फर्जी पासपोर्ट नेटवर्क की जांच जैसे-जैसे आगे बढ़ रही है, वैसे-वैसे इसके तार विदेश यात्राओं तक जुड़ते जा रहे हैं। एसटीएफ की जांच में अब तक करीब 70 संदिग्ध पासपोर्ट सामने आए हैं। इनमें से कुछ पासपोर्ट धारकों की ट्रैवल हिस्ट्री थाईलैंड, मलेशिया, कंबोडिया और इंडोनेशिया तक मिली है।
जांच में सबसे चौंकाने वाली कड़ी डबरा के एक ही पते से बने 17 संदिग्ध पासपोर्ट हैं। इन सभी पासपोर्ट के आवेदन में एक ही मोबाइल नंबर इस्तेमाल किया गया। इससे एसटीएफ को आशंका है कि पासपोर्ट बनवाने की प्रक्रिया में किसी एक व्यक्ति या एजेंट की भूमिका हो सकती है।
जांच अब इस बात पर केंद्रित है कि इन पासपोर्ट के लिए तैयार की गई भारतीय पहचान असली थी या फर्जी और दस्तावेज तैयार कराने से लेकर पुलिस वेरिफिकेशन तक किस-किस की भूमिका रही।
आधार से शुरू हुआ खेल, पासपोर्ट तक पहुंची फर्जी पहचान
एसटीएफ की जांच में सामने आया है कि संदिग्ध मामलों में पहले भारतीय पहचान से जुड़े दस्तावेज तैयार किए गए। इनमें आधार कार्ड, पैन कार्ड और जन्म प्रमाण पत्र जैसे दस्तावेज शामिल हैं।
इसके बाद इन्हीं दस्तावेजों के आधार पर पुलिस वेरिफिकेशन कराया गया और पासपोर्ट बनवाए गए।यानी जांच एजेंसी के सामने अब केवल फर्जी पासपोर्ट का मामला नहीं है। असली सवाल यह है कि फर्जी पहचान तैयार करने की शुरुआत कहां से हुई और सरकारी दस्तावेज जारी होने तक कौन-कौन लोग इस प्रक्रिया में शामिल रहे।

एक ही सिम से 17 पासपोर्ट का वेरिफिकेशन
डबरा में एक ही पते से बने 17 संदिग्ध पासपोर्ट की जांच में एक ही मोबाइल नंबर का इस्तेमाल सामने आया है। यह नंबर पासपोर्ट आवेदन और वेरिफिकेशन की प्रक्रिया में जुड़ा मिला है।
एसटीएफ अब इन सभी आवेदनों में दर्ज पते, दस्तावेज, मोबाइल नंबर और पुलिस वेरिफिकेशन रिकॉर्ड का मिलान कर रही है। जांच टीम यह भी पता लगा रही है कि एक ही नंबर इतने अलग-अलग आवेदनों में कैसे इस्तेमाल हुआ और क्या इन आवेदकों के बीच कोई सीधा संबंध था।
रियाल ने चार बार बनवाया पासपोर्ट
जांच में मुख्य आरोपी रियाल चौधरी से जुड़ी एक और महत्वपूर्ण जानकारी सामने आई है। एसटीएफ के मुताबिक, उसने पासपोर्ट गुम होने का आधार बताते हुए अलग-अलग समय में चार बार पासपोर्ट बनवाए।
अब इन चारों पासपोर्ट के आवेदन, उनमें इस्तेमाल दस्तावेज, पते और पुलिस वेरिफिकेशन की प्रक्रिया की जांच की जा रही है। एसटीएफ यह भी देख रही है कि हर बार पासपोर्ट बनवाने के दौरान पहचान से जुड़े रिकॉर्ड में कोई बदलाव किया गया था या नहीं।
4 देशों तक पहुंची ट्रैवल हिस्ट्री
नेटवर्क से जुड़े विप्लव अधिकारी के पासपोर्ट की ट्रैवल हिस्ट्री ने जांच का दायरा विदेश तक बढ़ा दिया है। उसके पासपोर्ट से कंबोडिया, इंडोनेशिया, थाईलैंड और मलेशिया की यात्राओं की जानकारी सामने आई है।
अब एसटीएफ संदिग्ध पासपोर्ट धारकों के इमिग्रेशन रिकॉर्ड से इन दस्तावेजों का मिलान कर रही है। जांच का मकसद यह पता लगाना है कि फर्जी भारतीय पहचान के आधार पर कितने लोग विदेश पहुंचे और किन-किन देशों की यात्रा की।

भोपाल के बौद्ध मठ के पते पर करीब 40 पासपोर्ट बने
डबरा के बाद भोपाल में भी इसी तरह का पैटर्न जांच एजेंसी को मिला है। अन्ना नगर स्थित एक बौद्ध मठ के पते पर करीब 40 संदिग्ध पासपोर्ट बने होने की जानकारी सामने आई है।
इसके अलावा बैतूल से 11 और छिंदवाड़ा-पांढुर्णा से एक-एक संदिग्ध पासपोर्ट भी जांच के दायरे में हैं। इस तरह अब तक करीब 70 संदिग्ध पासपोर्ट सामने आ चुके हैं, जबकि 100 से ज्यादा पासपोर्ट की जांच जारी बताई जा रही है।
एसटीएफ अब यह पता लगाने में जुटी है कि अलग-अलग शहरों में एक जैसे तरीके से पहचान तैयार करने के पीछे एक ही नेटवर्क था या अलग-अलग एजेंट काम कर रहे थे।
कच्छ के पते ने बढ़ाया जांच का दायरा
नागपुर से गिरफ्तार जॉय चौधरी बरूआ के पासपोर्ट में गुजरात के कच्छ जिले के मथल गांव का पता दर्ज मिला है। अब एसटीएफ इस पते की भी वास्तविकता

15 सरकारी कर्मचारियों की भूमिका जांच के घेरे में
फर्जी पहचान तैयार होने के बाद पुलिस वेरिफिकेशन और पासपोर्ट जारी होने की प्रक्रिया ने जांच का रुख सरकारी सिस्टम की ओर भी कर दिया है। करीब 15 पुलिस और अन्य सरकारी कर्मचारियों की भूमिका जांच के दायरे में बताई जा रही है।
एसटीएफ यह पता लगा रही है कि पासपोर्ट में दर्ज पते का वास्तविक भौतिक सत्यापन किया गया था या नहीं। खासतौर पर एक ही मोबाइल नंबर से 17 पासपोर्ट और एक ही पते से बड़ी संख्या में पासपोर्ट बनने के बावजूद यह पैटर्न संबंधित रिकॉर्ड में क्यों नहीं पकड़ा गया, इसकी भी जांच की जा रही है।

अब फर्जी पासपोर्ट से ज्यादा विदेश जाने वालों की तलाश
जांच का अगला फोकस उन लोगों पर है, जिन्होंने कथित फर्जी भारतीय पहचान के आधार पर पासपोर्ट हासिल करने के बाद विदेश यात्रा की। इसके लिए संदिग्ध पासपोर्टों को इमिग्रेशन रिकॉर्ड से जोड़ा जा रहा है।
हर पासपोर्ट की यात्रा, गंतव्य देश और आने-जाने की तारीखों का मिलान किया जाएगा। इससे यह पता लगाने में मदद मिलेगी कि नेटवर्क केवल फर्जी दस्तावेज तैयार करने तक सीमित था या इसके जरिए लोगों को विदेश भेजने की पूरी व्यवस्था भी संचालित की जा रही थी।