होगा।’

‘जिले के कार्यकर्ता, संभाग प्रचारक से न तो पद और न ही भौगोलिक स्तर पर बहुत दूर होंगे। इसलिए काम ज्यादा जल्दी और डिस्कशन ज्यादा पारदर्शी होगा।’

जिले स्तर पर भी प्रचारक बनाए जाने का प्रस्ताव

सोर्स के मुताबिक, अभी जिला स्तर पर कार्यकर्ता को क्या पद दिया जाएगा, बैठक में इस पर भी चर्चा होगी। उम्मीद है कि जिला स्तर तक हमारे प्रचारक होंगे या सहायक प्रचारक जैसा कोई पद भी बनाया जा सकता है।

RSS के माइक्रो मैनेजमेंट वाले स्ट्रक्चर का यूपी विधानसभा चुनाव में टेस्ट

क्या संघ अब नई व्यवस्था के साथ सबसे पहले पश्चिम बंगाल चुनाव में उतरेगा? सोर्स ने जवाब दिया, ‘अभी तो प्रस्ताव बनेगा, फिर व्यवस्था लागू होगी। हालांकि 2027 की जनवरी-फरवरी तक लागू हो ही जाएगी। यानी उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में संघ अपने इस माइक्रो मैनेजमेंट सिस्टम का पहला टेस्ट करेगा? सोर्स मुस्कुराते हुए हां में जवाब देते हैं।

तस्वीर 18 फरवरी की है, जब सरसंघचालक मोहन भागवत लखनऊ यूनिवर्सिटी के एक कार्यक्रम में शामिल हुए थे।

टारगेट, रिजल्ट पर फोकस, प्रचारकों का बनेगा रिपोर्ट कार्ड

बैठक में शामिल होने आ रहे संघ के एक पदाधिकारी ने बताया, ‘पूरी मशक्कत का सिर्फ इतना मतलब है कि संघ रिजल्ट और टारगेट ओरिएंटेड बने। प्रचारकों के हिस्से में उतनी आबादी और क्षेत्र होगा, जितने में वो आसानी से फोकस कर सकें।’

‘पहले प्रांत प्रचारकों के लिए जमीनी स्तर पर हो रहे हर काम पर नजर रखना मुश्किल होता था। नया स्ट्रक्चर ऐसा बनाया जा रहा है कि जमीनी स्तर पर ज्यादा प्रचारक हों। ये जमीन से सीधे जुड़े होंगे और इनके पास मुद्दों की क्लियर जमीनी समझ होगी।’

वे आगे कहते हैं, ‘प्रचारकों को अपना रिपोर्ट कार्ड बनाना पड़ेगा। उसका रिव्यू साल में एक या दो बार नहीं, बल्कि इससे ज्यादा बार होगा। ताकि उनके कामों की समीक्षा हो सके। अगर कोई प्रचारक अपने क्षेत्र में संघ के एजेंडे में सफल नहीं हो रहा, तो उसकी मदद के लिए कुछ और लोग भेजे जाएंगे। अगर लगा कि इसके बाद भी वो सफल नहीं हो पा रहा है तो फिर उसकी जगह

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