मध्यप्रदेश सरकार जबलपुर हाईकोर्ट के उस आदेश को डबल बेंच में चुनौती देने की तैयारी में है, जिसमें 30 दिन में बंद आरटीओ चेकपोस्ट दोबारा खोलने को कहा गया है। इस पर कानूनी राय ली जा रही है।
ऑल इंडिया मोटर ट्रांसपोर्ट एसोसिएशन भी फैसले के खिलाफ याचिका दायर करने की तैयारी में है। सवाल है कि अवैध वसूली की शिकायतों के चलते दो साल पहले बंद चेकपोस्ट को दोबारा खोलने का निर्देश क्यों दिया गया और क्या इससे सरकार का राजस्व बढ़ेगा? पड़ताल में सामने आया कि 2014 में चेकपोस्ट से 150 करोड़ रुपए का राजस्व मिलता था, जो 2022 में घटकर 70 करोड़ रह गया, जबकि वसूली की शिकायतें बढ़ीं। चेकपोस्ट शुरू होने के संभावित

हाईकोर्ट ने किस आधार पर फैसला सुनाया
जबलपुर हाईकोर्ट ने 22 अप्रैल 2026 को रजनीश त्रिपाठी की अवमानना याचिका पर सुनवाई की। इसके बाद 30 दिन में सभी चेकपोस्ट दोबारा चालू करने के आदेश दिए।याचिका में कहा गया था कि ओवरलोड वाहनों से सड़कों और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान हो रहा है। बिना परमिट वाले वाहन बढ़े हैं।
सरकार चेकपोस्ट जारी रखने का आश्वासन दे चुकी थी, लेकिन 30 जून 2024 को इन्हें बंद कर दिया। जस्टिस विशाल मिश्रा ने इसे आदेश और आश्वासन का उल्लंघन माना। कोर्ट के अनुसार, भारी वाहनों की जांच कमजोर हुई, हादसों का खतरा बढ़ा और ओवरलोडिंग रोकने के लिए फिजिकल चेकिंग जरूरी है।मोबाइल यूनिट और फेसलेस सिस्टम प्रभावी नहीं पाए गए। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि उसका आश्वासन आदेश के समान बाध्यकारी होता है।

सरकार ने चेकपोस्ट बंद कर चेक पॉइंट क्यों शुरू किए
सरकारी सूत्रों के मुताबिक, परिवहन विभाग की चेकपोस्ट वसूली का अड्डा बन चुकी थीं, जिससे सरकार की छवि प्रभावित हो रही थी। इन्हें बंद करने की इच्छा केंद्रीय स्तर पर भी थी। केंद्रीय परिवहन मंत्री नितिन गडकरी ने 16 जुलाई 2022 को तत्कालीन सीएम शिवराज सिंह चौहान और सीएस इकबाल सिंह बैस को पत्र लिखकर वसूली पर चिंता जताई थी। हालांकि, तब फैसला नहीं हुआ
30 जून 2024 को डॉ. मोहन यादव सरकार ने चेकपोस्ट खत्म किए। 1 जुलाई से चेक पॉइंट सिस्टम लागू किया। सरकार ने गुजरात मॉडल पर ‘फेसलेस’ और ‘बाधा-मुक्त’ व्यवस्था का दावा किया, लेकिन दो साल बाद भी यह जमीन पर नहीं उतर सकी। नतीजतन, निजी स्तर पर वसूली जारी रही।

16 जुलाई 2022 को तत्कालीन सीएम और सीएस को केंद्रीय मंत्री का लिखा पत्र।
ट्रांसपोर्ट एसोसिएशन को डरः फिर बढ़ेगी वसूली
ऑल इंडिया मोटर ट्रांसपोर्ट एसोसिएशन ने सवाल उठाया कि क्या चेकपोस्ट ओवरलोडिंग रोकने के लिए थे या वसूली के अड्डे। एसोसिएशन इस फैसले के खिलाफ डबल बेंच में याचिका दायर करेगी।
ऑल इंडिया ट्रांसपोर्ट कांग्रेस के चेयरमैन सीएल मुकाती के मुताबिक, चेकपोस्ट की वापसी से ‘इंस्पेक्टर राज’ लौटने, ट्रकों की आवाजाही धीमी होने, लॉजिस्टिक्स लागत बढ़ने और नकद वसूली फिर शुरू होने का खतरा है। उन्होंने कहा कि 2014 के मुकाबले 2022 तक राजस्व आधा रह गया, जबकि वसूली बढ़ी।सरकार को चेकपोस्ट चलाने के लिए अतिरिक्त खर्च उठाना पड़ रहा था, जबकि अब डिजिटल माध्यम से जांच संभव है।

स्टिंग ऑपरेशन के जरिए खुलासा किया था कि चेकपोस्ट बंद होने के बाद भी अवैध वसूली जोरो पर चल रही है।
एसोसिएशन का आरोप: सरकार ने पक्ष मजबूती से नहीं रखा
सीएल मुकाती ने कहा कि एसोसिएशन हाईकोर्ट के आदेश का सम्मान करता है, लेकिन फैसले में वाहनों की जांच व्यवस्था स्पष्ट नहीं है। उनका आरोप है कि सरकार ने अपना पक्ष मजबूती से नहीं रखा, इसलिए यह आदेश आया। उनके मुताबिक, सरकार को बताना चाहिए था कि फिजिकल जांच जरूरी नहीं है और ओवरलोडिंग की जिम्मेदारी केंद्र ने टोल नाकों को दी है।

पोस्ट बदली, लेकिन अवैध वसूली नहीं रुकी मध्यप्रदेश की ये चौकियां लंबे समय से ‘प्राइवेट कलेक्टर्स’ के लिए बदनाम रही हैं। ऐसे लोग सादे कपड़ों में ट्रक ड्राइवरों से 500 से 5,000 रुपए तक वसूलते थे। परिवहन विभाग के पूर्व सिपाही सौरभ शर्मा का मामला इसी सिस्टम की मिसाल है, जिसने कुछ ही वर्षों में करोड़ों की संपत्ति बना ली।

चेकपोस्ट बंद होने के बाद 45 ‘चेक पॉइंट’ बनाए गए, लेकिन वसूली वहां भी जारी रही, पोस्ट बदली, तरीका नहीं। वरिष्ठ पत्रकार एनके सिंह के मुताबिक, सरकार भी मानती है कि चेकपोस्ट वसूली के अड्डे बन चुके थे, जिस पर गडकरी कई बार नाराजगी जता चुके हैं।उनका कहना है कि ओवरलोडिंग रोकने के कई विकल्प हैं, इसके लिए ट्रक ड्राइवरों और मालिकों को परेशान करना उचित नहीं है, खासकर ऐसे समय में जब वैश्विक परिस्थितियों के कारण माल ढुलाई और भी अहम हो गई है।
