सरकारी नौकरी से बर्खास्तगी मृत्युदंड से कम नहीं: सुप्रीम कोर्ट की बड़ी टिप्पणी, बिना ठोस सबूत दोषी ठहराने पर पेरियार विश्वविद्यालय के डिप्टी रजिस्ट्रार की बहाली बरकरार

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने सरकारी कर्मचारियों की सेवा से बर्खास्तगी को बेहद कठोर दंड बताते हुए कहा है कि इसके प्रभाव मृत्युदंड (Death penalty) से कम नहीं होते। नौकरी छिनने से कर्मचारी न केवल सेवा से जुड़े लाभों से वंचित हो जाता है, बल्कि उसके परिवार पर भी इसके दूरगामी आर्थिक और सामाजिक प्रभाव पड़ते हैं।

इसी टिप्पणी के साथ शीर्ष अदालत ने तमिलनाडु के पेरियार विश्वविद्यालय में डिप्टी रजिस्ट्रार आर. सरवणन को सेवा में बहाल करने के फैसले को बरकरार रखा है। उन्हें आय के ज्ञात स्रोतों से अधिक संपत्ति रखने के आरोप में नौकरी से बर्खास्त किया गया था।

न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति चंद्रशेखर की पीठ ने मद्रास उच्च न्यायालय की खंडपीठ के आदेश को रद्द कर दिया। खंडपीठ ने एकल न्यायाधीश के उस फैसले को पलट दिया था, जिसमें सरवणन की सेवा बहाल करने का निर्देश दिया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने एकल न्यायाधीश के फैसले को बरकरार रखते हुए कहा कि विश्वविद्यालय की ओर से गठित एक सदस्यीय आयोग की जांच रिपोर्ट से स्पष्ट होता है कि अपीलकर्ता को बिना किसी सबूत के दोषी ठहरा दिया गया था।

सुनी-सुनाई बातों पर सजा देना अन्याय

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि केवल सुनी-सुनाई बातों के आधार पर किसी व्यक्ति को दोषी ठहराना उसके साथ गंभीर अन्याय है। पीठ ने टिप्पणी की कि किसी व्यक्ति को महज ऐसी बातों के आधार पर ‘फांसी पर लटका देने’ से बड़ा अन्याय और क्या हो सकता है। अदालत के अनुसार, मद्रास उच्च न्यायालय की खंडपीठ ने किसी ठोस और उचित कारण के बिना एकल न्यायाधीश के फैसले में हस्तक्षेप किया था।

16 अक्टूबर को पारित आदेश में शीर्ष अदालत ने कहा, “सेवा से बर्खास्तगी या हटाने की सजा सबसे कठोर दंड है और सरकारी कर्मचारी के लिए यह मृत्युदंड से कम नहीं है। इसके दूरगामी प्रभाव होते हैं और यह कर्मचारी के परिवार को भी प्रभावित करती है।”

 

नौकरी छिनने से आर्थिक रूप से असहाय हो सकता है कर्मचारी

पीठ ने कहा कि सेवा से बर्खास्तगी के कारण सरकारी कर्मचारी उन सभी सेवा संबंधी लाभों से वंचित हो जाता है, जिन्हें उसने नौकरी के दौरान अर्जित किया होता है। इससे वह आर्थिक रूप से असहाय स्थिति में पहुंच सकता है। अदालत ने स्पष्ट किया कि जब किसी दंड के इतने गंभीर परिणाम होते हैं, तो रिट अदालत ऐसे मामलों में मूकदर्शक बनकर नहीं रह सकती।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि उपयुक्त मामलों में रिट अदालत को अपनी ओर से निर्धारित सीमाओं से आगे बढ़कर दंड के आदेश को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई करनी चाहिए। अदालत का आशय था कि जहां न्याय और निष्पक्षता की मांग हो, वहां गंभीर परिणाम वाले दंडात्मक आदेश की न्यायिक समीक्षा से केवल सीमाओं के आधार पर पीछे नहीं हटना चाहिए।

वैकल्पिक उपाय होने पर भी हाईकोर्ट कर सकता है सुनवाई

विश्वविद्यालय ने दलील दी थी कि एकल न्यायाधीश को रिट क्षेत्राधिकार के तहत मामले की सुनवाई नहीं करनी चाहिए थी, क्योंकि संबंधित कर्मचारी के पास तमिलनाडु सेवा नियमों के तहत वैकल्पिक उपाय उपलब्ध था। सुप्रीम कोर्ट ने इस दलील को खारिज कर दिया।

पीठ ने कहा कि रिट अदालत की शक्तियों पर कुछ स्व-निर्धारित सीमाओं को छोड़कर कोई ऐसा प्रतिबंध नहीं है, जो उसे उपयुक्त मामले में हस्तक्षेप करने से रोकता हो। अदालत के अनुसार, भले ही ये शक्तियां विवेकाधीन हों, लेकिन उच्च न्यायालय न्याय, निष्पक्षता और विवेक को आगे बढ़ाने के लिए संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत अपने अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल कर सकता है।

इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सरकारी कर्मचारी के खिलाफ गंभीर दंडात्मक कार्रवाई करते समय ठोस साक्ष्य और न्यायसंगत प्रक्रिया महत्वपूर्ण हैं। साथ ही, बर्खास्तगी जैसे कठोर आदेशों के मामलों में न्यायालय परिस्थितियों के अनुरूप हस्तक्षेप कर सकता है।

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